कक्षा 12 इतिहास अध्याय 9 के नोट्स हिंदी में
उपनिवेशवाद और देहात notes
यहाँ हम कक्षा 12 इतिहास के 9th अध्याय “उपनिवेशवाद और देहात” के नोट्स उपलब्ध करा रहे हैं। इस अध्याय में उपनिवेशवाद और देहात से जुड़ी प्रमुख विशेषताओं का अध्ययन किया गया है।
ये नोट्स उन छात्रों के लिए उपयोगी सिद्ध होंगे जो इस वर्ष बोर्ड परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं। सरल और व्यवस्थित भाषा में तैयार की गई यह सामग्री अध्याय को तेजी से दोहराने और मुख्य बिंदुओं को याद रखने में मदद करेगी।
कक्षा 12 इतिहास अध्याय 9 के नोट्स हिंदी में , उपनिवेशवाद और देहात notes

class 12 History chapter 9 notes in hindi
उपनिवेशवाद और देहात
उपनिवेशवाद
जब कोई बड़ा और ताकतवर देश किसी छोटे या कमजोर देश पर कब्जा करके उसके धन-संपत्ति और संसाधनों को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करे – इसे उपनिवेशवाद कहते हैं।
देहात
देहात वह क्षेत्र होता है जो शहरों से बाहर होता है, जहाँ ज़्यादातर खेत, गाँव, खेती-बाड़ी और प्राकृतिक माहौल होता है।
प्लासी का युद्ध
- प्लासी का युद्ध 23 जून 1757 को हुआ था।
- यह युद्ध गंगा नदी के किनारे, बंगाल के प्लासी नामक स्थान पर लड़ा गया।
- युद्ध दो पक्षों के बीच हुआ:
- ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी
- बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला
4. कंपनी की सेना का नेतृत्व रॉबर्ट क्लाइव कर रहा था।
5. युद्ध में अंग्रेजों ने नवाब सिराजुद्दौला को हरा दिया।
6. जीत के बाद अंग्रेजों ने बंगाल पर पूरा कब्जा कर लिया।
7. बंगाल अंग्रेजों के अधीन आने वाला भारत का पहला बड़ा क्षेत्र बना।
कर (लगान) व्यवस्था
- बंगाल पर विजयी होने के बाद अंग्रेजो ने कर (लगान) वसूलने की व्यवस्था बनाई।
- अंग्रेजो के समयकाल में मुख्य रूप से तीन प्रकार की कर व्यवस्था प्रचलित थीं
1. इस्तमरारी बंदोबस्त (1793) (जिसे जमीदारी व्यवस्था, स्थाई बंदोबस्त भी कहते थे)
2. रैयतवादी व्यवस्था (1802)
3. महालवाड़ी व्यवस्था (1822)
1. इस्तमरारी (स्थायी) बंदोबस्त
- इस्तमरारी (स्थायी) बंदोबस्त – 1793
- इस्तमरारी या स्थायी बंदोबस्त कर वसूली की एक स्थाई व्यवस्था थी।
- इसे चार्ल्स कार्नवालिस ने 22 मार्च 1793 को बंगाल में लागू किया।
- उस समय बंगाल के साथ बिहार और उड़ीसा भी इसके अंतर्गत आते थे।
- अंग्रेजों ने पुराने शक्तिशाली लोगों – जैसे राजा, नवाब, साहूकार को जमींदार बना दिया।
- जमींदारों को जमीन देकर किसानों से कर वसूलने का अधिकार दिया गया।
- बदले में जमीदारों को कंपनी को एक तय राजस्व हर साल देना पड़ता था।
- जमींदार किसानों से अपनी मर्जी का कर वसूल करते थे।
- इसे स्थायी बंदोबस्त इसलिए कहा गया क्योंकि राजस्व की राशि स्थायी (फिक्स) थी।
- इसे जमींदारी व्यवस्था भी कहते हैं क्योंकि इसमें जमींदार सबसे महत्वपूर्ण बने।
2. रैयतवाड़ी व्यवस्था
- 1802 में मद्रास के गवर्नर टॉमस मुनरो ने रैयतवाड़ी व्यवस्था शुरू की।
- यह व्यवस्था मद्रास, बंबई और असम के कुछ हिस्सों में लागू हुई।
- लगभग 51% भूमि इस व्यवस्था में शामिल थी।
- इसमें रैयत (किसान) को ही भूमि का सीधा मालिक माना गया।
- किसान सीधे अंग्रेज सरकार को कर (राजस्व) जमा करता था, बीच में कोई जमींदार नहीं होता था।
- इसे रैयतवाड़ी व्यवस्था कहा गया क्योंकि ‘रैयत’ का अर्थ किसान होता है।
3. महालवाड़ी व्यवस्था
- 1822 में लार्ड वेलेजली ने इसे उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में लागू किया।
- डसमें पूरे गाँव (महाल) को कर वसूली की इकाई माना गया।
- गाँव की तरफ से कर जमा करने की जिम्मेदारी मुकद्दम प्रधान या किसी बड़े रैयत को दी जाती थी।
- वे सरकारे को तय राजस्व जमा करते थे और बाकी राशि अपने पास रखते थे।
- इसे महालवाड़ी व्यवस्था इसलिए कहा गया क्योंकि ‘महाल’ का अर्थ गाँव होता है।
बंगाल और वहाँ के जमींदार
- अंग्रेजों ने सबसे पहले अपना शासन बंगाल में स्थापित किया।
- यहाँ ग्रामीण समाज और भूमि संबंधी अधिकारों को नई व्यवस्था के अनुसार बदला गया।
- 1770 के दशक तक लगातार अकाल और कम पैदावार से बंगाल की अर्थव्यवस्था कमजोर हो गई थी।
- बंगाल की ग्रामीण अर्थव्यवस्था पूरी तरह कृषि पर निर्भर थी।
- कृषि में निवेश बढ़ाने और राजस्व पक्के तौर पर मिलने के लिए अंग्रेजों ने इस्तमरारी (स्थायी) बंदोबस्त लागू किया।
- अंग्रेज चाहते थे कि एक ऐसा वर्ग बने जो 1. कृषि सुधार करे 2 अंग्रेजी शासन का वफादार रहे।
- लंबे विचार-विमर्श के बाद नवाब राजा ताल्लुकदार और साहूकार को जमीदार बना दिया गया।
- जमींदारों को कंपनी को स्थायी (फिक्स) राजस्व देना पड़ता था।
- जमींदार भू-स्वामी नहीं, केवल राजस्व वसूलने वाले बनाए गए थे।
जमींदारों को दिए गए मुख्य कार्य:-
- गाँवों से कर (लगान) वसूलकर (कंपनी को देना।
- उनके अधीन कई गाँव होते थे और लगान की दर वही तय करते थे।
- वसूले गए लगान में से कंपनी को तय राशि भेजना।
- उनसे उम्मीद होती थी कि वे समय पर राजस्व जमा करें।
- समय पर राजस्व न देने पर उनकी जायदाद नीलाम की जा सकती थी।
जमींदार राजस्व भुगतान में क्यों चूक करते थे?
1) कर की दर बहुत अधिक होना
- कंपनी ने शुरू में ही बहुत ऊंची राजस्व मांग तय कर दी थी।
- उनका मानना था कि भविष्य में जब खेती बढ़ेगी और फसलों के दाम बढ़ेगे, तब जमींदार अधिक
- कमाएँगे, पर कंपनी को उसका हिस्सा नहीं मिलेगा।
- इसी नुकसान से बचने के लिए कंपनी ने राजस्व पहले से ही ऊँचा रखा।
- लेकिन वास्तविक स्थिति में उत्पादन नहीं बढ़ा और जमींदारों पर कर का बोझ बहुत भारी पड़ गया।
2) फसलों की कीमतें कम होना
- बाजार में उपज के दाम बहुत कम मिलते थे।
- किसान (रैयत) ऊँचे लगान के कारण समय पर पैसा नहीं दे पाते थे।
- जब किसान लगान नहीं दे पाए, तो जमीदार भी कंपनी को राजस्व नहीं दे सके।
- इस कारण जमींदार कंपनी को तय राजस्व भुगतान में बार-बार चूक करते थे।
सूर्यास्त कानून (Sunset Law)
- चाहे फसल अच्छी हो या खराब, राजस्व समय पर देना अनिवार्य था।
- सूर्यास्त कानून के अनुसार, अगर जमींदार तय तारीख पर सूर्य ढलने तक राजस्व जमा नहीं करता था, तो उसकी जमींदारी नीलाम कर दी जाती थी।
- इस कानून से जमींदारों की ताकत सीमित हो गई और वे सिर्फ:-
- रैयत से लगान वसूलने और अपनी जमींदारी का प्रबंध करने तक ही सीमित रह गए।
ब्रिटिश सरकार जमींदारों को अपने नियंत्रण में कैसे रखती थी?
1. उच्च राजस्व मांगः-
कंपनी ने जमींदारों पर बहुत ऊँचा और स्थायी राजस्व तय किया, जिससे वे हमेशा दबाव में रहे।
2. सूर्यास्त कानून:-
अगर जमींदार तय तारीख को सूर्यास्त तक राजस्व जमा नहीं करते थे, तो उनकी जमींदारी नीलाम कर दी जाती थी।
3. नीलामी का डरः
लगातार नीलामी की धमकी के कारण जमींदार कंपनी के पूरी तरह अधीन बने रहते थे।
4. सीमित अधिकारः-
जमींदारों को केवल राजस्व वसूली और जमींदारी प्रबंधन का अधिकार था भूमि पर असली अधिकार कंपनी का था।
5. राजस्व भुगतान की अनिवार्यता:-
फसल खराब हो या अकाल पड़ जाए-जमीदार को हर साल पूरी राशि जमा करनी होती थी, जिससे वह कंपनी पर निर्भर रहता था।
6. प्रशासनिक नियंत्रणः
कंपनी अधिकारी (कलेक्टर) जमींदारों की गतिविधियों पर लगातार निगरानी रखते थे।
जमींदार की जमींदारी क्यों नीलाम कर दी जाती थी?
1. राजस्व समय पर न देने पर :-
यदि जमींदार कंपनी को तय तारीख तक राजस्व जमा नहीं करता था, तो जमींदारी नीलाम कर दी जाती थी।
2. सूर्यास्त कानून के कारण :-
यदि जमींदार सूर्यास्त तक भुगतान नहीं करता था, तो उसकी जमीन तुरंत नीलाम की जा सकती थी।
3. कंपनी का पक्का राजस्व सुनिश्चित करना :-
ब्रिटिश सरकार चाहती थी कि राजस्व हर हाल में मिले, इसलिए देर होने पर जमींदारी छीनना आसान तरीका था
4. जमींदारों को नियंत्रण में रखने के लिए :
नीलामी का डर जमींदारों को कंपनी के प्रति हमेशा वफादार और आज्ञाकारी बनाए रखता था।अधिकार कंपनी का था।
जोतदारों का उदय
- 18वीं सदी के अंत में जब कई जमींदार कमजोर हो रहे थे, तब कुछ अमीर किसान (जोतदार) गाँवों में ताकतवर बनने लगे।
- 19वीं सदी की शुरुआत तक जोतदारों ने हजारों एकड़ जमीन पर कब्जा कर लिया था।
- वे व्यापार और साहूकारी पर भी नियंत्रण रखते थे।
- उनकी जमीन बटाईदारों के माध्यम से जोती जाती थी
- बटाईदार खेती करते और फसल का आधा हिस्सा जोतदार को देते थे।
- जोतदार गाँवों में रहते थे और वहाँ के गरीब किसानों पर सीधा प्रभाव रखते थे।
- वे कई बार जमींदारों का विरोध करते और राजस्व भुगतान में देरी करते थे।
- जब जमींदार की ज़मीन नीलाम होती थी, तो जोतदार ही उसे खरीद लेते थे।
- उत्तरी बंगाल में जोतदार सबसे प्रभावशाली थे। कुछ जगह उन्हें हवलदार, कहीं गांटीदार या मंडल कहा जाता था।
जमींदारों ने अपनी जमींदारी नीलाम होने से कैसे बचाई
1. फर्जी बिक्री
- जमींदार अपने नाम की ज़मीन कागजों में किसी और के नाम बेचने का दिखावा करते थे।
- असल में ज़मीन उनके ही परिवार या एजेंट के कब्जे में रहती थी।
- इस तरह ज़मीन का कानूनी कब्जा वही रख पाते थे।
2. संपत्ति स्त्रियों के नाम पर करना
- जैसे बर्दवान के राजा ने अपनी ज़मीन का कुछ हिस्सा अपनी माता के नाम कर दिया।
- क्योंकि ईस्ट इंडिया कंपनी ने यह तय किया था कि महिलाओं की संपत्ति जब्त नहीं की जाएगी।
- इससे ज़मीन कानूनी रूप से सुरक्षित रही।
3. नीलामी प्रक्रिया में जोड़-तोड़ (Manipulation in Auction)
- जमींदारों के एजेंट नीलामी में ऊँची बोलियाँ लगाते थे ताकि दूसरे खरीदार पीछे हट जाएँ।
- बाद में वही एजेंट खरीद की राशि जमा करने से मना कर देते थे, जिससे नीलामी रद्द हो जाती थी।
- इस तरह बार-बार नीलामी टलती रही
4. राजस्व भुगतान जान-बूझकर रोकना
- जमींदारों ने कई बार जान-बूझकर कंपनी की राजस्व मांग को रोके रखा, जिससे बकाया राशि बढ़ती गई।
- वे उम्मीद करते थे कि बाद में छूट या माफी मिल जाएगी।
5. बार-बार नीलामी का चक्र (Repeated Auctions)
- बार-बार नीलामी होती रही, पर कोई बाहरी व्यक्ति खरीदने को तैयार नहीं होता था।
- अंत में कम कीमत पर वही ज़मीन फिर से ज़मींदार को ही बेच दी जाती थी।
6. नए खरीदारों का विरोध
- जब कोई नया व्यक्ति जमीन खरीदता, तब भी पुराने जमींदार के आदमी या रैयत उसे जमीन पर कब्जा नहीं करने देते थे।
- कई बार मारपीट करके ज़मीन छीन ली जाती थी।
- किसान (रैयत) भी पुराने जमींदार को ही अपना “अन्नदाता” मानते थे और नए मालिक के साथ काम करने से मना कर देते थे।
पहाड़ी लोग और उनका जीवन
- राजमहल की पहाड़ियों के आसपास पहाड़ी लोग रहते थे।
- ये लोग झूम खेती करते थे और दाल, ज्वार, बाजरा उगाते थे।
- खाने के लिए महुआ के फूल इक्ठे करते थे।
- बेचने के लिए रेशम के कोया और ‘राल’ इकट्ठा करते थे।
- लकड़ियों को (इकट्ठा करके काठ कोयल बनाने में इस्तेमाल करते थे।
- शिकार करना, झूम खेती करना और रेशम के कीड़े पालना इनके जीवन का हिस्सा था।
- जंगलों से घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए थे।
- इमली के पेड़ों के बीच झोपड़ियों में रहते थे।
- आम के पेड़ों की छाया में आराम करते थे।
- पूरे प्रदेश को अपनी निजी भूमि मानते थे।
- मिखुया समूह में एकता बनाए रखते थे और झगड़ों को निपटाते थे।
- अकाल या जरूरत के समय किसानों के इलाकों पर आक्रमण करते थे।
- कभी-कभी अपनी ताकत दिखाने के लिए भी आक्रमण करते थे।
- जमींदार इन पहाड़ियों के मुखियाओं को रिश्वत देकर शांति बनाए रखते थे।
- पहाड़ी लोग नियंत्रित रास्तों पर अनुमति लेने के लिए धन लेते थे।
- व्यापारियों की सुरक्षा भी इन पहाड़ी लोगों द्वारा सुनिश्चित की जाती थी।
पहाड़ी लोगों की समस्याएँ
- 18वीं शताब्दी के अंत में जंगलों को साफ करके खेती की जमीन बढाई गई।
- जमींदारों और अंग्रेजों ने स्थाई कृषि शुरू की और राजस्व बढ़ाया।
- अंग्रेज जंगलों को उजाड़कर, जंगलवासियों को असभ्य मानते थे और उन्हें स्थाई कृषि में लगाना चाहते थे।
- इससे जंगल और चारागाह घट गए, जिससे पहाड़ी लोग अधिक गाँवों पर हमले कर अनाज और पशु लूटने लगे।
- 1770 के दशक में अंग्रेजों ने कड़ाई की नीति अपनाई और पहाड़ी लोगों का शिकार करना शुरू किया।
- 1780 में भागलपुर के कलेक्टर ने शांति स्थापना नीति बनाई
- मुखियाओं को वार्षिक भत्ता दिया जाएगा।
- बदले में वे अपने समुदाय को अनुशासित रखेंगे।
- कई पहाड़ी मुखियाओं ने भत्ता लेने से इनकार किया, कुछ ने स्वीकार किया लेकिन अपने समुदाय में सत्ता खो दी।
- इसी दौरान एक नया खतरा आया- संथाल लोगों का आगमन।
संथाल लोग और उनका आगमन
- 1780 के दशक में संथाल लोग बंगाल में आने लगे।
- जमींदार उन्हें जंगल साफ करने और खेती के विस्तार के लिए भाड़े पर रखते थे।
- अंग्रेज अधिकारियों ने उन्हें वन महलों में बसने का न्यौता दिया।
- पहाड़ी लोग स्थायी कृषि में रुचि नहीं रखते थे और उपद्रवी व्यवहार करते थे, जबकि संथाल आदर्श बाशिंदे साबित हुए।
- संथालों को जमीन देकर राजमहल की तलहटी में बसाया गया।
- 1832 तक, एक बड़ा क्षेत्र दामिन-ए-कोह के रूप में सीमांकित किया गया और संथालों की भूमि घोषित की गई।
- शर्ती दी गई भूमि के 10वें भाग को पहले 10 वर्षों में जोतना था।
- पूरे क्षेत्र का नक्शा बनाकर, चारों तरफ खंबे गाढ़कर परिसीमा तय की गई।
- संथालों के आने से पहाड़ी लोग अंदर की ओर पीछे हट गए, जहां चट्टानी और बंजर भूमि थी।
- दामिन-ए-कोह बनने के बाद संथालों की संख्या तेजी से बढ़ी और उनका जीवन क्षेत्र स्थायी कृषि पर आधारित था।
संथालो की स्थिति में सुधार
- दामिन-ए-कोह के सीमांकन के बाद संथालों की बस्तियाँ तेजी से बढ़ीं।
- 1838 में 40 गाँव ->1851 में 1473 गाँव।
- संथालो की आबादी 3,000 से बढ़कर 82,000 से अधिक हो गई।
- कृषि के विस्तार से कंपनी के राजस्व में वृद्धि हुई।
- संथाल राजमहल की पहाड़ियों पर बसने लगे, जिससे पहाड़ी लोग अंदर की ओर पीछे हट गए।
- उन्हें निचली पहाड़ियों और घाटियों में उतरने से रोका गया।
- संथालों के आने से पहाड़ी लोगों को भारी नुकसान हुआ, क्योंकि उनकी जमीन दामिन- ए- कोह का हिस्सा बन चुकी थी।
संथालों ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध विद्रोह क्यों किया ?
1. भूमि हड़पना और जमीन के अधिकार का हननः-
ब्रिटिश और जमींदारों ने संथालों की जमीन जब्त की और उन्हें अपने अधीन कर लिया।
2. जमींदारी और करों का बोझः-
- उन्हें ज़मीन पर भारी कर देना पड़ता था।
- जमींदार और मध्यस्थों द्वारा लगातार उत्पीडन ।
3. सामाजिक और आर्थिक अत्याचारः-
- ब्रिटिश और जमीदारों ने संथालों को मज़दूरो और भाड़े पर काम करने वाले रूप में देखा।
- उनकी स्वतंत्र जीवनशैली और पारंपरिक अधिकारों का हनन।
4. नियंत्रण और अधिकार खोनाः-
- संथालों को उनके जंगल और चारागाह से हटा दिया गया।
- उनकी प्राकृतिक जीवन व्यवस्था और समुदायिक सत्ता पर नियंत्रण लगाया गया।
5. सामूहिक विरोधः
इन सब कारणों से संथालों ने ब्रिटिश शासन और जमींदारों के खिलाफ विद्रोह किया।
दक्कन (बंबई) के रैयत ऋणदाताओं के प्रति क्रुद्ध क्यों थे
1. उधारी और भारी ब्याजः-
ऋणदाता (मुस्लिम, जमींदार या साहूकार) रैयतों से बहुत अधिक ब्याज वसूलते थे।
2. कर्ज के जाल में फंसनाः-
रैयत अक्सर अपने कर्ज चुकाने में असमर्थ रहते थे, इससे उनका कर्ज लगातार बढ़ता जाता था।
3. जमींदारों और साहूकारों का उत्पीड़न:-
कर्ज वसूलने के लिए उनका सामाजिक और आर्थिक शोषण किया जाता था।
4. स्थायी गरीबी और जीवनयापन में कठिनाई:-
- भारी ब्याज और उधारी के कारण रैयत गरीबी और संकट में रहते थे।
- उनके पास खेती या जीवन चलाने के साधन नहीं बचते थे।
5. सामूहिक असंतोष और विद्रोहः-
इसी उत्पीड़न के कारण रैयत ऋणदाताओं के प्रति क्रोधित और विद्रोही हो गए।
दक्कन दंगा आयोग
1. स्थापनाः-
1875 में महाराष्ट्र (तत्कालीन दक्कन) में हुए दंगों के बाद ब्रिटिश सरकार ने आयोग का गठन किया।
2. उद्देश्यः-
- दंगों के कारणों की (तफ्तीश और विश्लेषण करना।
- यह पता लगाना कि किस कारण से रैयत (किसान) और साहूकार/जमींदारों के बीच झगड़े और हिंसा हुई।
3. कार्य:-
- प्रभावित क्षेत्रो का दौरा किया गया।
- किसानो और साहूकारों/जमींदारों से साक्षात्कार लिया गया।
- दंगों के पीछे आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक कारणों की पहचान की।
4. महत्वः-
- इस आयोग की रिपोर्ट से ब्रिटिश सरकार को किसानों के हालात और उनके उत्पीड़न की जानकारी मिली।
- आयोग ने आगे के लिए सुधारात्मक नीतियाँ सुझाने में मदद की।
अमेरिकी गृहयुद्ध और भारत में कपास व्यापार का प्रभाव
- अमेरिकी गृहयुद्ध (1861-65) से पहले ब्रिटेन की कपास का लगभग 3% भाग अमेरिका से आता था। अमेरिका पर निर्भरता कम करने के लिए ब्रिटेन ने, कपास आपूर्ति संघ (1857), मैनचेस्टर कॉटन कंपनी (1859)
- स्थापित की, ताकि भारत जैसे देशों में कपास उत्पादन बढ़ाया जा सके। भारत की भूमि, जलवायु और सस्ता श्रम इसके लिए बहुत उपयुक्त थे।
अच्छा प्रभाव
अमेरिकी गृहयुद्ध शुरू होते ही ब्रिटेन ने भारत से बड़े पैमाने पर कपास मँगाई। बंबई के व्यापारी तेजी से खरीद करने लगे और साहूकारों ने ग्रामीणों को भरपूर ऋण देना शुरू कर दिया। दक्कन के रैयतों को प्रति एकड़ लगभग 100 रुपये तक आसानी से कर्ज मिलने लगा।
नतीजा:-
- भारत से ब्रिटेन को 90% कपास का निर्यात होने लगा।, कपास उत्पादन तेजी से बढ़ा।
- परंतु असली लाभ धनी किसानों को मिला, छोटे किसान कर्ज के बोड़ा और जोखिम में फंस गए।
बुरा प्रभाव
- युद्ध खत्म होते ही ब्रिटेन की अमेरिकी कपास फिर उपलब्ध हो गई, इसलिए भारतीय कपास की मांग कम हो गई।
- कपास के निर्यात में गिरावट, कीमतों में भारी गिरावट।
- व्यापारी और साहूकारों ने ऋण देना बंद कर दिया और पुराने कर्ज वसूलने लगे।
- रैयतों पर पहले से चढ़ा कर्ज भारी बोझ बन गया।
नतीजा:
- कपास की कीमतें गिरी।
- ऋण मिलना बंद हो गया
- राजस्व बढ़ गया
- किसानों की हालत बहुत खराब हो गई।
एक तरफ कर्ज का स्रोत सूख गया, दूसरी तरफ कर/राजस्व की माँग बढ़ती गई – सबसे अधिक नुकसान छोटे किसानों और रैयतों को हुआ।
पाँचवी रिपोर्ट क्या थी?
- पाँचवी रिपोर्ट ब्रिटिश संसद की Select Committee द्वारा 1813 ई. में प्रस्तुत की गई थी।
- यह रिपोर्ट ईस्ट इंडिया कंपनी के भारत में शासन, राजस्व नीति और प्रशासन की जाँच के लिए तैयार की गई थी।
लिखने के कारण:-
- भारत में ब्रिटिश अधिकारियों के भ्रष्टाचार और शोषण की शिकायते।
- कंपनी की राजस्व नीति (स्थायी बंदोबस्त) के परिणामों की समीक्षा की आवश्यकता।
- भारत में प्रशासनिक अव्यवस्था और आर्थिक संकट की खबरें।
- ब्रिटिश संसद द्वारा कंपनी पर नियंत्रण बढ़ाने की इच्छा।
- संसद को यह जानना था कि कंपनी भारत में कितनी अच्छी तरह शासन कर रही है।
परिणाम:-
- ईस्ट इंडिया कंपनी की नीतियों और अधिकारियों की कड़ी आलोचना हुई।
- किसानों की दुर्दशा और शोषण उजागर हुआ।
- स्थायी बंदोबस्त की खामियाँ सामने आई – ज़मींदार अमीर, किसान गरीब ।
- ब्रिटिश संसद ने भारत के मामलों में सीधा हस्तक्षेप बढ़ाया।
- प्रशासनिक सुधारों की दिशा में कदम उठाए गए।
महत्व:
- भारत में ब्रिटिश नियंत्रण की नींव मजबूत हुई।
- यह रिपोर्ट औपनिवेशिक शासन का महत्वपूर्ण दस्तावेज बनी।
- भारतीय कृषि और राजस्व नीति को समझने का मुख्य स्रोत है।
- इतिहासकारों के लिए यह ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन का साक्ष्य मानी जाती है।
- इससे ब्रिटिश सरकार ने कंपनी से सत्ता धीरे-धीरे अपने हाथो मे लेनी शुरू की।
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