कक्षा 11 इतिहास अध्याय 2 के नोट्स हिंदी में
तीन महाद्वीपों में फैला हुआ साम्राज्य notes
यहाँ हम कक्षा 11 इतिहास के 2nd अध्याय “तीन महाद्वीपों में फैला हुआ साम्राज्य” के नोट्स उपलब्ध करा रहे हैं। इस अध्याय में “तीन महाद्वीपों में फैला हुआ साम्राज्य” से जुड़ी प्रमुख विशेषताओं का अध्ययन किया गया है।
ये नोट्स उन छात्रों के लिए उपयोगी सिद्ध होंगे जो इस वर्ष बोर्ड परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं। सरल और व्यवस्थित भाषा में तैयार की गई यह सामग्री अध्याय को तेजी से दोहराने और मुख्य बिंदुओं को याद रखने में मदद करेगी।
कक्षा 11 इतिहास अध्याय 2 के नोट्स हिंदी में, तीन महाद्वीपों में फैला हुआ साम्राज्य notes

class 11 History chapter 2 notes in hindi
रोमन साम्राज्य का फैलाव तीन महाद्वीपों में
- यूरोप
- पश्चिमी एशिया
- उत्तरी अफ्रीका
आज का अधिकांश यूरोप, पश्चिमी एशिया और उत्तरी अफ्रीका हिस्सा शामिल था।
रोमन साम्राज्य की जानकारी के स्रोत :-
रोमन साम्राज्य की जानकारी के स्रोत को तीन वगों में विभाजित किया गया है :-
1. पाठ्य सामग्री :-
- वर्ष वृत्तान्त (Yearbook)
- पत्र (Letter)
- व्याख्यान (Lecture)
- प्रवचन (Sermon)
- कानून (Law)
2. प्रलेख या दस्तावेज :-
पैपाइरस पर लिखे गये सूचना गए ।
3. भौतिक अवशेष :-
- इमारतें (buildings)
- बर्तन (Utensil)
- सिक्के (coins)
4. वर्ष वृतांत :-
समकालीन व्यक्तियों द्वारा प्रतिवर्ष लिखे जाने वाले इतिहास के ब्यौरे को ‘वर्ष – वृतांत’ कहा जाता है।
5. पैपाइरस :-
पैपाइरस एक सरकंडे जैसा पौधा था, जो मिस्त्र में नील नदी के किनारे उगा करता था और उसी से लेखन सामग्री तैयार की जाती थी। हजारों की संख्या में संविदापत्र, लेख, संवादपत्र और सरकारी दस्तावेज आज भी ‘पैपाइरस’ पत्र पर लिखे हुए पाए गए हैं।
रोमन साम्राज्य को दो चरणों में बाँटा गया है
1. पूर्ववर्ती चरण (पूर्व-तीसरी शताब्दी काल)
- यह काल 27 ई.पू. (जब ऑगस्टस सम्राट बना) से लेकर तीसरी शताब्दी के मध्य तक माना जाता है।
- इसे रोमन साम्राज्य का शक्ति और स्थायित्व का युग माना जाता है।
- इस समय रोम एक मजबूत साम्राज्य था, जिसकी सीमाएं यूरोप, एशिया और अफ्रीका तक फैली थीं।
- कानून, सेना, वास्तुकला, और संस्कृति का बहुत विकास हुआ।
- सम्राटों की सत्ता मजबूत थी और राज्य में अपेक्षाकृत शांति थी ।
2. परवर्ती चरण (तीसरी शताब्दी के बाद का काल)
- यह काल तीसरी शताब्दी के संकटों के बाद शुरू होता है।
- इस काल में साम्राज्य ने बहुत से संकटों का सामना किया – जैसे आर्थिक गिरावट, बाहरी हमले, सेना की अस्थिरता और राजनीतिक अराजकता।
- डायोक्लेडियन और कॉन्स्टैन्टाइन महान जैसे सम्राटों ने साम्राज्य को बचाने के लिए सुधार किए।
- साम्राज्य का विभाजन भी इसी काल में हुआ – पश्चिमी और पूर्वी रोमन साम्राज्य में।
- पश्चिमी भाग 476 ईस्वी में समाप्त हो गया, लेकिन पूर्वी भाग (बीजान्टिन साम्राज्य) 1453 तक चला।
रोमन साम्राज्य का आरंभिक काल
- रोम साम्राज्य में 509 ई. पू. से 27 ई. पू. तक गणतंत्र शासन व्यवस्था चली ।
- आंतरिक संघर्षों के बाद ऑक्टावियन ने 27 ई.पू. में सत्ता संभाली और ऑगस्टस कहलाया।
- उसने गणतंत्र को हटाकर राजतंत्र (Empire) की नींव रखी।
- उसका शासन प्रिंसिपेट कहलाया – जहाँ वह “प्रथम नागरिक” था, पर असल में पूर्ण शासक था।
- इस समय को Pax Romana यानी “रोमन शांति” कहा जाता है।
रोमन साम्राज्य के राजनीतिक इतिहास के तीन प्रमुख खिलाड़ी :-
1. सम्राट (Emperor) :-
- प्रथम सम्राट ऑगस्टस – 27 ई. पू. में ऑगस्टस ने गणतंत्र शासन व्यवस्था का तख्ता पलट दिया और स्वयं सम्राट बन गया।
- उसने जिस राज्य की स्थापना की थी, उसे प्रिंसिपेट कहा गया।
- वह एक प्रमुख नागरिक के रूप में था।
- वह निरंकुश शासक नही था।
2. अभिजात वर्ग (Elite Class) :
- सैनेट (Senate) रोम की एक प्रमुख संस्था थी, जिसमें अमीर और ताकतवर लोग शामिल होते थे।
- यह संस्था खास तौर पर उस समय बहुत ताकतवर थी जब रोम एक गणतंत्र (Republic) था, यानी जब वहां जनता के चुने हुए लोग शासन करते थे, न कि राजा या सम्राट ।
- सैनेट में ज़्यादातर धनी, पुराने और ऊँचे कुल के परिवारों के लोग होते थे। इन्हें ही अभिजात वर्ग या “Elite Class” कहा जाता है।
- ये लोग ही ज्यादातर फैसले लेते थे, जैसे युद्ध करना है या नहीं, टैक्स कैसे लगाना है आदि।
- रोम का कानून, राजनीति और इतिहास इन अभिजात लोगों के हाथों में था।
- रोम के इतिहास की जो किताबे आज हमारे पास हैं, वे यूनानी और लातिनी भाषा में हैं और इन्हीं अमीर लोगों ने उन्हें लिखा या लिखवाया था। इसलिए हमें इतिहास अक्सर इन्हीं लोगों का नजरिया दिखाता है, आम जनता का नहीं।
3. सेना :-
- रोम की सेना एक पेशेवर (professional) सेना थी।
- मतलब यह कि वहाँ के सैनिक नौकरी की तरह सेवा करते थे और उन्हें वेतन मिलता था।
- हर सैनिक को कम से कम 25 साल तक सेना में सेवा करनी पड़ती थी।
- वेतनभोगी सेना का होना उस समय एक खास बात थी, क्योंकि बाकी देशों में ज़्यादातर सेनाएँ किसानों या
- नागरिकों से बनती थीं जो युद्ध के समय बुलाए जाते थे।
- सेना रोमन साम्राज्य की सबसे बड़ी और सबसे संगठित संस्था थी।
- चौथी शताब्दी (4th century) तक इसमें लगभग 6 लाख सैनिक थे।
- इन सैनिकों ने राज्य का विस्तार करने और उसे बचाने में बहुत बड़ा योगदान दिया।
- सैनिक अक्सर अच्छे वेतन और सेवा-शर्तों (जैसे ज़मीन, पेंशन, सुविधाएँ) के लिए आन्दोलन (protest) करते रहते थे।
- अगर उन्हें लगे कि उनके कमांडर या सम्राट उनकी बात नहीं सुन रहे हैं, तो कई बार ये विरोध विद्रोह में बदल जाता था।
रोमन साम्राज्य का विस्तार
1. आर्थिक रूप से मज़बूत :-
रोम साम्राज्य का आर्थिक ढाँचा बहुत मजबूत था, जिससे उसका तेजी से विस्तार हुआ।
2. उद्योग और उत्पादन :-
- साम्राज्य में कई बंदरगाह, खानें, खदानें, ईंट भट्टियाँ, और जैतून तेल के कारखाने थे।
- उपजाऊ भूमि (fertile land) होने से खेती-बाड़ी खूब होती थी।
3. व्यापार और बैंकिंग :-
- व्यापार के लिए सुगठित वाणिज्यिक और बैंकिंग व्यवस्था थी।
- सिक्कों और मुद्रा का प्रयोग व्यापक था।
4. वस्तुओं की ढुलाई :-
- तरल चीजें जैसे तेल और शराब को एम्फोरा (Amphora) नाम के कंटेनरों में ले जाया जाता था।
- स्पेन में बना जैतून का तेल, ड्रेसल-20 नामक विशेष एम्फोरा में भरकर भेजा जाता था।
5. व्यापारिक नेटवर्क :-
- रोम का व्यापार यूरोप, एशिया और उत्तरी अफ्रीका तक फैला हुआ था।
- समुद्री मार्ग और सड़कों का अच्छा जाल था।
रोमन साम्राज्य में लिंग,साक्षरता और संस्कृति
रोमन साम्राज्य में लिंग
1. परिवार और समाजः-
- रोमन समाज में एकल परिवार का चलन था।
- वयस्क बेटे शादी के बाद अपने पिता के साथ नहीं रहते थे।
- दासों को भी परिवार का हिस्सा माना जाता था।
2. विवाह और महिलाओं की स्थितिः-
- विवाह के समय पिता द्वारा दिया गया दहेज (dowry) पति को मिल जाता था।
- लेकिन पत्नियों का अपने मायके (पिता के घर) पर अधिकार बना रहता था।
- पिता की मृत्यु के बाद महिलाएं उनकी संपत्ति में हिस्सा पा सकती थीं।
- तलाक लेना आसान था, और समाज में इसे स्वीकार किया जाता था।
3. विवाह की उम्र :-
- लड़कों की शादी आमतौर पर 28-32 वर्ष की उम्र में होती थी।
- लड़कियों की शादी 16-23 वर्ष की उम्र में कर दी जाती थी।
4. पुरुषों का वर्चस्वः
- समाज पितृसत्तात्मक (male-dominated) था।
- पुरुष, पत्नी पर हावी रहते थे और कई बार उनके साथ हिंसा भी करते थे।
- कैथोलिक बिशप ऑगस्टीन ने बताया कि उनकी माँ को उनके पिता मारते थे, जो उस समय सामान्य माना जाता था।
रोमन साम्राज्य में साक्षरता
- रोमन साम्राज्य में साक्षरता बहुत सीमित और केवल काम चलाने लायक थी।
- आम लोग पढ़-लिख नहीं पाते थे, केवल कुछ खास वर्गों में ही पढ़ाई होती थी।
1. प्रमाण :-
- मिस्र में मिले पैपाइरस दस्तावेज़ (Papyrus documents) से पता चलता है कि लोग संविदा-पत्र जैसे कानूनी कागज़ों पर हस्ताक्षर नहीं कर पाते थे।
- कई दस्तावेज़ों में लिखा होता था कि “अमुक व्यक्ति पढ़-लिख नहीं सकता।”
2. किन वर्गों में साक्षरता थी?
- सैनिक, फौजी अधिकारी, और संपत्ति प्रबंधक (estate managers) आम तौर पर साक्षर होते थे।
- इन लोगों को आदेश, रजिस्टर और हिसाब-किताब रखने के लिए लिखना-पढ़ना आना जरूरी था।
3. अन्य बातें :-
- अमीर और उच्च वर्ग के पुरुष बच्चों को औपचारिक शिक्षा दी जाती थी।
- महिलाएं और दास आमतौर पर अशिक्षित रहते थे, हालांकि कुछ अमीर घरों की महिलाएं पढ़ी-लिखी होती थीं।
- शिक्षा देने के लिए निजी गृह-शिक्षक रखे जाते थे।
रोमन साम्राज्य में संस्कृति
- सांस्कृतिक विविधता बहुत अधिक थी, क्योंकि रोमन साम्राज्य बहुत बड़े क्षेत्र में फैला था (यूरोप, एशिया और अफ्रीका के हिस्सों तक)।
- मुख्य विशेषताएं :-
1. धार्मिक विविधताः-
- हर इलाके के अपने देवी-देवता और धार्मिक विश्वास थे।
- ईसाई धर्म के अलावा कई स्थानीय धर्म और पंथ प्रचलित थे।
2. भाषा की विविधताः-
- साम्राज्य में लैटिन और यूनानी प्रमुख भाषाएं थीं।
- कई क्षेत्रीय भाषाएं भी बोली जाती थीं, जिनमें से कुछ की लिपि (script) नहीं थी- केवल मौखिक रूप में प्रचलित थीं।
3. वेशभूषा और खानपान :-
- हर क्षेत्र की अपनी पहनने की शैली थी।
- भोजन भी स्थानीय सामग्री और स्वाद के अनुसार अलग-अलग होता था।
- जैतून का तेल, शराब, अनाज और मांस का उपयोग आम था।
4. सामाजिक संगठन :
- अलग-अलग क्षेत्रों में सामाजिक ढांचे (जैसे समुदाय, परिवार, दास स्वामी संबंध) अलग थे।
- विभिन्न जातीय समूह और संस्कृति के रूप साथ-साथ रहते थे।
5. बस्तियों का रूप :-
कुछ बस्तियाँ बड़े शहरों जैसी थीं, वहीं कुछ छोटे गाँव या किलेनुमा बस्तियाँ थीं।
रोमन साम्राज्य में श्रमिकों पर नियंत्रण
रोमन साम्राज्य, खासकर भूमध्य सागर और पश्चिमी एशिया के इलाकों में, दासता (गुलामी) की जड़े बहुत गहरी थीं। लोग दासों को केवल इंसान नहीं, बल्कि एक तरह की “पूंजी” या संपत्ति मानते थे। उनके साथ व्यवहार लाभ-हानि के हिसाब से होता था, न कि सहानुभूति से।
1. आबादी में दासों की संख्या :-
- सम्राट ऑगस्टस के शासनकाल में (27 ई.पू. – 14 ई.), इटली की कुल आबादी करीब 75 लाख थी, जिसमें से लगभग (30) लाख लोग दास थे।
- इसका मतलब है कि हर 2-3 लोगों में से 1 दास था।
2. श्रमिकों और दासों के साथ व्यवहार :-
- ऊँचे वर्ग (अमीर लोग) दासों और श्रमिकों से बहुत क्रूरता से पेश आते थे।
- दासों को हर समय निगरानी में रखा जाता था। उन्हें काम छोड़कर भागने से रोकने के लिए कड़े नियम बनाए गए थे।
- उन्हें दागा (branding) जाता था ताकि अगर वे भाग जाएं, तो उन्हें पहचाना जा सके।
3. श्रमिकों को बांधकर रखना :-
- कामगारों को बंधुआ मजदूर बना दिया जाता था।
- उन्हें ऋण अनुबंध पर हस्ताक्षर करवाए जाते थे ताकि वे काम छोड़ न सकें।
- कई बार माता-पिता अपने बच्चों को भी 25 साल के लिए बेच देते थे, जिससे वे बंधुआ बन जाते थे।
4. वेतनभोगी मजदूरों की स्थिति :-
- सरकारी कार्यों के लिए दासों की बजाय वेतनभोगी मजदूरों को काम पर रखा जाने लगा, क्योंकि यह सस्ता और आसान विकल्प था।
- दासों को सालभर खाना खिलाना पड़ता था, जबकि वेतनभोगी मजदूरों को काम के हिसाब से ही पैसे देने पड़ते थे।
- धीरे-धीरे वेतनभोगी श्रमिकों की संख्या बढ़ने लगी।
5. काम पर सख्त नियंत्रण :-
- मजदूरों को छोटे-छोटे समूहों में बांटा जाता था ताकि यह पता लगाया जा सके कि कौन ठीक से काम कर रहा है और कौन नहीं।
- कड़ी निगरानी रखी जाती थी काम में ढिलाई या भागने पर सजा मिलती थी।
रोमन साम्राज्य में सामाजिक श्रेणियाँ
1. प्रारंभिक काल की सामाजिक श्रेणियाँ :-
रोमन साम्राज्य की शुरुआत में समाज को पाँच मुख्य वर्गों में बाँटा गया थाः-
i.सैनेटर वर्ग
सबसे ऊँचा और प्रभावशाली वर्ग। ये लोग राजनीति, प्रशासन और सेना में उच्च पदों पर होते थे।
ii. अश्वारोही वर्ग
ये धनवान व्यापारी, जमींदार या सैन्य अधिकारी होते थे। सैनेटरों से नीचे पर काफी प्रभावशाली।
iii.सम्मानित जनता
आम नागरिक जिनके पास कुछ संपत्ति होती थी। इन्हें मतदान का अधिकार होता था।
iv.फूहड़ निम्नतर वर्ग (Lower Class / Plebeians)
ये गरीब नागरिक होते थे, जो मजदूरी या छोटे-मोटे काम करते थे।
v.दास
समाज का सबसे निचला वर्ग। इन्हें कोई अधिकार नहीं थ और इन्हें संपत्ति की तरह देखा जाना था।
2. परवर्ती काल की सामाजिक श्रेणियाँ :-
समय के साथ रोमन समाज में कुछ बदलाव आए और समाज को तीन मुख्य वर्गों में बाँटा जाने लगाः-
i. अभिजात वर्ग
इसमें सैनेटर, अमीर अश्वारोही और ऊँचे पदों पर बैठे लोग आते थे।
ii. मध्यम वर्ग
व्यापारी, दस्तकार, छोटे ज़मींदार और वेतनभोगी अधिकारी।
iii. निम्न वर्ग
गरीब किसान, श्रमिक, मजदूर और दास।
3. भ्रष्टाचार और लूट-खसोट :
- जैसे-जैसे साम्राज्य बढ़ता गया, प्रशासन में भ्रष्टाचार भी बढ़ने लगा।
- अधिकारियों और सैनिकों द्वारा प्रांतों में लूट-खसोट, ज़मीन हड़पना और टैक्स में धांधली आम बात हो गई।
- स्थानीय जनता पर अन्याय होता था, और प्रशासन की नीतियाँ केवल अमीर वर्ग के हित में थीं।
- गरीब वर्ग का शोषण बढ़ता गया, जिससे आर्थिक असमानता और सामाजिक तनाव उत्पन्न हुआ।
दास प्रजनन का अर्थ
- “दास प्रजनन” का मतलब है – दासों से जानबूझकर संतान उत्पन्न करवाना, ताकि मालिकों को और दास मिल सकें।
- इसका उद्देश्य नए दासों की संख्या बढ़ाना था, जिससे बाज़ार में दासों की आपूर्ति बनी रहे और नए दास खरीदने की ज़रूरत कम हो जाए।
रोमन साम्राज्य में श्रम-प्रबंधन की विशेषताएँ
- श्रम का मुख्य आधार दास श्रमिक थे।
- युद्ध में पकड़े गए लोगों को दास बनाकर श्रम कराया जाता था।
- बड़े खेतों (लैटिफुंडिया) में दासों द्वारा कृषि कार्य कराया जाता था।
- शहरों में स्वतंत्र कारीगर, व्यापारी और श्रमिक मौजूद थे।
- सैनिकों को वेतन, भूमि और पेंशन दी जाती थी।
- सेना का उपयोग निर्माण कार्यों (जैसे सड़क, पुल, किले) में भी होता था।
- कुछ उद्योग और निर्माण कार्य सीधे राज्य के नियंत्रण में थे।
- राज्य श्रमिकों को वेतन देता था और प्रशासनिक निगरानी रखता था।
- अधिकांश श्रमिक कृषि कार्य में लगे हुए थे।
- किसान स्वतंत्र, बंधुआ या राज्य के अधीन हो सकते थे।
- दासों और निम्न वर्ग के श्रमिकों को कोई कानूनी अधिकार प्राप्त नहीं थे।
- मालिकों के पास दासों पर पूर्ण अधिकार होता था।
- शारीरिक श्रम को निम्म्र दर्जे का माना जाता था।
रोमन साम्राज्य में श्रमिक प्रबंधन में बदलाव और निरीक्षण की प्रणाली
- दास श्रम महंगा हो गया था, इसलिए कई दासों को मुक्त किया जाने लगा।
- इन मुक्त दासों या अन्य स्वतंत्र व्यक्तियों को व्यापार प्रबंधक के रूप में नियुक्त किया जाने लगा।
- मालिक अपने व्यापार का संचालन गुलामों या पूर्व-गुलामों को सौंप देते थे।
- कभी-कभी ये प्रबंधक पूरे व्यापार या पूंजी की जिम्मेदारी भी संभालते थे।
- श्रमिकों (दास और मुक्त दोनों) के लिए कड़ा निरीक्षण एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा था।
- काम की निगरानी को आसान बनाने के लिए श्रमिकों को छोटे-छोटे दलों (समूहों) में बांटा जाता था।
- समूह बनाकर यह देखा जाता था कि कौन श्रमिक काम कर रहा है और कौन काम से बच रहा है।
- इस प्रणाली से कार्यक्षमता और उत्तरदायित्व सुनिश्चित किया जाता था।
अश्वारोही
- अश्वारोही वर्ग रोमन समाज का दूसरा सबसे ताकतवर और अमीर वर्ग था।
- शुरू में ये ऐसे परिवारों से आते थे जिनके पास इतनी संपत्ति होती थी कि वे घुड़सवार सेना में शामिल हो सकते थे।
- इसलिए इन्हें “इक्वाइट्स” कहा जाता था (Equus = घोड़ा)।
- वे अक्सर बड़े ज़मींदार होते थे।
- इनमें कई लोग व्यापारी, जहाज मालिक और साहूकार (ब्याज पर पैसा देने वाले) भी होते थे। D
- ये लोग व्यापार, वित्त और कृषि जैसे कार्यों में शामिल रहते थे।
- यह वर्ग राजनीति में भी धीरे-धीरे सक्रिय होने लगा था, लेकिन मुख्य रूप से यह आर्थिक ताकत के लिए जाना जाता था।
अश्वारोही (इक्वाइट्स) या नाइट वर्ग की विशेषताएँ
- यह रोमन समाज का दूसरा सबसे ऊँचा और प्रभावशाली वर्ग था (पहला – सैनेटोरियल वर्ग।।
- इन्हें “इक्वाइट्स” (Equites) इसलिए कहा जाता था क्योंकि इनके पास इतने संसाधन होते थे कि ये घुड़सवार सेना में भर्ती हो सकते थे।
- यह वर्ग धनी जमींदारों, व्यापारियों, जहाज मालिकों, और साहूकारों (बैंकरों) का था।
- ये लोग अक्सर व्यापार, वित्त, कर वसूली और अनुबंधों से जुड़े होते थे।
- सेम के शुरुआती काल में इन्हें सेना में सेवा देना पड़ता था, लेकिन बाद में इन्होंने आर्थिक क्षेत्रों में ज्यादा काम किया।
- ये लोग राजनीति में सीधे भाग नहीं लेते थे, लेकिन अपनी आर्थिक ताकत के कारण प्रभावशाली माने जाते थे।
- कई अश्वारोही वर्ग के लोग सरकार से ठेके (contracts) लेकर निर्माण, कर संग्रह आदि जैसे काम करते थे।
- रोम की अदालतों में न्यायाधीश के रूप में भी इक्वाइट्स की भूमिका होती थी।
- यह वर्ग सामाजिक प्रतिष्ठा, धन और सम्मान के लिए जाना जाता था।
- बाद के रोमन साम्राज्य में इनकी संख्या और प्रभाव और भी बढ़ गया।
मध्य का काल (तीसरी शताब्दी) का संकट
- पहली और दूसरी शताब्दी में रोमन साम्राज्य में शांति, विकास और आर्थिक बढ़ोतरी हुई।
- लेकिन तीसरी शताब्दी से अंदरूनी समस्याएऔर बड़े संकट सामने आए।
- 225 ईसवी में ईरान में एक नया और ज्यादा आक्रामक राजवंश बना, जिससे ससानी कहा जाता है।
- ये ससानी राजा जल्दी ही फ़रात नदी के इलाकों तक फैल गए।
- ईरान के शासक शापुर प्रथम ने कहा कि उसने 60,000 रोमन सैनिकों को हराया है।
- उसने रोमन साम्राज्य की पूर्वी राजधानी भी अपने कब्जे में ले ली।
- दूसरी तरफ, जर्मन जनजातियाँ जो राइन और डेन्यूब नदियों के पास रहती थीं, उन्होंने रोमन सीमाओं पर बार-बार हमले किए।
- 233 से 280 के बीच इन इलाकों में लगातार लड़ाइयाँ हुई।
- तीसरी शताब्दी में बहुत अस्थिरता थी, क्योंकि 47 सालों में 25 अलग-अलग सम्राट रोमन साम्राज्य के शासक बने।
- इसका मतलब था कि सत्ता बहुत जल्दी बदलती थी और राजनीतिक स्थिति कमजोर हो गई थी।
परवर्ती पुराकाल के परिवर्तन और उसकी विशेषताएँ
- सम्राट कांन्स्टैनटाइन ने ईसाई धर्म को रोमन साम्राज्य का राजधर्म बना दिया।
- सातवीं शताब्दी में इस्लाम धर्म का उदय हुआ।
- सम्राट डायोक्लीशियन ने बड़े और कमजोर क्षेत्रों को छोड़कर साम्राज्य को छोटा कर दिया ताकि प्रबंधन बेहतर हो सके।
- साम्राज्य की सीमाओं पर मजबूत किले बनवाए गए।
- प्रांतों का पुनर्गठन किया गया जिससे प्रशासनिक नियंत्रण बढ़ा।
- सैनिक और असैनिक (सरकारी) कामों को अलग कर दिया गया।
- सेनापतियों को ज्यादा स्वायत्तता (स्वतंत्रता) दी गई, जिससे सैनिक अधिकारी अधिक शक्तिशाली बने।
- कांन्स्टैनटाइन ने मुद्रा प्रणाली में सुधार किया और “सॉलिडस” नाम का नया सिक्का चलाया, जो लगभग 4.5 ग्राम शुद्ध सोने का था।
- सॉलिडस सिक्के बड़ी मात्रा में बनाए गए और साम्राज्य के पतन के बाद भी उपयोग होते रहे।
- कांन्स्टेनटाइन ने दूसरी राजधानी के रूप में कुस्तुनतुनिया (कॉनस्टेंटिनोपल) का निर्माण करवाया, जो तीन तरफ़ से समुद्र से घिरी थी।
- आर्थिक विकास में तेजी आई, खासकर ग्रामीण उद्योग और औद्योगिक प्रतिष्ठानों में पूंजी निवेश बढ़ा।
- पूर्वी देशों के साथ लंबी दूरी के व्यापार का पुनरुद्धार हुआ।
- शहरी इलाकों की संपदा और समृद्धि में बहुत वृद्धि हुई।
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