भूमंडलीकृत विश्व का बनना notes
Class 10 Social Science Chapter 3 Notes in Hindi

यहाँ हम कक्षा 10 सामाजिक विज्ञान के 3rd अध्याय “भूमंडलीकृत विश्व का बनना” के नोट्स उपलब्ध करा रहे हैं। इस अध्याय में “भूमंडलीकृत विश्व का बनना” से जुड़ी प्रमुख विशेषताओं का अध्ययन किया गया है।

ये नोट्स उन छात्रों के लिए उपयोगी सिद्ध होंगे जो इस वर्ष बोर्ड परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं। सरल और व्यवस्थित भाषा में तैयार की गई यह सामग्री अध्याय को तेजी से दोहराने और मुख्य बिंदुओं को याद रखने में मदद करेगी।

भूमंडलीकृत विश्व का बनना notes, Class 10 Social Science Chapter 3 Notes in Hindi

भूमंडलीकृत विश्व का बनना notes, Class 10 Social Science Chapter 3 Notes in Hindi

कक्षा 10 सामाजिक विज्ञान अध्याय 3 के नोट्स हिंदी में

भूमंडलीकृत विश्व का बनना

  1. ऐसा सदियों से होता आया है कि व्यापार के कारण विचारों और संस्कृति का आदान प्रदान हुआ है।
  2. इस आदान प्रदान के कारण दुनिया के विभिन्न देश आपस में जुड़े हुए हैं।
  3. सिंधु घाटी की सभ्यता के युग में भी विभिन्न देशों के बीच आपसी संपर्क हुआ करता था। ये और बात है कि आधुनिक युग में यह संपर्क तेजी से बढ़ा है।

सिल्क रूट (मार्ग रेशम मार्ग)

  1. जो व्यापार मार्ग चीन को पश्चिमी देशों और अन्य देशों से जोड़ता था उसे सिल्क रूट कहते है।
  2. उस जमाने में कई सिल्क रूट थे।
  3. सिल्क रूट ईसा युग की शुरुआत के पहले से ही अस्तित्व में था और पंद्रहवीं सदी तक बरकरार था।
  4. सिल्क रूट से होकर चीन के बर्तन दूसरे देशों तक जाते थे।
  5. इसी प्रकार यूरोप से एशिया तक सोना और चाँदी इसी सिल्क रूट से आते थे।
  6. सिल्क रूट के रास्ते ही ईसाई, इस्लाम और बौद्ध धर्म दुनिया के विभिन्न भागों में पहुँच पाए।

भोजन की यात्रा

  1. व्यापार और विस्तार: व्यापार की वजह से भोजन एक देश से दूसरे देश पहुँचा। जैसे चीन से निकले नूडल्स आज भारत में सेवइयों और इटली में स्पैगेटी के रूप में मशहूर हैं।

  2. कोलंबस की खोज: आलू, टमाटर, मिर्च और मक्का जैसे खाद्य पदार्थ तब दुनिया में फैले जब क्रिस्टोफर कोलंबस ने गलती से अमेरिकी महाद्वीपों की खोज की थी।

  3. आलू का प्रभाव: आलू ने यूरोप के लोगों के खान-पान का स्तर सुधार दिया, जिससे वे बेहतर और लंबी जिंदगी जीने लगे।

  4. आइरिस अकाल: आयरलैंड में आलू पर निर्भरता इतनी बढ़ गई थी कि 1840 के दशक में फसल खराब होने पर लाखों लोग भूख से मर गए, जिसे ‘आइरिस अकाल’ कहा जाता है।

बीमारी, व्यापार और जीत

  1. नए समुद्री मार्गों की खोज: 16वीं सदी में यूरोपीय नाविकों द्वारा एशिया और अमेरिका के रास्तों की खोज ने न केवल व्यापार बढ़ाया, बल्कि दुनिया भर में यूरोप की जीत की नींव भी रखी।

  2. अमेरिका के संसाधन: अमेरिका के पास मौजूद खनिजों के भंडार और अनाज ने पूरी दुनिया के लोगों का जीवन बदल दिया, जिससे यूरोपीय उपनिवेशों (खासकर स्पेन और पुर्तगाल) की शुरुआत हुई।

  3. हथियार नहीं, बीमारी से जीत: यूरोप की अमेरिका पर जीत का मुख्य कारण युद्ध नहीं बल्कि चेचक जैसी बीमारी थी। यूरोपीय लोगों में इसके प्रति प्रतिरोधक क्षमता (immunity) थी, लेकिन अमेरिका के लोग इससे अनजान थे।

  4. विनाशकारी प्रभाव: चेचक के कीटाणुओं ने अमेरिका की पूरी की पूरी आबादी को साफ कर दिया, जिससे बिना किसी बड़े सैनिक संघर्ष के यूरोपियों का रास्ता साफ हो गया।

  5. यूरोप से पलायन: 19वीं सदी तक यूरोप में गरीबी और धार्मिक टकराव चरम पर थे। सजा और तंगी से बचने के लिए बहुत से लोग अमेरिका भाग गए और वहाँ के अवसरों का लाभ उठाकर तरक्की की।

  6. व्यापार का केंद्र: 18वीं सदी तक भारत और चीन दुनिया के सबसे अमीर देश थे, लेकिन चीन के बाहरी दुनिया से कटने और अमेरिका के उभरने के कारण विश्व व्यापार का केंद्र धीरे-धीरे यूरोप की तरफ खिसक गया।

उन्नीसवीं शताब्दी (1815 – 1914)

  • उन्नीसवीं सदी में दुनिया तेजी से बदल रही थी। इस अवधि में सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और तकनीकी के क्षेत्र में बड़े जटिल बदलाव हुए।
  • उन बदलावों की वजह से विभिन्न देशों के रिश्तों के समीकरण में अभूतपूर्व बदलाव आए।
  • अर्थशास्त्री मानते हैं कि आर्थिक आदान प्रदान तीन प्रकार के होते हैं जो निम्नलिखित हैं:
  1. व्यापार का आदान प्रदान
  2. श्रम का आदान प्रदान
  3. पूँजी का आदान प्रदान

वैश्विक अर्थव्यवस्था का निर्माण

  1. यूरोप में भोजन के उत्पादन और उपभोग का बदलता स्वरूपः पारंपरिक तौर पर ऐसा देखा गया है कि हर देश भोजन के मामले में आत्मनिर्भर होना चाहता है।
  2. लेकिन यूरोप में भोजन के लिये आत्मनिर्भर होने का मतलब था लोगों के लिये घटिया क्वालिटी का भोजन मिलना।
  3. अठारहवीं सदी में यूरोप की जनसंख्या में भारी वृद्धि के कारण भोजन की माँग में भी तेजी से वृद्धि हुई।
  4. सरकार को जमींदारों के दबाव के कारण मक्के के आयात पर नियंत्रण लगाना पड़ा।
  5. इसके फलस्वरूप ब्रिटेन में भोजन की कीमतें बढ़ गई।
  6. उसके बाद उद्योगपतियों और शहरी लोगों ने सरकार को इस बात के लिये बाध्य किया कि कॉर्न लॉ समाप्त किया जाये।

कॉर्न लॉ हटने के प्रभाव

  1. सस्ता आयात और कृषि संकट: कॉर्न लॉ खत्म होने से ब्रिटेन में बाहर से सस्ता अनाज आने लगा। स्थानीय अनाज महंगा होने के कारण टिक नहीं पाया, जिससे किसानों ने खेती छोड़ दी और बड़ी संख्या में लोग बेरोजगार होकर शहरों की ओर पलायन कर गए।

  2. बढ़ती माँग और औद्योगीकरण: अनाज के दाम गिरने और औद्योगीकरण से आमदनी बढ़ने के कारण भोजन की माँग बढ़ गई। इसे पूरा करने के लिए पूर्वी यूरोप, रूस, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में बड़े पैमाने पर जमीन साफ कर खेती शुरू की गई।

  3. बुनियादी ढांचे का विकास: खेतों को बंदरगाहों से जोड़ने के लिए रेलवे लाइनें बिछाई गईं। इन निर्माण कार्यों और खेती के लिए लंदन जैसे वित्तीय केंद्रों से पूंजी (Capital) का प्रवाह इन देशों की तरफ होने लगा।

  4. विशाल जन-पलायन (Migration): अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में मजदूरों की कमी को पूरा करने के लिए यूरोप से लोग वहाँ जाने लगे। 19वीं सदी में लगभग 5 करोड़ लोग यूरोप से और पूरी दुनिया से करीब 15 करोड़ लोग बेहतर जीवन की तलाश में विस्थापित हुए।

  5. वैश्विक अर्थव्यवस्था का जन्म: 1890 के दशक तक एक जटिल वैश्विक कृषि अर्थव्यवस्था बन चुकी थी, जिसमें पूंजी, श्रम और तकनीक के प्रवाह ने पूरी दुनिया को एक-दूसरे से जोड़ दिया था।

तकनीक की भूमिका

  1. इस दौरान विश्व की अर्थव्यवस्था के भूमंडलीकरण में टेकनॉलोजी ने एक अहम भूमिका निभाई।
  2. इस युग के कुछ मुख्य तकनीकी खोज हैं रेलवे, स्टीम शिप और टेलिग्राफ रेलवे ने बंदरगाहों और आंतरिक भूभागों को आपस में जोड़ दिया।
  3. स्टीम शिप के कारण माल को भारी मात्रा में अटलांटिक के पार ले जाना आसान हो गया।
  4. टेलीग्राफ की मदद से संचार व्यवस्था में तेजी आई और इससे आर्थिक लेन देन बेहतर रूप से होने लगे।

मीट का व्यापार

  1. शुरुआती चुनौतियाँ: 1870 के दशक तक ज़िंदा जानवरों को जहाजों में लादकर अमेरिका से यूरोप भेजा जाता था। वे जगह ज़्यादा घेरते थे, रास्ते में बीमार पड़ जाते थे या मर जाते थे, जिससे मीट बहुत महंगा और एक विलासिता (Luxury) की वस्तु थी।

  2. रेफ्रिजरेशन तकनीक का आगमन: फ्रिज वाली तकनीक (Refrigeration) आने से तस्वीर बदल गई। अब जानवरों को अमेरिका में ही काटकर उनके मांस (Processed Meat) को ठंडे जहाजों में सुरक्षित यूरोप भेजा जाने लगा।

  3. लागत में कमी: इस तकनीक से जहाज की जगह का बेहतर इस्तेमाल हुआ और परिवहन का खर्च घट गया। नतीजतन, यूरोप के बाजारों में मीट की कीमतें गिर गईं और इसकी उपलब्धता बढ़ गई।

  4. सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव: अब आम आदमी के भोजन में भी मांस शामिल हो गया। बेहतर खान-पान से लोगों में संतोष बढ़ा और देश में सामाजिक शांति आई, जिससे ब्रिटेन के लोग सरकार की औपनिवेशिक नीतियों का समर्थन करने लगे।

उन्नीसवीं सदी का उत्तरार्ध और उपनिवेशवाद

  1. एक तरफ व्यापार के फैलने से यूरोप के लोगों की जिंदगी बेहतर हो गई तो दूसरी तरफ उपनिवेशों के लोगों पर इसका बुरा प्रभाव पड़ा।
  2. जब अफ्रिका के आधुनिक नक्शे को गौर से देखेंगे तो आपको पता चलेगा कि ज्यादातर देशों की सीमाएँ सीधी रेखा में हैं जो अन्य महादेशों में देखने को नहीं मिलता है।
  3. ऐसा लगता है जैसे किसी छात्र ने सीधी रेखाएँ खींच दी हो।
  4. 1885 में यूरोप की बड़ी शक्तियाँ बर्लिन में मिलीं और अफ्रिकी महादेश को आपस में बाँट लिया।
  5. इस तरह से अफ्रिका के ज्यादातर देशों की सीमाएँ सीधी रेखाओं में बन गड़ी।

रिडरपेस्ट

  1. बीमारी और शक्ति का समीकरण: रिंडरपेस्ट मवेशियों में होने वाली एक घातक बीमारी थी। अफ्रीका के उदाहरण से पता चलता है कि कैसे एक बीमारी किसी पूरे क्षेत्र के सामाजिक और राजनैतिक ढांचे को बदल सकती है।

  2. मजदूरों की कमी: 19वीं सदी के अंत में यूरोपीय लोग अफ्रीका के खनिजों और बागानों का लाभ उठाना चाहते थे, लेकिन वहां मजदूरों की भारी कमी थी। चूंकि वहां जमीन और मवेशी प्रचुर मात्रा में थे, इसलिए लोग पैसों के लिए मजदूरी करने को तैयार नहीं थे।

  3. दमनकारी नीतियां: अफ्रीकियों को काम पर मजबूर करने के लिए यूरोपियों ने भारी टैक्स लगाए, जिन्हें चुकाने के लिए खानों में काम करना जरूरी था। इसके अलावा, उत्तराधिकार कानून बदलकर परिवार के केवल एक सदस्य को जमीन का हक दिया गया ताकि बाकी लोग मजदूरी की तलाश करें।

  4. रिंडरपेस्ट का कहर: 1880 के दशक के अंत में यूरोप से आए घोड़ों के जरिए यह बीमारी अफ्रीका पहुँची। इसने अफ्रीका के 90% मवेशियों को मार दिया, जिससे स्थानीय लोगों की आजीविका पूरी तरह नष्ट हो गई।

  5. यूरोपीय विजय: मवेशियों के खत्म होने से अफ्रीकी लोग असहाय हो गए। इस संकट का फायदा उठाकर यूरोपीय देशों ने आसानी से अफ्रीका को अपना गुलाम बना लिया और वहां के बचे-कुचे संसाधनों पर कब्जा कर लिया।

रिंडरपेस्ट का प्रकोप :-

  1. बीमारी का आगमन: रिंडरपेस्ट 1880 के दशक के अंत में अफ्रीका पहुँचा। यह उन मवेशियों के साथ आया था जो ब्रिटिश एशिया से पूर्वी अफ्रीका (एरिट्रिया) में लड़ रहे इटैलियन सैनिकों के खाने के लिए लाए गए थे।

  2. जंगल की आग की तरह फैलाव: यह बीमारी इतनी घातक और तेज़ थी कि मात्र कुछ वर्षों में, यानी 1892 तक, यह अफ्रीका के पूर्वी तट से पश्चिमी तट तक पहुँच गई।

  3. मवेशियों का विनाश: इस प्रकोप ने अफ्रीका के 90% मवेशियों को खत्म कर दिया। अफ्रीकी समाज के लिए मवेशी ही उनकी संपत्ति और आजीविका का मुख्य आधार थे।

  4. आर्थिक और सामाजिक प्रभाव: मवेशियों के खत्म होने से स्थानीय लोगों की आत्मनिर्भरता समाप्त हो गई। उनके पास अपनी रोजी-रोटी चलाने के लिए यूरोपीय लोगों की खानों और बागानों में मजदूरी करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा।

  5. यूरोपीय उपनिवेशवाद की जीत: इस बीमारी ने वह काम कर दिया जो हथियार नहीं कर पाए थे। मवेशियों की मौत ने अफ्रीकी प्रतिरोध को कमजोर कर दिया, जिससे यूरोपियों को पूरे महाद्वीप पर अपना कब्जा जमाने और उसे उपनिवेश बनाने में आसानी हुई।

भारत से बंधुआ मजदूरों का पलायन

  1. बंधुआ मजदूर की परिभाषा: ये वे मजदूर थे जो एक निश्चित अवधि के लिए किसी खास मालिक के साथ अनुबंध (Contract) के तहत काम करने को प्रतिबद्ध होते थे।

  2. प्रमुख क्षेत्र: उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य भारत और तमिलनाडु के सूखाग्रस्त इलाकों से गरीब लोग अपनी आजीविका की तलाश में बंधुआ मजदूर बने।

  3. पलायन के स्थान: इन्हें मुख्य रूप से कैरेबियन द्वीप समूह (त्रिनिदाद, गुयाना, सूरीनाम), मॉरीशस और फिजी भेजा गया। कुछ को सीलोन (श्रीलंका), मलाया और असम के चाय बागानों में भी काम पर लगाया गया।

  4. एजेंटों का धोखा: भर्ती करने वाले एजेंट अक्सर मजदूरों को झूठे वादे करते थे, जैसे उन्हें कार्यस्थल की दूरी और काम की परिस्थितियों के बारे में सही जानकारी नहीं दी जाती थी।

  5. भयावह स्थितियाँ: नई जगहों पर इन मजदूरों के पास कोई कानूनी अधिकार नहीं थे। उन्हें बेहद कठिन और अमानवीय परिस्थितियों में काम करना पड़ता था।

  6. प्रथा का अंत: 1900 के दशक से भारतीय राष्ट्रवादियों ने इस दमनकारी व्यवस्था का कड़ा विरोध शुरू किया, जिसके परिणामस्वरूप 1921 में इस प्रथा को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया।

भारत से प्रेरित श्रम प्रवासन इंडेंटेड लेबर का मतलब

  1. इंडेंटेड लेबर का अर्थ: इसका मतलब एक ऐसे बंधुआ मजदूर से है जो एक निश्चित समय (आमतौर पर 5 साल) के लिए किसी मालिक के साथ अनुबंध (Contract) के तहत काम करने के लिए बाध्य होता था।

  2. मिश्रित प्रभाव: यह व्यवस्था कुछ लोगों के लिए आय का जरिया बनी, लेकिन बहुसंख्यकों के लिए अत्यधिक गरीबी और शोषण का कारण साबित हुई।

  3. प्रमुख स्रोत क्षेत्र: ये मजदूर मुख्य रूप से वर्तमान पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य भारत और तमिलनाडु के सूखाग्रस्त इलाकों से आते थे।

  4. प्रवासन के कारण: इन क्षेत्रों में कुटीर उद्योग खत्म हो रहे थे, जमीन का किराया बढ़ गया था और खेती की जमीन को खानों या बागानों के लिए खाली कराया जा रहा था, जिससे लोग बेरोजगार हो गए थे।

  5. गुलामी का नया रूप: 19वीं शताब्दी में इस व्यवस्था की कठोरता और मजदूरों के अधिकारों के हनन के कारण इसे ‘गुलामी की नई प्रणाली’ कहा गया।

  6. सांस्कृतिक संगम (होसे): त्रिनिदाद में ‘होसे’ (Hosay) नाम का एक दंगाई कार्निवल मशहूर हुआ, जहाँ सभी धर्मों और जातियों के भारतीय मजदूरों ने मिलकर अपनी एक नई सांस्कृतिक पहचान बनाई।

विदेशों में भारतीय व्यवसायी

  1. प्रमुख बैंकिंग समूह: शिकारीपुरी श्रॉफ और नट्टूकोट्टई चेट्टियार जैसे नामी बैंकरों ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार में बड़ी भूमिका निभाई। उन्होंने मध्य और दक्षिण-पूर्व एशिया में निर्यात होने वाली खेती (जैसे अफीम और कपास) में भारी पूँजी लगाई।

  2. स्वदेशी बैंकिंग प्रणाली: इन व्यवसायियों के पास दुनिया भर में पैसा भेजने का अपना एक आधुनिक और सुरक्षित परिष्कृत सिस्टम (Indigenous Banking) था, जो आज के बैंकिंग नेटवर्क जैसा ही प्रभावी था।

  3. वैश्विक विस्तार: भारतीय व्यापारी और महाजन यूरोपीय शासकों के साथ अफ्रीका तक जा पहुँचे। हैदराबाद के सिंधी व्यापारियों ने तो 1860 के दशक तक दुनिया के प्रमुख बंदरगाहों पर अपने बड़े-बड़े इम्पोरियम (Emporiums) स्थापित कर लिए थे।

  4. कॉटन व्यापार में गिरावट: 1800 के आसपास भारत के कुल निर्यात में सूती कपड़ों की हिस्सेदारी 30% थी। लेकिन ब्रिटेन में औद्योगीकरण और आयात शुल्क (Taxes) लगने के कारण यह गिरकर 1870 तक मात्र 3% रह गई।

  5. बाजार का उलटफेर: जहाँ पहले भारत उम्दा कपड़े निर्यात करता था, वहीं अब ब्रिटेन के कारखानों में बने सस्ते कपड़े भारतीय बाजारों में भरने लगे। इसके बदले भारत अब कच्चा माल (जैसे कपास और अफीम) निर्यात करने वाला देश बनकर रह गया।

भारतीय व्यापार, उपनिवेश और वैश्विक सिस्टम

  • निर्यात का बदलता स्वरूप: जहाँ 1815 में सूती कपड़ों का निर्यात 15% था, वह 1870 तक गिरकर मात्र 3% रह गया। इसके विपरीत, कच्चे कपास (Raw Cotton) का निर्यात 5% से बढ़कर 35% हो गया।

  • प्रमुख निर्यात वस्तुएँ: इस दौरान नील (Indigo) और अफीम के निर्यात में भारी बढ़ोतरी हुई। भारत से अफीम का एक बड़ा हिस्सा मुख्य रूप से चीन भेजा जाता था।

  • ब्रिटेन का व्यापार अधिशेष (Trade Surplus): भारत कच्चे माल का निर्यातक और ब्रिटेन के कारखानों में बने तैयार माल का आयातक बन गया। ब्रिटेन भारत को जितना सामान बेचता था, उसकी कीमत भारत से खरीदे गए माल से कहीं ज्यादा थी। इस अंतर को ‘ट्रेड सरप्लस’ कहा जाता था, जो पूरी तरह ब्रिटेन के पक्ष में था।

  • होम चार्जेस (Home Charges): ब्रिटेन भारत से होने वाली इस कमाई (सरप्लस) का इस्तेमाल अपने अन्य उपनिवेशों को सँभालने और अपने खर्चों को पूरा करने के लिए करता था। इसमें निम्नलिखित खर्चे शामिल थे:-

  1. भारत में तैनात ब्रिटिश अफसरों का वेतन।
  2. भारत के बाहरी कर्जों पर ब्याज की भरपाई।
  3. रिटायर्ड ब्रिटिश अफसरों की पेंशन का खर्चा।

युद्ध काल की अर्थव्यवस्था

  1. दो शक्तिशाली गुट: यह युद्ध दो खेमों के बीच लड़ा गया। एक तरफ मित्र राष्ट्र (ब्रिटेन, फ्रांस, रूस और बाद में अमेरिका) थे, तो दूसरी तरफ केंद्रीय शक्तियाँ (जर्मनी, ऑस्ट्रिया-हंगरी और उस्मानी तुर्की) थीं।

  2. जान-माल की भारी हानि: 4 साल तक चले इस युद्ध में लगभग 90 लाख लोग मारे गए और 2 करोड़ घायल हुए। मरने वालों में ज्यादातर कामकाजी उम्र के पुरुष थे, जिससे यूरोप में श्रम शक्ति (Labour Force) की भारी कमी हो गई।

  3. सामाजिक बदलाव: पुरुषों के युद्ध पर चले जाने के कारण कारखानों और खेतों की जिम्मेदारी महिलाओं के कंधों पर आ गई। इससे उन कामों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी जो पहले केवल पुरुषों के लिए माने जाते थे।

  4. आर्थिक संबंधों में दरार: युद्ध के कारण दुनिया की बड़ी आर्थिक शक्तियों के बीच व्यापारिक संबंध टूट गए और अर्थव्यवस्थाएं चरमरा गईं।

  5. अमेरिका का उदय: युद्ध के खर्च के लिए ब्रिटेन को अमेरिका से भारी कर्ज लेना पड़ा। इस बदलाव ने अमेरिका को एक ‘कर्जदार’ देश से बदलकर दुनिया का सबसे बड़ा ‘अंतरराष्ट्रीय साहूकार’ (Lender) बना दिया। अब दूसरे देशों की संपत्ति की तुलना में अमेरिका की विदेशों में संपत्ति कहीं अधिक थी।

युद्ध के बाद के सुधार :-

  • ब्रिटेन के दबदबे में कमी: युद्ध के दौरान ब्रिटेन की व्यस्तता का लाभ उठाकर भारत और जापान में उद्योगों का तेजी से विकास हुआ। युद्ध के बाद ब्रिटेन के लिए अपनी पुरानी वैश्विक स्थिति को वापस पाना और जापान से प्रतिस्पर्धा करना बहुत मुश्किल हो गया।

  • आर्थिक बोझ और कर्ज: युद्ध के कारण ब्रिटेन पर अमेरिका का भारी कर्ज चढ़ गया। जो अर्थव्यवस्था युद्ध के दौरान हथियारों और रसद की माँग के कारण फल-फूल रही थी, वह युद्ध समाप्त होते ही ठप पड़ गई।

  • बेरोजगारी का संकट: युद्ध के बाद सैन्य और औद्योगिक माँग कम होने से उत्पादन घट गया, जिसके परिणामस्वरूप ब्रिटेन के 20% कामगारों को अपनी नौकरियों से हाथ धोना पड़ा।

  • गेहूँ का संकट और कृषि में तबाही: युद्ध के दौरान पूर्वी यूरोप से गेहूँ की आपूर्ति बंद होने पर कनाडा, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया बड़े निर्यातक बने। लेकिन युद्ध के बाद जैसे ही पूर्वी यूरोप ने दोबारा सप्लाई शुरू की, बाज़ार में गेहूँ की भारी अधिकता हो गई।

  • कीमतों में गिरावट: गेहूँ की अत्यधिक आपूर्ति के कारण कीमतें तेजी से गिर गईं। इससे किसानों की आमदनी घट गई और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पूरी तरह तबाह हो गई।

बड़े पैमाने पर उत्पादन और उपभोग की शुरुआत :-

  • मास प्रोडक्शन की शुरुआत: 1920 के दशक में अमेरिकी अर्थव्यवस्था तेजी से सुधरी। फोर्ड मोटर्स के संस्थापक हेनरी फोर्ड को ‘मास प्रोडक्शन’ का जनक माना जाता है। उन्होंने ‘असेंबली लाइन’ तकनीक अपनाई जिससे उत्पादन की गति बढ़ी और लागत में कमी आई।

  • बढ़ती आमदनी और उपभोग: उत्पादन क्षमता बढ़ने से वस्तुओं की कीमतें घटीं और कामगारों का वेतन बढ़ा। इससे लोगों की खरीदने की शक्ति (Purchasing Power) बढ़ी और कारों का उत्पादन 1919 के 20 लाख से बढ़कर 1929 में 50 लाख हो गया।

  • उपभोक्ता वस्तुओं की बाढ़: फ्रिज, वाशिंग मशीन, रेडियो और ग्रामोफोन जैसे घरेलू सामानों की माँग जबरदस्त बढ़ी। हायर-परचेज (किस्त प्रणाली) और आसान कर्जों ने इस माँग को और बढ़ावा दिया, जिससे घरों के निर्माण में भी तेजी आई।

  • वैश्विक प्रभाव: 1923 तक अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा पूँजी निर्यातक बन गया। अमेरिकी कर्जों और निवेश ने यूरोप की अर्थव्यवस्था को भी सहारा दिया, जिससे अगले छह वर्षों तक पूरी दुनिया के व्यापार में वृद्धि हुई।

विश्वव्यापी मंदी

  1. कृषि में अति-उत्पादन (Overproduction): 1920 के दशक में कृषि उत्पादों की भारी सप्लाई के कारण कीमतें गिरने लगीं। किसानों ने अपनी आय बनाए रखने के लिए उत्पादन और बढ़ा दिया, जिससे बाजार में अनाज की बाढ़ आ गई और कीमतें और भी नीचे गिर गईं। खरीदारों के अभाव में अनाज गोदामों में सड़ने लगा।

  2. अमेरिकी कर्ज में गिरावट: यूरोपीय देश कर्ज के लिए अमेरिका पर निर्भर थे, लेकिन संकट की आहट मिलते ही अमेरिकी साहूकारों ने हाथ खींच लिए। 1928 में जो कर्ज 100 करोड़ डॉलर था, वह एक साल में घटकर मात्र 24 करोड़ डॉलर रह गया।

  3. वैश्विक वित्तीय संकट: अमेरिका द्वारा कर्ज बंद करने से यूरोप के कई बैंक डूब गए और मुद्राएँ (जैसे ब्रिटिश पाउंड) कमजोर हो गईं। लैटिन अमेरिका के कृषि बाजार भी ध्वस्त हो गए। अमेरिका ने अपने उद्योगों को बचाने के लिए आयात शुल्क (Import Duty) दोगुना कर दिया, जिससे विश्व व्यापार और भी सिकुड़ गया।

  4. अमेरिका पर सबसे बुरा असर: कीमतें गिरने से अमेरिकी बैंकों ने कर्ज की वसूली तेज कर दी। आमदनी घटने के कारण लोग कर्ज नहीं चुका पाए, जिससे बेरोजगारी चरम पर पहुँच गई। लोग अपने घर, कार और अन्य संपत्तियाँ गंवाने लगे।

  5. बैंकों और कंपनियों का पतन: 1933 तक अमेरिका में 4,000 से अधिक बैंक दिवालिया होकर बंद हो गए। 1929 से 1932 के बीच लगभग 1,10,000 कंपनियाँ ठप हो गईं।

  6. रिकवरी और भारत: दुनिया भर में सुधार की प्रक्रिया 1935 के बाद ही शुरू हो सकी। इस मंदी ने भारत की अर्थव्यवस्था, विशेषकर यहाँ के निर्यात और किसानों को भी बुरी तरह प्रभावित किया

आर्थिक मंदी और भारत

  1. 1928 से 1934 के बीच भारत का आयात और निर्यात घटकर आधा हो गया।
  2. इसी दौरान भारत में गेहूँ की कीमतों में 50% की कमी आई।
  3. कृषि उत्पादों की घटती कीमतों के बावजूद सरकार किसानों से पहले दर पर ही लगान वसूलना चाहती थी।
  4. इस तरह से इस स्थिति में किसानों की हालत सबसे ज्यादा खराब थी।
  5. कई किसानों को अपनी जमापूँजी निकालनी पड़ी और जमीन और जेवर भी बेचने पड़े।
  6. इस तरह से भारत महँगी धातुओं का निर्यातक बन गया।
  7. भारत के शहरी क्षेत्रों में आर्थिक मंदी का उतना असर नहीं पड़ा।
  8. कीमतें घटने के कारण शहर में रहने वाले लोगों का जीवन पहले से आसान हो गया था।
  9. भारत के राष्ट्रवादी नेताओं के दवाब के कारण उद्योगों को अधिक संरक्षण मिलने लगा जिससे उद्योग में अधिक निवेश हुआ।

युद्ध के बाद के समझौते

विनाश का स्वरूप:-

दूसरा विश्व युद्ध पहले के युद्धों से कहीं अधिक भयावह था। इसमें सैनिकों से ज्यादा आम नागरिक मारे गए और दुनिया के कई ऐतिहासिक व महत्वपूर्ण शहर मलबे में तब्दील हो गए।

दो महाशक्तियों का उदय:-

युद्ध के बाद की वैश्विक स्थिति दो बड़े बदलावों से प्रभावित हुई:

  1. अमेरिका: पश्चिम में एक सर्वशक्तिमान आर्थिक, राजनीतिक और सैन्य शक्ति के रूप में उभरा।

  2. सोवियत संघ (USSR): एक पिछड़ी कृषि अर्थव्यवस्था से निकलकर एक वैश्विक शक्ति के रूप में सामने आया।

बैटन वुड्स सम्मेलन:-

युद्ध के बाद अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए विश्व के नेताओं ने बैठक की, जिसमें दो मुख्य लक्ष्यों पर सहमति बनी:

  1. आर्थिक स्थिरता: औद्योगिक देशों में आर्थिक संतुलन बनाए रखना ताकि लोगों को पूर्ण रोजगार मिल सके।

  2. सरकारी नियंत्रण: पूँजी, माल और श्रम के प्रवाह पर बाहरी प्रभावों को नियंत्रित करने के लिए सरकारों की भूमिका सुनिश्चित करना।

ब्रेटन वुड्स इंस्टिच्यूशन

  1. ब्रेटन वुड्स सम्मेलन: जुलाई 1944 में अमेरिका के न्यू हैंपशायर में एक सम्मेलन हुआ, जहाँ वैश्विक आर्थिक स्थिरता के लिए दो महत्वपूर्ण संस्थाओं की नींव रखी गई।

  2. IMF और वर्ल्ड बैंक की स्थापना: * अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF): इसका काम सदस्य देशों के व्यापार में होने वाले लाभ-हानि (नफे-नुकसान) की देखभाल करना था।

    • वर्ल्ड बैंक: इसे युद्ध से तबाह हुई अर्थव्यवस्थाओं के पुनरुद्धार और विकास के लिए बनाया गया था।

  3. पश्चिमी शक्तियों का दबदबा: इन संस्थाओं ने 1947 में काम शुरू किया। इनके फैसलों पर अमेरिका और पश्चिमी देशों का नियंत्रण था। अमेरिका के पास किसी भी बड़े फैसले को रोकने के लिए वीटो (Veto) अधिकार था।

  4. विनिमय दर (Exchange Rate): ब्रेटन वुड्स सिस्टम एक निश्चित विनिमय दर पर आधारित था। इसमें अमेरिकी डॉलर को सोने से जोड़ा गया था (1 औंस सोना = 35 डॉलर), और अन्य देशों की मुद्राओं की कीमत डॉलर के आधार पर तय की गई थी।

ब्रेटन वुड्स का अंत और भूमंडलीकरण

  • ब्रेटन वुड्स का पतन: 1960 के दशक तक विदेशों में अत्यधिक खर्च के कारण अमेरिका की आर्थिक शक्ति कमजोर होने लगी। डॉलर अब सोने के मुकाबले अपनी कीमत बरकरार नहीं रख सका। इसके परिणामस्वरूप निर्धारित विनिमय दर (Fixed Exchange Rate) खत्म हो गई और अस्थिर विनिमय दर (Floating Exchange Rate) की शुरुआत हुई।

  • विकासशील देशों पर प्रभाव: 1970 के दशक के बाद अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था बदल गई। अब विकासशील देशों को सरकारी संस्थानों के बजाय पश्चिम के निजी बैंकों से कर्ज लेने पर मजबूर होना पड़ा। इससे अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के कई देशों में कर्ज का संकट और बेरोजगारी बढ़ गई।

  • चीन का उदय और नई नीतियां: 1949 की क्रांति के बाद अलग-थलग रहने वाला चीन नई आर्थिक नीतियों के साथ विश्व अर्थव्यवस्था में वापस लौटा। सोवियत संघ के पतन के बाद पूर्वी यूरोप के कई देश भी वैश्विक बाजार का हिस्सा बने।

  • बहुराष्ट्रीय कंपनियों (MNCs) का विस्तार: भारत, चीन, ब्राजील और मलेशिया जैसे देशों में मजदूरी (Wages) बहुत कम थी। लागत घटाने के लिए बड़ी कंपनियों ने अपने उत्पादन केंद्र इन देशों में शिफ्ट कर दिए।

  • भारत और आउटसोर्सिंग: कम लागत और कुशल कामगारों के कारण भारत BPO (बिजनेस प्रोसेस आउटसोर्सिंग) का वैश्विक केंद्र बन गया। पिछले दो दशकों में भारत, चीन और ब्राजील जैसे देशों ने अपनी आर्थिक नीतियों के कारण दुनिया में सबसे तेज विकास दर हासिल की है।

युद्ध के बाद के शुरुआती साल

  1. ब्रेटन वुड्स सिस्टम ने पश्चिम के औद्योगिक देशों और जापान में एक अप्रत्याशित आर्थिक विकास के युग की शुरुआत कर दी।
  2. 1950 से 1970 के बीच विश्व का व्यापार 4% की दर से बढ़ा और आमदनी लगभग 5% की दर से बढ़ी।
  3. ज्यादातर औद्योगिक देशों में बेरोजगारी 5% से भी कम थी।
  4. इससे पता चलता है कि इस अवधि में कितनी आर्थिक स्थिरता आई थी।

उपनिवेशों का अंत और आजादी

  1. आजादी और आर्थिक संकट: दूसरे विश्व युद्ध के दो दशकों के भीतर कई देश उपनिवेशवाद से आजाद हुए, लेकिन लंबे समय तक हुए शोषण के कारण वे भारी गरीबी और संसाधनों की कमी से जूझ रहे थे।

  2. ब्रेटन वुड्स का प्रारंभिक रुख: शुरुआत में आईएमएफ (IMF) और वर्ल्ड बैंक का ध्यान केवल विकसित देशों (यूरोप और जापान) के पुनर्निर्माण पर था। जब ये देश आत्मनिर्भर हो गए, तब 1950 के दशक के अंत में इन संस्थाओं ने विकासशील देशों की ओर रुख किया।

  3. नव-उपनिवेशवाद का डर: चूँकि इन वित्तीय संस्थाओं पर पुरानी औपनिवेशिक शक्तियों (जैसे ब्रिटेन, फ्रांस, अमेरिका) का नियंत्रण था, इसलिए नए आजाद हुए देशों को डर था कि उनकी अर्थव्यवस्थाएं फिर से विदेशी नियंत्रण में आ सकती हैं।

  4. G-77 का गठन: अपनी आवाज बुलंद करने और एक नई अंतरराष्ट्रीय आर्थिक प्रणाली (NIEO) की माँग के लिए विकासशील देशों ने एकजुट होकर G-77 नामक समूह बनाया।

  5. प्रमुख माँगें: G-77 देशों की मुख्य माँगें थीं:

  • अपने प्राकृतिक संसाधनों पर अपना पूर्ण नियंत्रण।
  • अपने कच्चे माल के लिए उचित और बेहतर कीमतें
  • विकसित देशों के बाजारों में अपने उत्पादों के लिए बेहतर पहुँच

ncert Class 10 Social Science Chapter 3 Notes in Hindi

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कक्षा 10 सामाजिक विज्ञान अध्याय 3 के नोट्स हिंदी में, भूमंडलीकृत विश्व का बनना notes
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