कक्षा 12 राजनीति विज्ञान अध्याय 7 के नोट्स हिंदी में
क्षेत्रीय आकांक्षाएँ notes

यहाँ हम कक्षा 12 राजनीतिक विज्ञान के 7th अध्याय “क्षेत्रीय आकांक्षाएँ” के नोट्स उपलब्ध करा रहे हैं। इस अध्याय में “क्षेत्रीय आकांक्षाएँ” से जुड़ी प्रमुख विशेषताओं का अध्ययन किया गया है।

ये नोट्स उन छात्रों के लिए उपयोगी सिद्ध होंगे जो इस वर्ष बोर्ड परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं। सरल और व्यवस्थित भाषा में तैयार की गई यह सामग्री अध्याय को तेजी से दोहराने और मुख्य बिंदुओं को याद रखने में मदद करेगी।

कक्षा 12 राजनीतिक विज्ञान अध्याय 7 के नोट्स हिंदी में, क्षेत्रीय आकांक्षाएँ notes

कक्षा 12 राजनीतिक विज्ञान अध्याय 7 के नोट्स हिंदी में, क्षेत्रीय आकांक्षाएँ notes

class 12 Political Science book 2 chapter 7 notes in hindi

क्षेत्रवाद का अर्थ

  1. क्षेत्रवाद से अभिप्राय किसी देश के उस छोटे से क्षेत्र से है जो औद्योगिक, सामाजिक आदि कारणों से अपने पृथक अस्तित्व के लिए जागृत है
  2. क्षेत्रवाद केन्द्रीयकरण के विरुद्ध क्षेत्रीय इकाइयों को अधिक शक्ति व स्वायत्तता प्रदान करने के पक्ष में है।

क्षेत्रवाद के उदय के कारण :-

1. भाषावाद :-

क्षेत्रवाद का एक महत्वपूर्ण कारण भाषावाद है। भारत में सदैव ही अनेक भाषाएँ बोलने वालों ने कई बार अलग राज्य के निर्माण के लिए व्यापक आंदोलन किया है

2.जातिवाद :-

जातिवाद ने भी क्षेत्रीयवाद की उत्पत्ति में महत्वपूर्ण योगदान दिया । जिन क्षेत्रों में किसी एक जाति की प्रधानता रही है वहीँ पर क्षेत्रवाद का उग्र रूप देखने को मिलता है

3. धर्म :-

धर्म भी कई बार क्षेत्रवाद की भावनाओ को बढ़ने में सहायता करता है।

4.आर्थिक कारण :-

क्षेत्रीवाद की उत्पत्ति में आर्थिक पिछड़ापन ने भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है। अविकसित क्षेत्रों ने अलग राज्य की स्थापना के लिए आंदोलन किए है पिछड़े क्षेत्रो में यह भावना उभरी है की यदि सत्ता उनके पास होती तो उनके क्षेत्र पिछड़े न रह जाते।

अलगाववाद / पृथक्कतावाद :-

अलगाववाद से अभिप्राय एक राज्य से कुछ क्षेत्र को अलग करके स्वतंत्र राज्य की स्थापना की मांग है। अर्थात सम्पूर्ण इकाई से अलग अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाए रखने की मांग अलगाववाद है। अलगाववाद का उदय तब होता है जब क्षेत्रवाद की भावना उग्र रूप धारण कर लेती है। उदहारण के लिए भारत में मिजो आन्दोलन, नागालैंड आन्दोलन इत्यादी आन्दोलन भारतीय संघ से अलग होने के लिए चलाये गए। यह पृथक्कतावाद के उदहारण है।

अलगाववाद के दो कारण:-

1.राजनीतिक कारण:-

अलगाववाद की भावनाओं को भड़काने में राजनीतिज्ञो का भी हाथ रहा है। कई राजनीतिज्ञ यह सोचते है की यही उनके क्षेत्र को अलग राज्य बना दिया जायेगा तो इससे उनकी राजनीतिक महत्वकांक्षाओं की पूर्ति हो जाएगी।

2.आर्थिक पिछड़ापन :-

अलगाववाद की उत्पत्ति में आर्थिक पिछड़ापन महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। कुछ प्रदेशों का भारत में अधिक विकास हुआ है और कुछ क्षेत्रों का विकास बहुत कम हुआ है। अतः पिछड़े क्षेत्रों में यह भावना उभरती है की यही सत्ता उनके पास होती तो उनके क्षेत्र पिछड़े न रह जाते। इसलिए इन क्षेत्रों में अलग राज्य की मांग को लेकर अलगाववाद उत्पन्न होता है।

भारत सरकार का क्षेत्रवाद पर नजरिया

  1. भारत के संविधान एवं राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया के बारे में ये बात साफ लिखी हुई है कि भारत में विभिन्न क्षेत्र तथा भाषायी समूहों को अपनी संस्कृति बनाए रखने का हक होगा।
  2. भारतीय राष्ट्रवाद ने एकता और विविधता के बीच संतुलन साधने की चेष्टा की है।
  3. भारत ने विविधता के प्रश्न पर लोकतान्त्रिक नजरिया अपनाया ।
  4. लोकतंत्र में क्षेत्रीय आकांक्षाओं की राजनीतिक अभिव्यक्ति की मंजूरी है और लोकतंत्र क्षेत्रवाद को राष्ट्र – विरोधी नहीं मानता ।
  5. लोकतांत्रिक राजनीति में विभिन्न दल तथा समूह क्षेत्रीय पहचान, आकांक्षा या किसी विशेष क्षेत्रीय समस्या को आधार बनाकर, लोगों की भावनाओं को बिना ठेस पहुंचाए, अपने हक के लिए अपनी बात रख सकता है।
  6. कभी कभी ऐसी स्थिती भी विकराल रूप धारण कर लेती है जिससे देश के लिए खतरा पैदा हो जाता है।

तनाव के दायरे :-

  1. स्वतंत्रता के तुरंत पश्चात् हमारे देश को बँटवारा, विस्थापन, देशी रियासतों के विलय एवं राज्यों के पुनर्गठन जैसे कठिन मुद्दों से जूझना पड़ा।
  2. आजादी के एकदम बाद जम्मू-कश्मीर का मामला सामने आया ।
  3. पूर्वोत्तर के कुछ हिस्सों में भारत का अंग होने के मसले पर सहमति नहीं थी जैसे नागालैंड, फिर मिजोरम में भारत से पृथक होने की मांग करते हुए जोरदार आन्दोलन चले।
  4. भारत के दक्षिण में द्रविड़ आन्दोलन से जुड़े कुछ वर्गों ने एक समय पृथक राष्ट्र की बात उठाई थी।
  5. देश के अनेक भागों में अलगाववाद आंदोलन चलने लगे थे।
  6. कई जगह पर भाषा के नाम पर अलग राज्यों की मांग होने लगी थी।
  7. 1950 के दशक के उत्तरार्द्ध से पंजाबी भाषी लोगों ने अपने लिए एक पृथक राज्य बनाने की आवाज उठानी आरंभ कर दी।

जम्मू एवं कश्मीर

  1. भारत और पाकिस्तान के मध्य स्वतंत्रता व बंटवारे के समय से ही कश्मीर मुद्दा गंभीर रहा है।
  2. जम्मू और कश्मीर में तीन राजनीतिक एवं सामाजिक क्षेत्र सम्मिलित है – जम्मू, कश्मीर और लद्दाख।

  3. कश्मीर घाटी को कश्मीर के दिल के तौर पर देख जाता है जहाँ अधिकतर मुस्लिम है, कश्मीरी भाषी लोगों में अल्पसंख्यक हिन्दू भी सम्मिलित हैं।
  4. जम्मू क्षेत्र पहाड़ी तलहटी और मैदानी इलाके का मिश्रण है जहाँ हिन्दू, मस्लिम और सिख अर्थात अनेक धर्म और भाषाओं के लोग रहते हैं।
  5. लद्दाख पर्वतीय क्षेत्र है जहाँ बौद्ध और मुस्लिमों की जनसंख्या है,
  6. ‘कश्मीर मुद्दा’ भारत व पाकिस्तान के मध्य केवल विवाद भर नहीं है । राजनीतिक स्वायत्तता का मुद्दा भी इसी से जुड़ा हुआ है।

समस्या की जड़े :-

  1. 1947 से पूर्व जम्मू व कश्मीर राजतन्त्र शासित प्रदेश था। इसके हिन्दू शासक हरि सिंह भारतीय लोकतंत्र का हिस्सा नही बनना चाहते थे।
  2. पाकिस्तानी नेता मानते थे की कश्मीर, पाकिस्तान से लगा हुआ है, क्योंकि राज की अधिकतर आबादी मुस्लिम है।
  3. राज्य में शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व में जन आन्दोलन चला। शेख अब्दुल्ला चाहते थे की महाराज पद छोड़े, परन्तु वे पाकिस्तान में सम्मिलित होने के विरुद्ध थे। नेशलन कांफ्रेस एक धर्मनिरपेक्ष संगठन था और इसका कांग्रेस के साथ काफी वक्त तक गठबंधन रहा।
  4. पाकिस्तान ने अक्टूबर 1947 में कबायली घुसपैठियों को अपनी ओर से कश्मीर पर कब्जा करने भेजा।
  5. ऐसे में कश्मीर के महाराजा भारतीय सेना से सहायता मांगने को विवश हुए।
  6. भारत ने सैन्य सहायता उपलब्ध कराई तथा कश्मीर घाटी से घुसपैठियों को खदेड़ा।
  7. इससे पूर्व ही भारत सरकार ने महाराजा से भारतिय संघ में विलय के दस्तावेज पर दस्तखत करा लिए।
  8. 1948 में शेख अब्दुल्ला जम्मू-कश्मीर राज्य के प्रधानमंत्री बने।
  9. भारत, जम्मू व कश्मीर की स्वयत्तता को बनाए रखने पर राजी हो गया। इसे संविधान में
  10. धारा 370 का प्रावधान करके संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया।

1948 के बाद राजनीति

  1. पहले C. M. शेख अब्दुल्ला ने भूमि सुधार, जन कल्याण के लिए काम किया।
  2. कश्मीर को लेकर केंद्र सरकार और कश्मीरी सरकार में मतभेद हो जाते थे।
  3. 1953 में शेख अब्दुल्ला बर्खास्त कर दिये गए।
  4. इसके बाद जो नेता आए वो शेख जितने लोकप्रिय नही थे। केंद्र के समर्थन पर सत्ता पर रहे पर धांधली का आरोप लगा।
  5. 1953 से 1974 तक कांग्रेस का राजनीति पर असर रहा।
  6. 1974 में इंदिरा ने शेख अब्दुल्ला से समझौता किया और उन्हें C.M. बना दिया ।
  7. दुबारा नेशनल कांफ्रेंस को खड़ा किया 1977 में बहुमत मिला। 1982 में मौत हो गई।
  8. 1982 में शेख की मौत के बाद नेशनल कांफ्रेंस की कमान उनके बेटे फारुख अब्दुल्ला ने संभाली । फारुख C. M. बने ।
  9. 1986 में केंद्र ने नेशनल कांफ्रेंस से चुनावी गठबंधन किया।
  10. 1987 में गठबंधन की जीत पर चुनाव में धांधली का आरोप ।
  11. उग्रवादी आन्दोलन का उदय हुआ जिसे पाकिस्तान ने भौतिक, नैतिक और सैन्य मदद दी।
  12. कई सालों तक राष्ट्रपति शासन लागू रहा ।
  13. 2002 में जम्मू- कश्मीर में चुनाव बड़े निष्पक्ष तरीके से हुए, इस चुनाव में पीपल्स डेमोक्रेटिक अलायंस (PDA) तथा कांग्रेस की गठबंधन सरकार सत्ता में आई।

अलगाववाद और उसके बाद :-

  1. अलगाववादी राजनीति ने 1989 से जम्मू-कश्मीर में पैर पसारे ।
  2. कश्मीर को अलगाववादियों का एक तबका अलग राष्ट्र बनाना चाहता है अर्थात एक ऐसा कश्मीर जो न पाकिस्तान का भाग हो और न भारत का ।
  3. कुछ अलगाववादी वर्ग चाहते है की कश्मीर का विलय पाकिस्तान में हो जाए।
  4. केंद्र सरकार के प्रयासों से भारत संघ के साथ कश्मीर के रिश्ते को पुनर्परिभाषित करने पर बल दे रहे है।
  5. जम्मू-कश्मीर बहुलवादी समाज तथा राजनीति का एक जीवंत उदहारण है। यहाँ धार्मिक, सांस्कृतिक, जातीय भाषायी और जन जातीय अर्थात हर तरह की विभिन्नताएँ है।

बाहरी और आंतरिक विवाद

  1. जम्मू व कश्मीर की राजनैतिक परिस्थितियां सदैव विवादग्रस्त व संघर्षयुक्त रही। इसके बाहरी तथा अंदरूनी दोनों कारण है।
  2. पाकिस्तान ने सदैव दावा किया है की कश्मीर घाटी पाकिस्तान का भाग होना चाहिए, तथा पाकिस्तान ने इस भाग को ‘आजाद कश्मीर’ कहा । 1947 के पश्चात् कश्मीर भारत व पाकिस्तान के मध्य संघर्ष का एक बड़ा मुद्दा रहा है।
  3. आंतरिक तौर पर देखें तो भारतीय संघ में कश्मीर की हैसियत को लेकर संघर्ष रहा है।
  4. कश्मीर को संविधान में धारा 370 के अंतर्गत खास दर्जा दिया गया था।
  5. कश्मीर को भारत के अन्य राज्यों के मुकाबले अधिक स्वायत्तता दी गई थी, इसके खिलाफ कुछ विरोधी प्रक्रिया सामने आई, लोगों का एक वर्ग मानता है कि 370 की वजह से विशेष दर्जा देना, जिसकी वजह से वो भारत के साथ पूरी तरह नहीं जुड़ पाया है।
  6. कुछ समूह मानता है की 370 खत्म कर देना चाहिए और जम्मू कश्मीर को दुसरे राज्यों की तरह ही होना चाहिए।

कश्मीरियों की तीन समस्यां :-

पहली :-

भारत सरकर ने वायदा किया था की कबायली घुसपैठियों से निपटने के पश्चात् जब हालत सामान्य हो जायेगें तो भारत संघ में विलय के मुदद पर जनमत-संग्रह कराया जायेगा, इसे पूरा नहीं किया ।

दूसरी :-

धारा 370 के अंतर्गत दिया गया विशेष दर्जा पूरी तरह से अमल में नही लाया गया इससे राज्य को अधिक स्वायत्तता देने की मांग उठी।

तीसरी :-

भारत के शेष हिस्सों में जिस तरह लोकतंत्र पर अमल होता है उस प्रकार का संस्थागत लोकतांत्रिक बरताव जम्मू-कश्मीर में नहीं होता।

पंजाब और पंजाब संकट :-

  • पंजाब उत्तर भारत का एक महत्वपूर्ण राज्य है। इस राज्य क अधिकांश जनसंख्या सिक्ख समुदाय से संबंधित है।
  • 1966 में पंजाब राज्य का विभाजन करके हरियाणा नाम का एक नया राज्य बना दिया गया।
  • पंजाब में अकाली दल महत्त्वपूर्ण क्षेत्रीय राजनीतिक दल है। अकाली दल ने जनसंघ के साथ मिलकर 1967 एवं 1977 में पंजाब में अपनी सरकार बनाई।
  • 1980 में जब अकाली दल चुनाव हार गए तो उन्होंने कांग्रेस के विरुद्ध आन्दोलन शुरू कर दिया।
  • उस समय कलाई दल की मांग थी कि :-
  1. चंडीगढ़ को पंजाब की राजधानी बनाया जाए।
  2. दुसरे राज्यों के पंजाबी भाषी क्षेत्र को पंजाब में मिलाया जाए।
  3. पंजाब का औद्योगिक विकास किया जाए।
  4. भाखड़ा नंगल योजना पंजाब के नियन्त्रणाधीन हो ।
  • अकालीदल से सन् 1973 के आनन्दपुर साहिब सम्मलेन में पंजाब के लिए अधिक स्वायतता की मांग उठी कुछ धार्मिक नेताओं ने स्वायत्त सिक्ख पहचान की मांग की और कुछ चरमपन्थियों ने
  • भारत से अलग होकर खालिस्तान बनाने की मांग की।

ऑपरेशन ब्लू स्टार

  1. सन 1980 के बाद अकाली दल पर उग्रपन्थी लोगों का नियंत्रण हो गया और इन्होने अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में अपना मुख्यालय बनाया।
  2. पंजाब में राजनीतिक स्थितियां लगातार बिगड़ने के कारण तथा उग्रवादियों को स्वर्ण मंदिर से निकलने के लिए केंद्र सरकार ने 5 जून, 1984 को ‘आपरेशन ब्लू स्टार’ के अंतर्गत कार्यवाही की ।

इंदिरा गाँधी की हत्या

  1. इस सैन्य कार्यवाही को सिक्खों ने अपने धर्म विश्वास पर हमला माना।
  2. जिसका बदला लेने के लिए 31 अक्टूबर 1984 को इन्दिरा गाँधी की हत्या की गई।
  3. जिससे दिल्ली में सिक्ख विरोधी दंगे शुरू हो गए। एक अनुमान के अनुसार इन दंगो में लगभग 2000 सिक्ख पुरुष, स्त्री एवं बच्चे मारे गए।

पंजाब समझौता

पंजाब समझौता 26 जुलाई 1985 में आनन्दपुर में अकाली दल के अध्यक्ष हरचंदसिंह लौगोवाल तथा राजीव गांधी के समझौते ने पंजाब में शांति स्थापना के प्रयास किए ।

पंजाब समझौते के प्रमुख प्रावधान :-

  1. चण्डीगढ़ पंजाब को दिया जायेगा।
  2. केंद्र शासित प्रदेश के अन्य पंजाबी क्षेत्र पंजाब को तथा हिंदी भाषी क्षेत्र हरियाणा को दिए जायेंगे।
  3. मारे गए निरपराध व्यक्तियों के लिए मुआवज़ा दिया जायेगा।
  4. पंजाब में विशेष सुरक्षा बल अधिनियम लागू करना।
  5. पंजाब हरियाणा राजस्थान के बीच रबी व्यास के पानी बंटवारा हेतु न्यायाधिकरण गठित किया जायेगा।

पूर्वोत्तर भारत

  1. इस क्षेत्र में सात राज्य है जिसमें भारत की 4 प्रतिशत आबादी रहती है।
  2. यहाँ की सीमायें चीन, म्यांमार, बांग्लादेश और भूटान से लगती है यह क्षेत्र भारत के लिए दक्षिण पूर्व एशिया का प्रवेश द्वार है।
  3. 1960 में नागालैंड को राज्य बनाया गया। मणिपुर, मेघालय और त्रिपुरा 1972 में राज्य बने जबकि अरुणाचल प्रदेश और मिजोरम को 1987 में राज्य का दर्जा मिला ।
  4. पूर्वोत्तर में सात राज्यों को सात बहनें भी कहा जाता है।
  5. पूर्वोत्तर के राज्यों में राजनीति पर तीन मुद्दे हावी है: स्वायतता की मांग, अलगाववाद के आन्दोलन तथा बाहरी लोगों का विरोध।

स्वायत्तता की मांग :-

  1. स्वतंत्रता के समय मणिपुर और त्रिपुरा को छोड़ दें तो यह सम्पूर्ण क्षेत्र असम कहलाता था।
  2. गैर-असमी लोगो को जब यह महसूस हुआ की असम की सरकार उन पर असमी भाषा थोप रही है तो इस क्षेत्र से राजनीतिक स्वायत्तता की मांग उठी।
  3. मांग आक्रामक होने की वजह से असम को बांटकर मिजोरम मेघालय और अरुणाचल प्रदेश बनाया गया।
  4. त्रिपुरा और मणिपुर को भी राज्य का दर्जा मिला।

अलगाववादी आन्दोलन

  1. स्वायत्तता की मांगो को सुलझाना सरल था पर अलगाववादी आन्दोलन को सुलझाना कठिन हो गया।
  2. स्वतंत्रता के पश्चात् कुछ मिजो लोगों का विश्वास था की वे कभी ब्रिटिश इंडिया के भाग नही रहे अतः भारत संघ से उनका कोई रिश्ता नही है।
  3. इसी बीच वहां अकाल पड़ गया, जिसमें असम सरकार समुचित प्रबंध करने में असफल रही। इसी के पश्चात् अलगाववादी आन्दोलन को जनसमर्थन मिलना आरम्भ हुआ। मिजो लोगों ने क्रोध में आकर लाल डेंगा के नेतृत्व में मिजो नेशनल फ्रंट बनाया।
  4. 1966 में मिजो नेशनल फ्रंट ने स्वतंत्रता की मांग करते हुए सशस्त्र अभियान आरंभ किया।
  5. यह युद्ध काफी भयानक रहा जिसमें गुरिल्ला युद्ध भी हुए, वायु सेना का भी प्रयोग किया गया, दो दशक तक युद्ध चला जिससे दोनों पक्षों को क्षति उठानी पड़ी।
  6. लाल डेगा भारत आए और उन्होंने भारत सरकार (राजीव गाँधी की सरकार थी) के साथ वार्तालाप करके समस्याओं का समाधान किया।
  7. 20 फरवरी 1987 को मिजोरम को भारत के 23 वें राज्य का दर्जा प्राप्त हो गया। इससे पहले 21 जनवरी 1972 को पहले मिजोरम केंद्र शासित राज्य बना था।
  8. लाल डेंगा मुख्यमंत्री बने । और मिजोरम पूर्वोत्तर का सर्वाधिक शांतिपूर्ण राज्य है और उसने कला, साहित्य तथा विकास की दिशा में अच्छी उन्नति की है।

नागालैंड :-

  1. नागा नेशनल कांउसिल (N.N.C.) ने अंगमी जापू फिजो के नेतृत्व में सन 1951 से भारत से अलग होने और पृथक नागालैंड की मांग के लिए सशस्त्र संघर्ष चलाया हुआ है।
  2. हिंसक विद्रोह के एक दौर के बाद नगा लोगो के एक वर्ग ने भारत सरकार के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए परन्तु अन्य विद्रोहियों ने इस समझौते को नहीं माना।
  3. नागालैंड की समस्या का समाधान होना अब भी शेष है।

बाहरी लोगों की समस्या :-

  1. भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र के राज्यों में बाहरी लोगो के प्रवास की एक बड़ी समस्या है। स्थानीय लोग इन्हे खुद से अलग समझते है और इनका विरोध करते है।
  2. उनका मानना है की यह बाहरी लोग उनके क्षेत्र में आकार उनकी जमीन हथिया रहे है और इनकी संख्या ज्यादा होने की वजह से राजनीतिक और आर्थिक रूप स इनका पर्व बढ़ता जा रहा है।
  3. पूर्वोत्तर राज्यों की राजनीति में धीरे धीरे प्रवासियों का मुद्दा एक अहम् मुद्दा बनता जा रहा है।

असम आन्दोलन

  1. इस आन्दोलन की शुरुआत इस वजह से हुई क्योंकि असम के लोगो को यह संदेह था, की बांग्लादेश से बहुत बड़ी संख्या में मुस्लिम आबादी आकर इनके क्षेत्रो में रह रही है इस वजह से उनके अल्पसंख्यक होने का खतरा बढ़ता जा रहा है।
  2. इन्ही समस्याओं और मुद्दों को देखते हुए सन 1989 में ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन AASU ने विदेशियों के विरोध में एक आन्दोलन चलाया।
  3. AASU असम के छात्रों का एक संगठन था और इसका किसी भी राजनीतिक दल से कुछ लेना-देना नहीं था।
  4. यह आन्दोलन मुख्य रुप से विदेशी और प्रवासी बंगालियों एवं अन्य लोगो के बढ़ते दबदबे एवं उनका नाम मतदाता सूची में गलत तरीके से शामिल किए जाने के विरोध में थे।
  5. उनकी मांग उठी की 1951 के बाद असम में आए सभी लोगो को असम से बहार निकला जाए।
  6. इस आन्दोलन को असम के लगभग सभी लोगो ने समर्थन दिया।
  7. इस आन्दोलन में कई हिंसक घटनाएँ भी हुई जिसमें धन सम्पत्ति और जन दोनों का नुकसान हुआ साथ ही साथ कई बार रेलगाड़ियों को रोकने एवं तेल शोधक कारखानों की सप्लाई बंद करने के प्रयास भी किए गए।
  8. लगभग 6 साल तक यह आन्दोलन चला और इसके पश्चात् राजीव गाँधी ने आसू के नेताओं से बात की और एक समझौता किया, इस समझौते में यह निर्धारित किया गया की 1971 में हुए बांग्लादेश युद्ध के दौरान और उसके बाद जितने भी लोग असम में आए है उन सभी को असम से बहार निकलने के प्रबंध किए जायेंगे।
  9. इसे असम समझौते के नाम से जाना जाता है।
  10. आन्दोलन की कामयाबी के बाद आसू एवं असम गण संग्राम परिषद ने साथ मिलकर एक
  11. राजनीतिक पार्टी का गठन किया एक राजनीतिक पार्टी का नाम असम गण परिषद रखा गया।
  12. 1985 के चुनावों में यह पार्टी सत्ता में आई और इसने बाहरी प्रवासियों की समस्या को सुलझाने एवं स्वर्णिम असम का निर्माण करने का वादा किया।
  13. असम समझौते के बाद असम में शांति कार्य हुई परन्तु प्रवासियों की समस्या का पूर्ण रूप से समाधान नही हो सका।

गोवा की मुक्ति

  1. यद्यपि भारत में 1947 में अंग्रेजी साम्राज्य का विनाश हो गया था परन्तु पुर्तगाल ने गोवा, दमन तथा दीव से अपना शासन हटाने से मना कर दिया।
  2. उसने यहाँ के लोगो को नागरिक अधिकारों से वांछित रखा और धर्म परिवर्तन भी कराया।
  3. दिसंबर 1961 में भारत सरकार ने गोवा में अपनी सेना भेजी, दो दिन की कार्यवाई में भारतीय सेना ने गोवा को स्वतंत्र करा लिया ।
  4. 1967 के जनवरी में केंद्र सरकार ने गोवा में एक खास जनमत सर्वेक्षण कराया। इसमें ये पुछा गया की वो महाराष्ट्र में शामिल होना चाहता है या अलग बने रहना चाहता है
  5. लोगों ने महाराष्ट्र से अलग रहने के पक्ष में मत डाला। इस तरह गोवा केंद्रशासित प्रदेश बना रहा। और 30 में 1987 में गोवा को भारत का पच्चीसवां राज्य बनाया गया।

सिक्किम का विलय

  1. स्वतंत्रता के वक्त सिक्किम को भारत की ‘शरणागति’ हासिल थी। तब सिक्किम भारत का अंग तो नही था परन्तु वह पूरी तरह संप्रभु राष्ट्र भी नही था।
  2. सिक्किम के रक्षा और विदेशी मुद्दों का जिम्मा भारत सरकार का था जबकि सिक्किम के आंतरिक प्रशासन की बागडोर यहाँ के राजा चोग्याल के हाथो में थी।
  3. सिक्किम के राजा स्थानीय जनता की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं को संभाल नही सके।
  4. सिक्किम विधानसभा के लिए प्रथम लोकतान्त्रिक चुनाव 1974 में हुआ और इसमें सिक्किम कांग्रेस को भारी जीत मिली। यह पार्टी सिक्किम को भारत के साथ जोड़ने के पक्ष में थी
  5. 1975 के अप्रैल में एक प्रस्ताव पारित किया इस प्रस्ताव में भारत के साथ सिक्किम के पूर्ण विलय की बात कही गई थी।
  6. जनता ने इस बात को समर्थन किया और सिक्किम भारत का 22वां राज्य बन गया।

द्रविड़ आन्दोलन का उदय

  1. यह आन्दोलन भारत के क्षेत्रीय आन्दोलन में सबसे ताकतवर आन्दोलन था ।
  2. आन्दोलन का नारा था :- “उत्तर हर दिन बढ़ता जाए, दक्षिण दिन दिन घटता जाए”
  3. द्रविड़ आन्दोलन का नेतृत्व :- तमिल सुधारक ई. वी. रामास्वामी नायकर ‘पेरियार’ ने किया था
  4. परियार ने 1944 में द्रविड़ कषगम नामक पार्टी का गठन किया।
  5. लेकिन कुछ वक्त के बाद 1949 में पेरियार के बेहद करीबी सी. एन.आन्नादुरै का उनके साथ मतभेद हो गया।
  6. इसके बाद अन्नादुरै ने 17 सितंबर 1949 में द्रविड़ मुनेत्र कषगम (DMK) की स्थापना की।
  7. पेरियार एक स्वतंत्र द्रविड़ राष्ट्र की मांग कर रहे थे जबकि अन्नादुरै प्रथम राज्य की मांग कर रहे थे।

द्रविड़ आन्दोलन की मांगे :-

  1. कल्लाकुडी नामक रेलवे स्टेशन के नये नाम डालमियापुर को हटाकर स्टेशन का मूल नाम फिर से रखा जाए।
  2. दूसरी मांग थी कि स्कूली पाठ्यक्रम में तमिल संस्कृति के इतिहास को ज्यादा महत्व दिया जाये।
  3. DMK हिंदी को राजभाषा का दर्जा देने के भी खिलाफ थी।

आन्दोलन के दौरान क्या क्या हुआ :-

  1. 1965 में भी जब हिंदी को देश की एकमात्र सरकारी भाषा बनाए जाने का ऐलान किया गया तो इसके विरोध में तमिलनाडु में हिंदी के खिलाफ आन्दोलन शुरू हो गया ।
  2. 1973 में स्कूलों में हिंदी को अनिवार्य करने पर भी इस क्षेत्र में बहुत विरोध हुआ |
  3. हिंदी के खिलाफ हुए इस आन्दोलन के दौरान लोगो ने रेलवे स्टेशन से हिंदी नामो को मिटा दिया और रेल- गाड़ियों के रास्ते को रोकने के लिए वे रेल की पटरी पर लेट गए।
  4. इस विरोध प्रदर्शन के दौरान कई लोगो की जान भी चली गई।

आंदोलन के बाद की राजनीति

  1. राजनीतिक आन्दोलन के एक लम्बे सिलसिले के बाद DMK को 1967 के विधानसभा चुनावो में बड़ी सफलता हाथ लगी ।
  2. तब से लेकर आज तक तमिलनाडू की राजनीति में द्रविड़ दलों का वर्चस्व कायम है।
  3. DMK के संस्थापक C.N.अन्नादुरै की मृत्यु ये दल दो भागो में बंट गया।
  4. इसमें एक दल मूल नाम यानि DMK को लेकर आगे चल जबकि दूसरा दल खुद को ऑल अन्ना द्रमुक कहने लगा।

क्षेत्रीय आकांक्षाओं से मिलने वाले सबक

  1. पहला सबका यह है की क्षेत्रीय आकांक्षाएँ लोकतान्त्रिक राजनीति का अभिन्नअंग है।
  2. दूसरा सबका यह है की क्षेत्रीय आकांक्षाओं को दबाने की जगह उनके साथ लोकतान्त्रिक बातचीत का तरीका अपनाना सबसे अच्छा होता है।
  3. तीसरा सबक सत्ता की साझेदारी के महत्व को समझना है इसके अनुसार विभिन्न दलों और समूहों को केन्द्रीय राजव्यवस्था में हिस्सेदार बनाना जरुरी है।
  4. चौथा सबका यह है की आर्थिक विकास में सभी क्षेत्रों के साथ समानता का व्यवहार करना चाहिये । पिछड़े राज्यों की आर्थिक मदद करके उनको विकास की राह पर लेकर आए।

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