स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर भारतीय अर्थव्यवस्था Notes
Class 11 Economics Chapter 1 Notes in Hindi
यहाँ हम कक्षा 11 अर्थशास्त्र के 1st अध्याय “स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर भारतीय अर्थव्यवस्था” के नोट्स उपलब्ध करा रहे हैं। इस अध्याय में स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर भारतीय अर्थव्यवस्था से जुड़ी प्रमुख विशेषताओं का अध्ययन किया गया है।
ये नोट्स उन छात्रों के लिए उपयोगी सिद्ध होंगे जो इस वर्ष बोर्ड परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं। सरल और व्यवस्थित भाषा में तैयार की गई यह सामग्री अध्याय को तेजी से दोहराने और मुख्य बिंदुओं को याद रखने में मदद करेगी।
स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर भारतीय अर्थव्यवस्था Notes, Class 11 Economics Chapter 1 Notes in Hindi

कक्षा 11 अर्थशास्त्र अध्याय 1 के नोट्स हिंदी में
स्वतंत्रता के समय भारतीय अर्थव्यवस्था
स्वतंत्रता के समय भारत की अर्थव्यवस्था बेहद गरीब, शोषित, और अविकसित थी। लगभग दो शताब्दियों के ब्रिटिश शासन ने भारत की आर्थिक संरचना को कमजोर, निर्भर और असंतुलित बना दिया था।
पिछड़ी अर्थव्यवस्था
- स्वतंत्रता के समय भारत को एक पिछड़ी अर्थव्यवस्था माना जाता था क्योंकि देश की प्रति व्यक्ति आय केवल लगभग ₹230 (1947-48) थी। देश की अधिकांश जनसंख्या भयंकर गरीबी, कुपोषण और बुनियादी आवश्यकताओ – भोजन, कपड़ा और आवास की कमी से जूझ रही थी।
- ब्रिटिश शासन के कारण भारते के पारंपरिक उद्योग, जैसे हस्तशिल्प, बुरी तरह नष्ट हो चुके थे, जिसके कारण बड़े पैमाने पर बेरोज़गारी फैल गई।समृद्धि का कोई संकेत नहीं था, और ज्यादातर भारतीय अत्यंत दयनीय परिस्थितियों में जीवन व्यतीत कर रहे थे।
ठहरी हुई/स्थिर अर्थव्यवस्था
- ब्रिटिश शासन के पूरे काल में (भारत)की अर्थव्यवस्था लगभग ठहराव) की स्थिति में रही। हालांकि ब्रिटिश सरकार ने भारत की राष्ट्रीय आय या प्रति व्यक्ति आय का कोई आधिकारिक अनुमान नहीं लगाया, फिर भी भारतीय अर्थशास्त्री जैसे – दादाभाई नौरोजी, फाइंडले शिर्रास, और वी.के.आर.वी. राव – ने कुछ अनुमान लगाने का प्रयास किया।
- उनके निष्कर्षों से पता चला किः वास्तविक उत्पादन (Real Output) की वृद्धि दर 2% से भी कम थी प्रति व्यक्ति आय की वार्षिक वृद्धि दर सिर्फ 0.5% थी इस अत्यंत धीमी वृद्धि से स्पष्ट था कि भारतीय अर्थव्यवस्था ठहराव में थी। अकाल, महामारियाँ और मृत्यु दर का बढ़ना स्थिति को और भी गंभीर बनाता था।
कृषि का प्रभुत्व
- स्वतंत्रता के समय लगभग 80% भारतीय जनसंख्या प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर थी। कार्यशील जनसंख्या का लगभग 70% हिस्सा खेती में लगा हुआ था। लेकिन कृषि, अर्थव्यवस्था की रीढ़ होने के बावजूद, अत्यंत पिछड़ी थी: फसलों की उत्पादकता बहुत कम थी।
- खेती में पुराने, पारंपरिक और अल्प-उत्पादक तरीकों का उपयोग होता था सिंचाई सुविधाओं और आधुनिक तकनीक का लगभग अभाव था बार-बार आने वाले अकाल और खाद्यान्न की कमी ने ग्रामीण भारत को लगातार प्रभावित कियाकुल मिलाकर, कृषि पर
अत्यधिक निर्भरता के बावजूद, भारत का कृषि क्षेत्र बेहद अविकसित था।
उद्योगों की बदहाली / औद्योगिक निराशा
- ब्रिटिश शासन से पहले भारत में हस्तशिल्प, कुटीर उद्योग, और छोटे उद्योग अत्यंत समृद्ध थे। लेकिन ब्रिटिशों की आर्थिक नीतियाँ भारत को औद्योगीकरण से दूर रखने और अपने ब्रिटेन के उद्योगों को बढ़ावा देने पर केंद्रित थीं। इसके परिणामस्वरुपः भारतीय उद्योग लगभग नष्ट हो गए स्वतंत्रता तक भारी उद्योगों (Heavy Industries) का लगभग अभाव था।
- मशीनरी और पूंजीगत वस्तुओं के लिए भारत पूरी तरह आयात पर निर्भर था छोटे और कुटीर उद्योगों को ब्रिटिश मशीनों से बनी सस्ती वस्तुओं ने भारी नुकसान पहुँचाया औद्योगिक विकास लगभग ठप हो गया था इस प्रकार, स्वतंत्रता के समय भारत का औद्योगिक क्षेत्र अत्यंत कमजोर और निराशाजनक स्थिति में था।
सीमित नगरीकरण
- 1948 में भारत की केवल 15% जनसंख्या ही शहरों में रहती थी, जबकि लगभग 85% लोग गाँवों में रहते थे।यह दिखाता है कि आधुनिक शहरी जीवन, उद्योग, तथा सुविधाओं के मामले में भारत कितना अविकसित था। गाँवों में सही बुनियादी ढाँचा (infrasturcher) नहीं था।
- कृषि के अलावा रोजगार के अवसर बहुत कम थे शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन जैसी मूलभूत सेवाएँ भी पर्याप्त नहीं थीं शहरीकरण के अभाव का मतलब था कि अधिकांश लोग कम आय वाले ग्रामीण कार्यों में ही फँसे रहते थे और आर्थिक प्रगति के उनके पास बहुत कम अवसर थे। इससे गरीबी लगातार बनी रही और आर्थिक गतिशीलता (economic mobility) लगभग नहीं के बराबर थी।
अर्ध-सामंती अर्थव्यवस्था
- स्वतंत्रता के समय भारत की अर्थव्यवस्था को अर्ध-सामंती कहा जाता था। यह पूरी तरह सामंती (जहाँ राजा और ज़मींदार सत्ता में होते हैं) भी नहीं थी और न ही पूरी तरह पूँजीवादी (जहाँ उद्योग और बाजार मुख्य होते हैं)। ग्रामीण भारत में: विशाल ज़मीनों पर ज़मींदारों और बड़े भू-स्वामियों का नियंत्रण था किसान ज़मीन के मालिक नहीं थे।
- सिर्फ किरायेदार (tenants) थेज़मीन के बदले किसानों से बहुत उच्च लगान/किराया लिया जाता थाकिसानों के पास सुरक्षा, अधिकार या उत्पादकता बढ़ाने का कोई प्रोत्साहन (incentive) नहीं थाइस शोषणकारी व्यवस्था के कारण: कृषि का उत्पादन कम रहता थाभूमि सुधार या विकास में कोई निवेश नहीं होता थाग्रामीण क्षेत्र हमेशा गरीबी और पिछड़ेपन में डूबे रहते थे।
बाहरी निर्भरता / आयात पर भारी निर्भरता
- स्वतंत्रता के समय भारत की अर्थव्यवस्था लगभग हर चीज के लिए विदेशों पर निर्भर थी। देश मशीनें, रक्षा उपकरण, चिकित्सीय वस्तुएँ, दवाइयाँ, सिलाई मशीनें, साइकिलें, केरोसिन आदि जैसी बुनियादी वस्तुएँ भी आयात करता था। इस निर्भरता के कारण:भारत में मजबूत औद्योगिक आधार (indusrial base) विकसित नहीं हो सका ।
- भारी और पूंजीगत उद्योगों का अभाव थादेश के पास तकनीक और उत्पादन क्षमता नहीं थी यहां तक कि ब्रिटिशों ने जो रेल, बंदरगाह, और सड़कों जैसी सुविधाएँ बनाई थीं, उनका मुख्य उद्देश्य थाः भारत से कच्चा माल ब्रिटेन भेजना ब्रिटेन से बनी हुई वस्तुओं को भारत में बेचने में सहायता करना भारतीय विकास या औद्योगिक प्रगति के लिए इनका उपयोग बहुत सीमित था। इस प्रकार, स्वतंत्रता के समय भारत की अर्थव्यवस्था अत्यधिक बाहरी निर्भर और कमजोर थी।
स्वतंत्रता के समय भारत का कृषि क्षेत्र
- स्वतंत्रता के समय भारत एक पूरी तरह कृषि-प्रधान अर्थव्यवस्था था। लगभग 80% जनसंख्या कृषि पर निर्भर थी, जिससे यह स्पष्ट होता है कि देश की आर्थिक संरचना में कृषि का कितना महत्वपूर्ण स्थान था। परंतु, इतना बड़ा क्षेत्र होने के बावजूद, कृषि की स्थिति अत्यंत दुर्दशाग्रस्त, पिछड़ी और ठहरी हुई थी।
- उत्पादन कम था, उत्पादकता बहुत घटिया थी, और शोषणकारी व्यवस्था ने किसानों को गरीबी के दुष्चक्र में फँसा दिया था। इन्हीं
ब्रिटिश शासन के दौरान औद्योगिक क्षेत्र
स्वतंत्रता से ठीक पहले भारत का औद्योगिक क्षेत्र बहुत ही पिछड़ा और अविकसित था।ब्रिटिशों का मुख्य उद्देश्य भारत का आर्थिक विकास करना नहीं था, बल्कि भारतीय संसाधनों का शोषण करना और भारत को ब्रिटिश वस्तुओं का बाज़ार बनाना था। इसलिए उन्होंने भारत में आधुनिक औद्योगीकरण को बढ़ावा नहीं दिया।
ब्रिटिश शासन के दौरान हस्तशिल्प उद्योग का पतन
कभी भारत अपने उत्कृष्ट और समृद्ध हस्तशिल्प उद्योगों के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध था। हाथ से बुने कपड़े, मिट्टी के बर्तन, धातु-कला, लकड़ी की नक्काशी, और विभिन्न शिल्पकलाएँ भारतीय संस्कृति का गौरव थीं और करोड़ों कारीगरों की आजीविका का आधार भी। लेकिन ब्रिटिश शासन के दौरान राजनीतिक, आर्थिक और प्रशासनिक नीतियों ने इन पारंपरिक उद्योगों को धीरे-धीरे नष्ट कर दिया। इसे याद रखने का ट्रिक है:
मशीनों से बनी वस्तुओं से प्रतियोगिता
ब्रिटेन में औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) के बाद मशीनों से बने कपड़े और अन्य वस्तुएं बड़े पैमाने पर तैयार होने लगीं। ये वस्तुएँ बहुत सस्ती थीं एक जैसी गुणवत्ता वाली थीं मशीनों से तेजी से बनती थीं इसके विपरीत भारतीय हस्तशिल्प हाथ से बनाए जाते थे महंगे पड़ते थे समय ज्यादा लेते थे लोगों ने सस्ते ब्रिटिश सामान खरीदना शुरु कर दिया। परिणामः भारतीय कारीगर ब्रिटिश वस्तुओ की कीमत और गति से मुकाबला नहीं कर सके, उनकी आमदनी खत्म हो गई और कारखाने व छोटे उद्योग बंद होने लगे।
रेलमार्गों की शुरुआत (Introduction of Railways)
ब्रिटिशों ने भारत में रेलवे इसलिए नहीं बनाए कि भारतीय विकास हो, बल्कि इसलिए कि ब्रिटिश सामान पूरे भारत में आसानी से पहुँच सके भारत का कच्चा माल जल्दी बंदरगाह तक पहुँचाया जा सके रेलवे के कारण ब्रिटिश सस्ते उत्पाद गाँवों और कस्बों में भी पहुँचने लगे। पहले इन क्षेत्रों में लोग स्थानी कारीगरों के सामान पर निर्भर रहते थे, लेकिन अब वे सस्ते ब्रिटिश सामान खरीदने लगे। परिणामः गांवों में भी भारतीय हस्तशिल्प की मांग कम हो गई और कारीगरों का रोज़गार छिन गया।
भेदभावपूर्ण कर नीति (Discriminatory Tariff Policy) ब्रिटिश शासन में :
- ब्रिटिश सामान भारत में बिना किसी शुल्क (duty-free) के प्रवेश करते थेजबकि भारतीय वस्तुओं पर विदेश भेजते समय भारी निर्यात शुल्क लगाया जाता था इससे भारतीय सामान विदेशों में महंगे हो गय
ब्रिटिश वस्तुएँ भारत में सस्ती हो गईं यह नीति जानबूझकर इस तरह बनाई गई थी कि भारतीय उद्योग कमजोर पड़े। - परिणाम : भारत का विदेशों में कपड़ा और अन्य हस्तशिल्प का व्यापार लगभग खत्म हो गया।
ब्रिटिश शासन के दौरान अवसंरचना (Infrastructure)
अवसंरचना (Infrastructure) से तात्पर्य उन सुविधाओं और व्यवस्थाओं से है जो आर्थिक विकास का आधार बनती हैं- जैसे परिवहन, संचार, ऊर्जा, बैंकिंग आदि। ब्रिटिश शासन के दौरान भारत में कुछ अवसंरचना अवश्य विकसित की गई, लेकिन इसका उद्देश्य भारत का विकास नहीं था, बल्कि ब्रिटिश आर्थिक हितों की पूर्ति और भारतीय संसाधनों का शोषण था।
मुख्य अवसंरचना तत्व (Major Elements of Infrastructure)
रेलमार्ग (Railways)
भारत में रेलवे की शुरुआत 1853 में हुई, जब पहली ट्रेन मुंबई से ठाणे (34 किमी) चली। इसका वास्तविक उद्देश्य था भारत के आंतरिक क्षेत्रों से कच्चा माल बंदरगाहों तक पहुँचाना ब्रिटिश मशीनों से बनी वस्तुओं को पूरे भारत में फैलाना रेलवे ने भारत के क्षेत्रों को जोड़ा, लेकिन इसने भारतीय उद्योगों के विकास को बढ़ावा नहीं दिया। ब्रिटिश शासन के लिए यह व्यापार विस्तार, प्रशासनिक नियंत्रण और सैन्य उद्देश्यों का साधन था।
बंदरगाह (Ports)
बंदरगाहों का विकास मुख्यतः इस लिए किया गया कि भारत से कच्चा माल तेज़ी से ब्रिटेन भेजा जा सके। ब्रिटेन से आने वाले तैयार माल को उतारने में भी बंदरगाह उपयोगी थे। अंदरुनी जल परिवहन (inland water transport) की पूरी तरह उपेक्षा की गई। उदाहरणः ओडिशा के तट पर एक महत्वपूर्ण बंदरगाह को रेलमार्गों के बढ़ते उपयोग के कारण छोड़ दिया गया। निष्कर्षः बंदरगाह भारतीय जनता की ज़रुरतों के लिए नहीं, बल्कि ब्रिटिश व्यापार प्रणाली को मजबूत करने के लिए बनाए गए।
डाक और तार (Post & Telegraph)
डाक और तार सेवाओं का विकास ब्रिटिशों ने मुख्य रूप से प्रशासनिक नियंत्रण बनाए रखने के लिए किया। इसका उपयोग युद्धों, विद्रोहों एवं आपात स्थितियों म तेज़ संदेश पहुँचाने के लिए किया जाता था।जनता के लिए संचार सुविधाएँ जरूर बढ़ी लेकिन प्राथमिक उद्देश्य भारतीयों को सुविधा देना नहीं, बल्कि शासन को मज रखना था।
सड़कें (Roads)
सड़कें मुख्य रूप से ब्रिटिश सैनिकों की आवाजाही, और कच्चे माल के परिवहन के लिए बनाई गई। बहुत कम सड़कें गाँवों या दूरस्थ क्षेत्रों को जोड़ती थीं। अधिकांश सड़कें मौसम-रोधी (all-weather) नहीं थीं; बारिश में उपयोग करना मुश्किल हो जाता था। इससे स्पष्ट होता है कि सड़क निर्माण भारत के विकास की दृष्टि से नहीं, बल्कि औपनिवेशिक (colonial) ज़रुरतों को पूरा करने के लिए हुआ था।
सुएज़ नहर (Suez Canal - 1869)
मिस्र में बनी यह मानव-निर्मित जलमार्ग भूमध्य सागर को लाल सागर से जोड़ता है। इसके खुलने से भारत और ब्रिटेन के बीच दूरी लगभग 7,000 किमी कम हो ग ब्रिटिश अधिकारियों, सामानों और सैन्य सामग्री का आना-जाना आसान, तेज़ और सस्ता हो गया। इससे ब्रिटेन का भारत पर आर्थिक और राजनीतिक नियंत्रण और अधिक मजबूत हो गया।
ब्रिटिश शासन के दौरान जनसांख्यिकीय प्रोफ़ाइल (Demographic Profile)
ब्रिटिश शासन के दौरान भारत की जनसंख्या से जुड़ी स्थितियाँ बहुत ही दयनीय, पिछड़ी और असंतुलित थीं। जन्मदर, मृत्यु दर, जीवन प्रत्याशा, शिक्षा स्तर और लैंगिक अनुपात – सभी में गंभीर समस्याएँ थीं। ये सभी संकेत बताते हैं क भारत सामाजिक और चिकित्सा सुविधाओं के मामले में बेहद कमजोर था।
उच्च जन्म दर और उच्च मृत्यु दर :
- ब्रिटिश काल में भारत की जन्मदर और मृत्यु दर दोनों ही बहुत अधिक थीं। जन्मदर लगभग 48 प्रति 1000 मृत्यु दर लगभग 40 प्रति 1000 उच्च जन्मदर का कारण था।
- परिवार नियोजन की जानकारी का अभाव, अंधविश्वास और सामाजिक रीति-रिवाजाउच्च मृत्यु दर का मुख्य कारण – बार-बार आने वाले अकाल, गरीबी, कुपोषण, खराब स्वास्थ्य सुविधाएँ, और दवाइयों का अभाव था।इन दोनों के कारण जनसंख्या का प्राकृतिक संतुलन बेहद खराब था।
कम जीवन प्रत्याशा (Low Life Expectancy)
स्वतंत्रता के समय भारत में औसत जीवन प्रत्याशा (Life Expectancy) केवल 32 वर्ष थी। इसका मुख्य कारण था अत्यंत कमजोर चिकित्सा व्यवस्थाप्लेग, हैजा, चेचक जैसी खतरनाक महामारियाँ साफ-सफाई और स्वच्छता की कमी कुपोषण और गरीबी इतनी कम जीवन प्रत्याशा यह दिखाती है कि भारतीय समाज स्वास्थ्य के मामले में कितना पिछड़ा था।
अत्यधिक शिशु मृत्यु दर (High Infant Mortality Rate)
भारत में शिशु मृत्यु दर दुनिया में सबसे अधिक थी – लगभग 218 प्रति 1000 जीवित जन्म। इसके कारणः गर्भवती महिलाओं की ठीक से देखभाल का अभाव नवजात शिशुओं के लिए स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी टीकाकरण (vaccination) की अनुपस्थिति पोषण की कमीयह आँकड़ा दर्शाता है कि भारतीय परिवारों में बच्चे सुरक्षित नहीं थे और स्वास्थ्य-व्यवस्था बेहद कमजोर थी।
कम साक्षरता दर (Low Literacy Rate)
स्वतंत्रता के समय भारत की साक्षरता दर केवल 16% थी।इसमें से महिला साक्षरता तो और भी कम थी। इसका कारणः ब्रिटिशों का उद्देश्य शिक्षा फैलाना नहीं, बल्कि क्लर्क, मुंशी और निचले अधिकारी तैयार करना थाजनसामान्य की शिक्षा पर कोई निवेश नहीं किया गयाग्रामीण क्षेत्रों में स्कूलों का लगभग अभाव था इस प्रकार शिक्षा का लाभ केवल सीमित शहरों और उच्च वर्ग तक सीमित रहा।
असंतुलित लैंगिक अनुपात (Imbalanced Sex Ratio)
भारत में लैंगिक अनुपात (Sex Ratio) बहुत खराब था – 1000 पुरुषों पर केवल 927 महिलाएँ। इसके मुख्य कारण: लड़कियों के प्रति सामाजिक भेदभाव स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी बाल विवाह पोषण की कमी महिलाओं के प्रति उपेक्षायह लैंगिक असमानता भारत की सामाजिक संरचना की गहरी कमियों को दर्शाती है।
जनगणना (Census & Population):
भारत में पहली पूर्ण जनगणना 1881 में की गई थी। इसके बाद हर 10 साल में जनगणना की परंपरा शुरू हुई।
राष्ट्रीय आय का अनुमान (GDP Estimation):
भारत की राष्ट्रीय आय का पहला अनुमान लगाने वाले व्यक्तिः दादाभाई नौरोजीपहली व्यवस्थित और वैज्ञानिक गणना करने वाले अर्थशास्त्री: डॉ. वी.के.आर.वी.राव
रेलमार्ग (Railways) भारत की पहली रेलगाड़ी:
16 अप्रैल 1853 रुट: मुंबई (बोटी बंदर) → ठाणे (34 किमी)
सुएज़ नहर (Suez Canal) खुली:
1869 भारत और ब्रिटेन के बीच दूरी लगभग 7000 किमी कम हो गई।
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