कक्षा 12 इतिहास अध्याय 4 के नोट्स हिंदी में
विचारक विश्वास और इमारतें notes
यहाँ हम कक्षा 12 इतिहास के 4th अध्याय “विचारक विश्वास और इमारतें” के नोट्स उपलब्ध करा रहे हैं। इस अध्याय में “विचारक विश्वास और इमारतें“ का दौर से जुड़ी प्रमुख विशेषताओं का अध्ययन किया गया है।
ये नोट्स उन छात्रों के लिए उपयोगी सिद्ध होंगे जो इस वर्ष बोर्ड परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं। सरल और व्यवस्थित भाषा में तैयार की गई यह सामग्री अध्याय को तेजी से दोहराने और मुख्य बिंदुओं को याद रखने में मदद करेगी।
कक्षा 12 इतिहास अध्याय 4 के नोट्स हिंदी में , विचारक विश्वास और इमारतें notes

class 12 History chapter 4 notes in hindi
स्तूप क्या होते है?
स्तूप (Stupa) प्राचीन भारतीय स्थापत्य कला का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा हैं। सरल शब्दों में कहें तो स्तूप एक गुम्बदाकार ढांचा होता है, जो किसी महान व्यक्ति (विशेषकर बुद्ध, जैन तीर्थंकर, या संत) की स्मृति में या उनकी अस्थियों को सुरक्षित रखने के लिए बनाया जाता था।
मुख्य विशेषताएँ :
- गोल या अर्धगोलाकार आकार (गुम्बद)
- इसके अंदर एक धातु या अस्थियों की पेटिका रखी जाती थी ।
- स्तूप के चारों ओर परिक्रमा (pradakshina) पथ होता था ।
- ऊपर चोटी पर एक छत्र (chhatra) होता था, जो सम्मान और संरक्षण का प्रतीक होता है।
- स्तूप के चारों दिशाओं में तोरण (द्वार) बनाए जाते थे, जिन पर सुंदर नक्काशी होती थी।
- बुद्ध का जन्म – लुम्बिनी
- ज्ञान हासिल किया – बौधगया
- पहला उपदेश दिया – सारनाथ
- निब्बान (निर्णान) प्राप्त किए – कुशी नगर
महत्व :
- बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार में स्तूपों का बड़ा योगदान रहा।
- ये न केवल धार्मिक स्थल थे, बल्कि कला, शिल्प और स्थापत्य के अद्भुत उदाहरण भी हैं।
- प्रसिद्ध उदाहरण: सांची स्तूप (मध्यप्रदेश), भरहुत स्तूप, अमरावती स्तूप, सांची के तोरण आदि।
स्तूप क्यों बनाए जाते थे ?
1.बुद्ध और महापुरुषों की स्मृति में:-
स्तूप मुख्यतः गौतम बुद्ध, जैन तीर्थंकरों या किसी संत-महात्मा की याद में बनाए जाते थे। उनके शरीर के अवशेष (जैसे अस्थियाँ, दांत, वस्त्र या उपयोगी वस्तुएँ) या पवित्र चिन्हों को स्तूप में रखा जाता था, ताकि लोग उनका सम्मान कर सकें।
2.पूजा और परिक्रमा के लिए:-
स्तूप के चारों ओर परिक्रमा करना धार्मिक कार्य माना जाता था। लोग वहाँ आकर स्तूप की पूजा करते, ध्यान लगाते और मानसिक शांति पाते थे।
3.बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए:-
अशोक के समय, पूरे भारत और एशिया में स्तूपों का निर्माण हुआ
4.कला और स्थापत्य के प्रतीक:-
उन पर बनी नक्काशियाँ, मूर्तियाँ और चित्रकथाएँ स्थानीय कला का सुंदर उदाहरण थीं
5.संगठित समाज और समुदाय का केंद्र:-
शिक्षा, चर्चा, धर्मोपदेश, और सांस्कृतिक गतिविधियाँ होती थीं।
स्तूप कैसे बनाए गए ?
- पवित्र अवशेषों (Relics) को सुरक्षित करना
- मिट्टी, पत्थर, ईंट से अर्धगोलाकार गुम्बद (Anda) बनाना
- चबूतरा (Medhi) और परिक्रमा पथ (Pradakshina Path) तैयार करना
- शिखर पर हरमिका और छत्र (Harmika और Chhatra)
- घेरे के चारों ओर तोरण (Torana) और वेदिका (Vedika)
स्तूप बनाने में किन-किन लोगो का योगदान होता था ?
- राजा और शासक – सबसे बड़ा आर्थिक और राजनीतिक सहयोग राजा या सम्राट देता था। उदाहरणः सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म के प्रचार में 84,000 स्तूप बनवाए
- व्यापारी और अमीर दानदाता – कई अमीर व्यापारी, साहूकार और गिल्ड (श्रेणियाँ) स्तूपों के निर्माण में आर्थिक सहायता देते थे। उनकी दी हुई धनराशि से नक्काशी, तोरण, मूर्तियाँ बनती थी
- बौद्ध भिक्षु (संघ) – बौद्ध संघ (मठवासी समुदाय) योजना बनाते थे, अवशेषों की व्यवस्था करते थे और धार्मिक अनुष्ठानों का संचालन करते थे।
- शिल्पकार,कलाकार और स्थापत्य विशेषज्ञ – मूर्तिकार , चित्रकार , वास्तुकार और मजदूर। सभी मिलकर स्तूप की सुंदरता रचते थे।
- सामान्य जनता – लोग छोटे – छोटे दान देते थे जैसे श्रमदान।
स्तूप की संरचना
- स्तूप को संस्कृत में टीला कहा जाता है।
- इसका जन्म एक गोलार्ध लिए हुए मिट्टी के टीलें से हुआ, जिसे कुछ समय बाद अंड कहा गया ।
- धीरे-धीरे इसकी संरचना अधिक जटिल हो गई जिसमे चौकोर तथा गोल आकारों का संतुलन बनाया गया ।
- अंड के ऊपर एक हर्मिका होती थी यह ढांचा छज्जे जैसा होता था एवं यह देवताओं के घर का प्रतिक था
- टीले के चारों तरफ एक वेदिका होती थी जो पवित्र स्थान को सामान्य दुनिया से पृथक करती थी ।
स्तूपों की खोज किस प्रकार हुआ?
- 1796 में एक स्थानीय राजा को (जो मंदिर बनाना चाहते थे) अचानक अमरावती के स्तूप के अवशेष प्राप्त हो गए।
- उन्होंने उसके पत्थरों के प्रयोग करने का निश्चय किया। उन्हें ऐसा लग रहा था की इस छोटी सी पहाड़ी में शायद कोई खजाना छुपा हो।
- कुछ सालों के पश्चात् कालीन मेकेंजी नामक एक अंग्रेज अफसर इस क्षेत्र से गुजरे ।
- यद्दपि उन्होंने अनेक मूर्तियाँ पाई तथा उनका विस्तृत चित्रांकन भी किया, परन्तु उनकी रिपोर्ट कभी छपी नहीं।
- 1854 में गुटूर (आंध्रप्रदेश) के कमिश्नर ने अपनी अमरावती यात्रा के दौरान अनेक मूर्तियाँ तथा पत्थर जमा किये और मद्रास लेके चले गए।
- 1850 के दशक में अमरावती के उत्कीर्ण पत्थर भिन्न-भिन्न स्थानों पर जा रहे थे। जैसे कलकत्ता में एशियाटिक सोसाइटिक ऑफ बंगाल पहुंचें | तो कुछ मद्रास कुछ लंदन । उनको मना करों तो वो कहते थे पहले के लोगों को नहीं रोका तो अब क्यों रोक रहे है।
साँची के स्तूप में को बचाने भोपाल के शासकों का क्या योगदान था?
1. 19वीं सदी की शुरुआत (ब्रिटिश काल):-
जब ब्रिटिश अधिकारी और खोजकर्ता भारत में आए, तो उन्होंने साँची के स्तूप को खंडहरों की हालत में पाया। यहाँ से बहुत सारी मूर्तियाँ, तोरणों की नक्काशियाँ चोरी होने लगीं और विदेशी संग्रहालयों में पहुँच गईं।
2. भोपाल रियासत की जागरूकता
उस समय भोपाल रियासत की शासक थीं शाह जहाँ बेगम और बाद में उनकी बेटी सुल्तान जहाँ बेगम। उन्होंने ब्रिटिश अधिकारियों के साथ मिलकर इस बात की चिंता जताई कि साँची की ऐतिहासिक धरोहर सुरक्षित रहनी चाहिए।
महत्वपूर्ण कदम उठाएं भोपाल के शासकों ने :-
- ब्रिटिश पुरातत्वविदों (जैसे सर जॉन मार्शल) को संरक्षण कार्य की अनुमति दी।
- स्थानीय स्तर पर चोरों और लुटेरों पर रोक लगाने के लिए व्यवस्थाएँ कीं।
- स्तूप और उसके आसपास की जमीन को कानूनी संरक्षण दिलाया ताकि कोई निजी कब्जा या नुकसान न पहुंचा सके।
3. पुरातत्व विभाग (ASI) के साथ सहयोग :-
- भोपाल रियासत ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (Archaeological Survey of India) को सहयोग दिया ताकि :
- टूटी हुई संरचनाओं की मरम्मत हो सके।
- खुदाई और खोज करके असली संरचना को बहाल किया जा सके।
- पर्यटकों के लिए इस स्थल को संरक्षित किया जा सके।
निष्कर्ष:-
- अगर भोपाल रियासत और खासकर उसकी जागरूक रानियों ने समय पर कदम न उठाए होते, तो आज साँची का स्तूप शायद केवल इतिहास की किताबों में बचा होता, असल में नहीं।
- सुल्तानाजहाँ ने वहाँ एक संग्रहालय और अतिथिशाला बनाने के लिए अनुदान दिया । वहाँ रहते हुए भी जॉन मार्शल ने उपयुक्त पुस्तकें लिखी।
विश्व इतिहास में ईसा पूर्ण प्रथम सहस्राब्दी के काल को एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में क्यों माना जाता है ?
- प्रमुख सभ्यताओं और साम्राज्यों का उदय:- इस काल में फारस, यूनान, रोम, मौर्य, जैसी महान सभ्यताएँ और साम्राज्य उभरे।
- बड़े धार्मिक और दार्शनिक आंदोलनों की शुरुआत:- भारत में हिंदू धर्म, बौद्ध धर्म, जैन धर्म मजबूत हुए, इसी प्रकार चीन में कन्फ्यूशियनिज्म और ताओवाद उभरे
- लेखन प्रणाली और साहित्य का विकास:- (ग्रीक, लैटिन, संस्कृत, चीनी जैसी भाषाओं में महान ग्रंथ और साहित्य रचे गए)
- व्यापार और संपर्क का विस्तार:- समुद्री व्यापार, भूमि व्यापार मार्गों का विस्तार हुआ
- दूर-दूर तक संस्कृतियों, वस्तुओं और विचारों का आदान-प्रदान शुरू हुआ, बड़े साम्राज्यों में संगठित सेनाएँ, कर व्यवस्था, सड़कें, और किले बने। युद्ध तकनीक (लोहे का उपयोग) में सुधार हुआ।
यज्ञों की परंपरा
1. प्राचीन वैदिक काल में लोग प्राकृतिक शक्तियों :-
(सूर्य, अग्नि, वायु, इंद्र, वरुण) को देवता मानते थे। उन्हें लगता था कि यज्ञ करके इन देवताओं को प्रसन्न किया जाए, ताकि वर्षा, अच्छी फसल, सुरक्षा और समृद्धि मिल सके।
2. सामूहिक एकता और सामाजिक आयोजन के लिए :-
इसमें राजा, पुरोहित, प्रजा, व्यापारी – सभी एकत्र होकर भाग जिससे सामाजिक एकता मजबूत होती थी।
2. दान और पुण्य कमाने के लिए :-
लोग मानते थे कि इससे पुण्य मिलेगा और अगले जन्म में या मृत्यु के बाद स्वर्ग की प्राप्ति होगी।
3. धार्मिक और आध्यात्मिक विश्वासों के कारण :-
- यह माना जाता था कि यज्ञ करने से पाप नष्ट होते हैं, आत्मा शुद्ध होती है और ब्रह्मांडीय संतुलन बना रहता है।
- बड़े राजाओं के यज्ञ (राजसूय, अश्वमेध, वाजपेय) उनके बल, सत्ता और समृद्धि का प्रदर्शन करते थे। इससे राजा की मान्यता और प्रतिष्ठा बढ़ती थी।
वाद विवाद और चर्चाएं
- बौद्ध ग्रंथो में जीवंत चर्चाओं एवं विवादों की एक झांकी मिलती है। शिक्षक का कार्य एक स्थान से दुसरे स्थान तक घूम-घूम के अपने दर्शक अथवा विश्व के बारे में अपनी समक्ष को लेकर एक-दुसरे से और सामान्य लोगों से तर्क-वितर्क करना था।
- ये चर्चाएँ कुटगारशालाओं (यानि नुकीली छत वाली झोपड़ी) अथवा ऐसे उपवनों में होती थी जहाँ घुमक्कड़ मनीषी ठहरा करते थे।
- अगर एक शिक्षक अपने प्रतिद्वंदी को अपने तर्कों द्वारा समझा लेता था तो वह अपने अनुयायिकों के साथ शिष्य बन जाता था, इसलिए किसी भी संप्रदाय के लिए समर्थन में समय के साथ कम ही बढ़ोतरी होती रहती थी।
महात्मा बुद्ध : जीवन परिचय
जन्म : -
- असली नाम : सिद्धार्थ गौतम
- जन्म : लगभग 563 ईसा पूर्व, लुंबिनी (वर्तमान नेपाल)
- पिता : शुद्धोधन (शाक्य गणराज्य के राजा)
- माता : महामाया देवी
शाही जीवन : -
- बचपन से ही राजकुमार के रूप में विलासिता में पले।
- विवाह : यशोधरा से, एक पुत्र : राहुल ।
- लेकिन हमेशा जीवन के दुख और प्रश्नों को लेकर बेचैन रहे।
महात्याग : -
- 29 वर्ष की उम्र में घर-परिवार, महल, राज्य छोड़कर
- सत्य की खोज में निकल पड़े।
- कारण : उन्होंने वृद्ध, रोगी, मृत व्यक्ति और संन्यासी को देखा, और महसूस किया कि जीवन में दुख अपरिहार्य है।
चार घटनाएँ जिससे महत्मा बुद्ध प्रभावित हुए :-
- बुजुर्ग व्यक्ति
- बीमार व्यक्ति
- एक मृत व्यक्ति
- एक सन्यासी
ज्ञान प्राप्ति (बोधि) : -
- कई वर्षों तक साधना, तप, ध्यान किया।
- अंततः बोधगया (बिहार) में पीपल के पेड़ के नीचे 35 वर्ष की उम्र में ज्ञान प्राप्त किया।
- तब वे सिद्धार्थ से बुद्ध (जाग्रत) कहलाए।
- धर्म प्रचार : –
- सारनाथ (वाराणसी के पास) में पहला उपदेश दिया (धर्मचक्र प्रवर्तन)।
- अहिंसा, करुणा, मध्यम मार्ग, अष्टांगिक मार्ग का संदेश दिया।
- उनके शिष्य समुदाय (संघ) का विस्तार हुआ, राजा-जनता तक उनके उपदेश पहुँचे।
महापरिनिर्वाण :-
- लगभग 80 वर्ष की उम्र में कुशीनगर (उत्तर प्रदेश) में महापरिनिर्वाण (मृत्यु) को प्राप्त हुए।
- मुख्य संदेश :-
- जीवन दुखमय है, दुख का कारण तृष्णा (इच्छा) है।
- दुख की निवृत्ति संभव है, और उसका मार्ग अष्टांगिक मार्ग है।
- अहिंसा, करुणा, शील (आचरण), और समाधि (ध्यान) पर बल।
महात्मा बुध की प्रमुख शिक्षाएं
1.चार आर्य सत्यम
- दुखः- जीवन में दुख है।
- दुख का कारण :- तृष्णा (इच्छा, लालच) है।
- दुख की निवृत्ति :- दुख समाप्त किया जा सकता है।
- दुख निवृत्ति का मार्ग :- अष्टांगिक मार्ग का पालन करना चाहिए।
2. अष्टांगिक मार्ग
- सम्यक दृष्टि (सही दृष्टिकोण)
- सम्यक संकल्प (सही विचार)
- सम्यक वाक (सही वाणी)
- सम्यक कर्म (सही आचरण)
- सम्यक आजीविका (सही जीवनयापन)
- सम्यक प्रयास (सही प्रयास)
- सम्यक स्मृति (सही स्मृति/सचेतना)
- सम्यक समाधि (सही ध्यान)
3. पंचशील (Five Precepts)
- हिंसा न करना
- चोरी न करना
- असत्य न बोलना
- व्यभिचार न करना
- नशा न करना
4. मध्यम मार्ग (Middle Path)
- न अधिक भोग,
- न अधिक तपस्या,
- जीवन में संतुलन।
5. करुणा और अहिंसा
- सभी प्राणियों के प्रति करुणा और दया रखना।
- हिंसा, द्वेष, ईर्ष्या का त्याग करना।
बौद्ध परंपरा के अनुसार अपने शिष्यों के लिए उन्होंने जो आखिरी निर्देश दिया वो इस प्रकार था, “तुम सब अपने लिए खुद ही ज्योति बनों क्योकिं तुम्हे खुद ही अपनी मुक्ति का रास्ता ढूढना है”।
बुद्ध के अनुयायी
- महात्मा बुद्ध के उपदेशों से प्रभावित होकर उनके अनुयायियों ने संघ की स्थापना की।
- इस संघ से रहने वाले का जीवन सदा होता था।
- उनके पास जीवनयापन के लिए अति आवश्यक चीजों के अतिरिक्त कुछ नहीं होता था।
- जैसे की दिन में एक बार उपासकों से भोजन दान पाने के लिए वे एक कटोरा रखते थे।क्योंकि वे दान पर आश्रित थे इसलिए उन्हें भिक्खु कहाँ गया ।
- आरंभ में पुरुष ही संघ में शामिल हो सकते थे।
- बाद में शिष्य आनंद ने बुद्ध को समझाकर औरतों के संघ में आने की अनुमति हासिल की।
- बुद्ध की उपमाता महाप्रजापति गोमती संघ में आने वाली प्रथम भिक्खुनी बनी ।
- जो औरत निर्वाण प्राप्त कर लेती थी उन्हें थेरी कहा गया।
- बुद्ध के अनुयायी सभी सामाजिक वर्गों से आए । इनमें राजा, धनवान, गृहपति तथा सामान्य जन कर्मकार, दास, शिल्पी, सभी सम्मिलित थे ।
- एक बार संघ में शामिल होने के बाद सभी को समान माना जाता था और पुरानी पहचान को छोड़ने पड़ती थी
- बौद्ध धर्म का प्रसार न सिर्फ बुद्ध के जीवन काल में हुआ बल्कि उनकी मृत्यु के बाद भी इस धर्म का व्यापक प्रसार हुआ। क्योंकि बौद्ध शिक्षाओं में अच्छे आचरण एवम मूल्यों को महत्व दिया गया।
महावीर स्वामीः संक्षिप्त परिचय
जन्म : -
- पूरा नाम : वर्धमान महावीर
- जन्म : 599 ईसा पूर्व, कुण्डलपुर (वर्तमान बिहार)
- पिता : सिद्धार्थ (क्षत्रिय राजा, ज्ञात्रिक कुल)
- माता : त्रिशला देवी
जीवन की शुरुआत :-
- राजकुमार के रूप में विलासितापूर्ण जीवन जीया।
- 30 वर्ष की उम्र में घर-परिवार त्यागकर साधना और सत्य की खोज में निकल पड़े।
जैन धर्म का प्रचार
- 12 वर्षों की कठोर तपस्या के बाद उन्हें कैवल्य ज्ञान (पूर्ण ज्ञान) प्राप्त हुआ।
- वे जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर बने।
- ये पाँच महाव्रत सिखाए- अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी न करना), ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह (संपत्ति का त्याग)
मृत्यु (निर्वाण)
- 527 ईसा पूर्व, पावापुरी (बिहार) में महापरिनिर्वाण प्राप्त हुआ।
- उनके उपदेशों पर आधारित जैन धर्म आज भी अहिंसा और तपस्या का उदाहरण माना जाता है।
जैन दर्शन की सबसे अहम अवधारणा :-
- पूरा विश्व प्राणवान है।
- पत्थर, चट्टान एवं पानी में भी जीवन होता है।
- जीवों के प्रति अहिंसा-विशेषकर इनसानों, पशुओं, पेड़-पोधों तथा कीड़े-मकोड़े को न मरना जैन दर्शन का केंद्र बिंदु है।
- जैन मान्यता के अनुसार जन्म एवं पुनर्जन्म का चक्र कर्म के द्वारा तय होता है।
- कर्म के चक्र से मुक्ति के लिए त्याग तथा तपस्या की आवश्यक होती है।
- यह विश्व के त्याग से ही संभव हो जाता है।
संग्रहालय में मूर्ति या पत्थर को लेकर पुरातत्ववेत्ता एच. एच. कोल के क्या विचार थे?
- उन्होंने लिखा “इस देश की प्राचीन कलाकृतियाँ की लुट होने देना मुझे आत्मघाती और असमर्थनीय नीति लगती है
- उनका विचार था की संग्रहालयों में मूर्तियाँ की प्लास्टर प्रतिकृतियाँ रखी जानी चाहिए जबकि असल कृतियाँ खोज की जगह पर हो रखी जानी चाहिए ।
साँची कैसे बच गया तथा अमरावती स्तूप नष्ट हो गया ?
- साँची के स्तूपों को भोपाल की बेगमों (शाहजहाँ बेगम, सुल्तान जहाँ बेगम) का संरक्षण मिला।
- 19वीं सदी में जब यूरोपीय लोग (जैसे ब्रिटिश खोजकर्ता) वहाँ पहुँचे, तब तक स्थानीय राजाओं ने उसे लूटने-तोड़ने से बचाया था।
- ब्रिटिश पुरातत्वविद (जैसे जॉन मार्शल) ने भी संरक्षण और मरम्मत का काम किया।
- साँची कभी मुख्य तीर्थस्थल नहीं बना, इसलिए वहाँ ज्यादा धार्मिक या राजनीतिक संघर्ष नहीं हुए, जिससे वह बर्बादी से बचा रहा।
अमरावती स्तूप क्यों नष्ट हो गया ?
- अमरावती (आंध्र प्रदेश) का स्तूप बहुत प्रसिद्ध और भव्य था, लेकिन समय के साथ वह उपेक्षा में चला गया।
- 18वीं-19वीं सदी में वहाँ के स्थानीय राजाओं और अंग्रेजों ने स्तूप की मूर्तियाँ और सजावटी पत्थर तुड़वाकर अलग-अलग
- जगह बेच दिए या संग्रहालयों में भिजवा दिए।
- कई मूर्तियाँ ब्रिटिश म्यूजियम और चेन्नई के संग्रहालयों में पहुँच गईं।
- संरक्षण की कमी और लूटपाट के कारण अमरावती स्तूप लगभग पूरी तरह खत्म हो गया।
मूर्तिकला
- मूर्तिकला के द्वारा पत्थरों ने कई प्रकार की कथाएँ गढ़ी जाती थी।
- मूर्तिकला के माध्यम से तोरण को एक भाग दानी राजकुमार अपना सब कुछ ब्राह्मण को सौप दिया तथा खुद अपनी पत्नी एवं बच्चों को साथ वन में रहने चला गया ।
- इसके आलावा मूर्तियों के द्वारा भगवान बुद्ध को उपासन का प्रतिक माना गया।
- बौद्ध चरित लेखन के अनुसार एक पेड़ के निचे ध्यान करते हुए बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई।
लोक परंपराएं
- साँची में कुछ सुंदर स्त्रियाँ भी मूर्तियाँ में उत्कीर्णित है
- जो तोरणाद्वार के किनारे एक पेड़ को पकड़ कर झूलती हुई दिखाती है। यह मूर्ति शालमंजिका की मूर्ति है।
- लोक परंपरा से यह माना जाता है की इस स्त्री द्वारा छूए जाने से वृक्ष में फुल खिल उठते थे और फल होने लगते थे।
- शुभ का प्रतिक मान जाता था ।
- साँची में जातको से ली गई जानवरों की कहानियां है, ऐसे लगता है की यहाँ यह लोगों को आकर्षित करने के लिए जानवरों का उत्कीर्ण किया गया था।
- एक महिला मूर्ति को इतिहासकारों ने बुद्ध की माँ माया से जोड़ा है दुसरे इतिहासकार इसे एक लोकप्रिय देवी गजलक्ष्मी मानते है इन उत्कीर्णित मूर्तियों को देखने वाले उपासक इसे माया और गजलक्ष्मी दोनों से जोडते थे।
- कई स्तंभों में सर्पों का उत्कीर्णन मिलता है साँची में वृक्ष और सर्प पूजा का केंद्र माना था।
नियतिवादी और भौतिकवादी
- नियतिवाद का मतलब होता है। हर घटना पहले से तय (निर्धारित) है, और उसे कोई बदल नहीं सकता।
- यानी जो भी होता है, वो भाग्य, ईश्वर या पूर्व-निर्धारित नियमों के कारण होता है।
- भौतिकवाद का मतलब होता है: सिर्फ पदार्थ (matter) और भौतिक चीजें असली हैं, बाकी सब (जैसे आत्मा, ईश्वर)का अस्तित्व नहीं है।
- जो दिखता, छूता, मापा जा सकता है – वही असली है।
- विचार, भावना, आत्मा जैसी चीजें भी दिमाग और शरीर की क्रियाओं का नतीजा मानी जाती हैं।
उदाहरण :
- जीवन और मृत्यु सिर्फ जैविक घटनाएँ हैं, कोई आत्मा या पुनर्जन्म नहीं।
- नैतिकता या सोच भी दिमाग के रासायनिक और भौतिक बदलावों का परिणाम है।
- मक्खाली गोसाल एक नियतिवादी दार्शनिक थे एवं अजित केसकंबलिन भौतिकवादी दार्शनिक थे।
वैष्णववाद और शैववाद
वैष्णववाद (Vaishnavism) क्या है?
- यह हिन्दू धर्म की एक प्रमुख परंपरा है, जिसमें भगवान विष्णु और उनके अवतारों (राम, कृष्ण, वामन, नरसिंह आदि) को परम देवता माना जाता है।
- वैष्णव भक्त विष्णु को सृष्टि का रक्षक (संरक्षक) मानते हैं।
- इनके पूजा-पाठ में विष्णु, लक्ष्मी, राम-सीता, राधा-कृष्ण, जगन्नाथ जैसे रूपों की प्रमुखता होती है।
- गीता, भागवत पुराण, विष्णु सहस्रनाम जैसे ग्रंथ इनके लिए महत्वपूर्ण हैं।
मुख्य विशेषताएँ:
- अहिंसा, भक्ति, प्रेम
- विष्णु या उनके अवतारों की मूर्ति या चित्र की पूजा
- विष्णु के वाहन गरुड़ और चिह्न शंख, चक्र का महत्व
शैववाद (Shaivism) क्या है?
- यह हिन्दू धर्म की दूसरी प्रमुख परंपरा है, जिसमें भगवान शिव को परम देवता माना जाता है।
- शैव भक्त शिव को सृष्टि का संहारक (विध्वंसक) और ध्यान, तपस्या के प्रतीक के रूप में पूजते है।
- इनके पूजा-पाठ में शिवलिंग, नटराज, पार्वती, गणेश, कार्तिकेय की प्रमुखता होती है।
- शिवपुराण, लिंगपुराण, शिव-सहस्रनाम इनके लिए महत्वपूर्ण ग्रंथ हैं।
मुख्य विशेषताएँ:
- योग, ध्यान, तपस्या
- शिवलिंग या नटराज रूप की पूजा
- शिव के वाहन नंदी और चिह्न त्रिशूल, डमरू का महत्व
हीनयान और महायान
हीनयान (Hinayana)
अर्थ:- ‘हीन’ = छोटा या तुच्छ, ‘यान’ = मार्ग या वाहन → यानी छोटा मार्ग। हीनयान के अनुयायी खुद को थेरवाद मानते हैं।)
मुख्य विशेषताएँ:
- मुक्ति का रास्ता व्यक्तिगत साधना से (Personal salvation)
- बुद्ध को केवल एक महान गुरु (महापुरुष) मानते हैं, ईश्वर या देवी-देवता नहीं।
- कठोर अनुशासन और मूल शिक्षा (original teachings) पर जोर।
- आदर्शः- अर्हत यानी जिसने स्वयं मोक्ष प्राप्त कर लिया है।
महायान (Mahayana)
अर्थः- ‘महा’ = बड़ा, ‘यान’ = मार्ग या वाहन → यानी महान मार्ग।
मुख्य विशेषताएँ:
- मुक्ति सिर्फ खुद के लिए नहीं, बल्कि सभी प्राणियों के लिए (Universal salvation) I
- बुद्ध को ईश्वर तुल्य मानना, उनके अनेक रूपों और बोधिसत्वों की पूजा।
- लचीलापन, दया (करुणा) और पूजा-पद्धतियों पर जोर।
- आदर्श बोधिसत्व योनी जिसने मोक्ष के द्वार पर पहुँचकर भी दूसरों की सहायता के लिए रुके।
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