भारत में राष्ट्रवाद notes
Class 10 Social Science Chapter 2 Notes in Hindi
यहाँ हम कक्षा 10 सामाजिक विज्ञान के 2nd अध्याय “भारत में राष्ट्रवाद” के नोट्स उपलब्ध करा रहे हैं। इस अध्याय में “भारत में राष्ट्रवाद” से जुड़ी प्रमुख विशेषताओं का अध्ययन किया गया है।
ये नोट्स उन छात्रों के लिए उपयोगी सिद्ध होंगे जो इस वर्ष बोर्ड परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं। सरल और व्यवस्थित भाषा में तैयार की गई यह सामग्री अध्याय को तेजी से दोहराने और मुख्य बिंदुओं को याद रखने में मदद करेगी।
भारत में राष्ट्रवाद notes, Class 10 Social Science Chapter 2 Notes in Hindi

कक्षा 10 सामाजिक विज्ञान अध्याय 2 के नोट्स हिंदी में
प्रथम विश्व युद्ध(1914 - 1918)
- भारत प्रत्यक्ष रूप से प्रथम विश्व युद्ध में शामिल नहीं था
- लेकिन उस युद्ध में इंगलैंड के शामिल होने के कारण भारत पर भी असर पड़ा था।
- युद्ध के कारण इंगलैंड के रक्षा संबंधी खर्चे में बढ़ोतरी हुई थी।
- उस खर्चे को पूरा करने के लिये कर्ज लिये गये और टैक्स बढ़ाए गये।
- अंग्रेजी सरकार ने कस्टम ड्युटी और इनकम टैक्स को बढ़ाया ताकि अतिरिक्त राजस्व संग्रह किया जा सके।
- युद्ध के दौरान चीजों (चीजें महंगी हो गई।
- 1913 से 1918 के बीच अधिकतर चीजों के दाम दोगुने हो गये।
- इससे आम आदमी की मुश्किलें बढ़ गईं।
- लोगों को जबरन सेना में भर्ती किया गया।
- इससे ग्रामीण इलाकों में काफी आक्रोश था।
- भारत के कई भागों में उपज खराबे होने के कारण भोजन की कमी हो गई।
- इंफ्लूएंजा की महामारी ने समस्या को और गंभीर कर दिया।
- 1921 की जनगणना के अनुसार, अकाल और महामारी के कारण लाखों लोग मारे गए।
सत्याग्रह
- महात्मा गांधी ने जनांदोलन का एक नायाब तरीका अपनाया जिसका नाम था सत्याग्रह।
- सत्याग्रह का सिद्धांत कहता था कि यदि कोई सही मकसद के लिये लड़ाई लड़ रहा हो तो उसे अपने ऊपर अत्याचार करने वाले से लड़ने के लिये ताकत की जरूरत नहीं होती है।
- गांधीजी का मानना था कि एक सत्याग्रही अपनी लड़ाई अहिंसा के द्वारा ही जीत सकता है।
गाँधीजी द्वारा आयोजित सत्याग्रह आंदोलन
- 1917 में चंपारण में किसान आंदोलन।
- 1918 में खेड़ा का किसान आंदोलन।
- 1918 में अहमदाबाद के मिल मजदूरों का आंदोलन।
1917 में चंपारण में किसान आंदोलन
- 20वीं शताब्दी के शुरुआती चरणों में चंपारण के किसानों का भी आन्दोलन हुआ जिसकी गूंज पूरे भारत में हुई|
- इस आन्दोलन का महत्त्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि यहीं से महात्मा गाँधी जी भारतीय राजनीति में सक्रिय रूप से प्रवेश होता है|
- सत्याग्रह की शुरुआत चंपारण से ही हुई।
- उत्तर बिहार में नेपाल से सटे हुए चंपारण जिले में नील की खेती की प्रथा थी।
- बागान मालिकों ने “तीन कठिया प्रणाली” लागू कर रखी थी।
- तीन कठिया प्रणाली के अनुसार हर किसान को अपनी खेती के लायक जमीन के 15% भाग में नील की खेती करनी पड़ती थी।
- दरअसल नील (indigo) नकदी फसल (cash crop) माना जाता था।
1918 में अहमदाबाद के मिल मजदूरों का आंदोलन
- चंपारण की सफलता के बाद गांधी जी का अगला प्रयोग
- 1918 में अहमदाबाद की एक कॉटन टेक्सटाइल (प्लेग) मिल में किया गया था।
- यहां पर गांधीजी ने मिल मालिक और मजदूरों के बीच मजदूरी बढ़ाने के सिलसिले में चल रहे विवाद में हस्तक्षेप किया था।
- अहमदाबाद टेक्सटाइल मील में प्लेग बोनस को लेकर विवाद था।
- 1918 में यहां के मिल मालिकों ने मजदूरों को दिया जा रहा प्लेग बोनस बंद करने का निर्णय लिया था।
- श्रमिको ने प्लेग बोनस समाप्त करने के एवज में उनकी मजदूरी में 50% वृद्धि करने की मांग की थी।
- मिल मालिक 20% वृद्धि करने के लिए तैयार हुए थे जोकि मजदूरों के हितों की दृष्टि से सही नहीं थी कई मजदूरो ने इसका विरोध किया।
- इस कारण मजदूरों ने महात्मा गांधी से सहायता और मार्गदर्शन का आग्रह किया था।
- फरवरी-मार्च 1918 में गांधीजी ने (मिल मालिको और मजदूरों के बीच मध्यस्ता करना प्रारंभ किया।
गांधीजी ने मजदूरों को हड़ताल पर जाने को कहां और घोषणा की थी उन्हें 35% बोनस मिलना चाहिए
लेकिन परिस्थितियां सही होने की जगह शीघ्र ही विकट रूप धारण करने लग गई थी
- महात्मा गांधी जी द्वारा प्रथम बार भूख हड़ताल के हथियार को संघर्ष के रुप में इस्तेमाल किया गया।
- अहमदाबाद में गांधी जी द्वारा की गई भूख हड़ताल भारत के स्वतंत्रता संग्राम की प्रथम ऐतिहासिक भूख इन सब परिस्थितियों को देखते हुए मिल मालिकों ने यह मामला न्यायाधिकरण को सोपने के लिए कहा
- इस प्रकार गांधीजी के भूख हड़ताल के प्रथम प्रयोग और न्यायाधिकरण के आदेश पर अहमदाबाद के मिल मजदूरों को 35% बोनस देने को कहा गया।
1918 में खेड़ा का किसान आंदोलन
- किसानों ने भी गाँधीजी का भरपूर साथ दिया।
- किसानों ने अंग्रेजों के सरकार को लगान देना बंद कर दिया।
- जो किसान लगान देने लायक थे उन्होंने भी लगान देना बंद कर दिया।
- सरकार ने सख्ती से पेश आने और कुर्की की धमकियाँ दी पर उससे भी किसान नहीं डरे।
- इस आन्दोलन में बड़ी संख्या में किसानों ने भाग लिया अनेक किसानों को जेल में डाले दिया गया।
- जून 1918 ई. तक खेड़ा का यह किसान आन्दोलन एक व्यापक रूप ले चुका था
- किसान के इस गुस्से और निडर भाव को देखते हुए सरकार को उनके सामने झुकना पड़ा।
- सरकार ने किसानों को लगान में छूट देने का वादा किया।
- इसी आन्दोलन के दौरान सरदार वल्लभभाई गाँधीजी के संपर्क में आये और कालान्तर में पटेल गाँधीजी के पक्के अनुयायी बन गए।
रॉलैट ऐक्ट
- रॉलैट ऐक्ट को इंपीरियल लेगिस्लेटिव काउंसिल ने 1919 में पारित किया था।
- भारतीय सदस्यों के विरोध के बावजूद यह ऐक्ट पारित हो गया था।
- इस ऐक्ट ने सरकार को राजनैतिक गतिविधियों को कुचलने के लिये असीम शक्ति दे दी थी।
- इस ऐक्ट के मुताबिक बिना ट्रायल के ही राजनैतिक कैदियों को दो साल तक के लिये बंदी बनाया जा सकता था।
- रॉलैट ऐक्ट के विरोध में गांधीजी ने 6 अप्रैल 1919 को आंदोलन की शुरुआत की।
- गांधीजी ने हड़ताल का आह्वान किया जिसे भारी समर्थन मिला।
- विभिन्न शहरों में लोग इसके समर्थन में निकल पड़े।
- दुकानें बंद हो गई और रेल कारखानों के मजदूर हड़ताल पर चले गये।
- अंग्रेजी हुकूमत ने इस आंदोलन के खिलाफ कठोर कदम उठाने का निर्णय लिया।
- कई स्थानीय नेताओं को बंदी बना लिया गया।
- महात्मा गांधी को दिल्ली में आने से रोका गया।
जलियांवाला बाग
- 10 अप्रैल 1919 को अमृतसर में शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर पुलिस ने गोली चलाई।
- इससे गुस्साए लोगों ने जगह-जगह पर सरकारी संस्थानों पर आक्रमण किया।
- अमृतसर में मार्शल लॉ लागू कर दिया गया।
- अमृतसर की कमान जनरल डायर के हाथों में सौंप दी गई।
- ग्रामीणों का एक समूह जलियांवाला बाग में लगे एक मेले में शरीक होने आया था।
- 13 अप्रैल को पंजाब में बैसाखी का त्योहार मनाया जा रहा था।
- वह बाग चारों तरफ से बंद था और निकलने के रास्ते संकीर्ण थे।
- जनरल डायर ने निकलने के रास्ते बंद करवा दिये।
- भीड़ पर गोली चलाने का आदेश दिया।
- उस गोलीकांड में सैकड़ों लोग मारे गए।
खिलाफत आंदोलन
खिलाफत का मुद्दाः-
- अंग्रेजों के खिलाफ तुर्की का गठबंधन
- भारत सहित विश्व भर के मुसलमान तुर्की के सुल्तान को अपना आध्यात्मिक नेता खलीफा (खलीफा) मानते थे।
- प्रथम विश्व युद्ध के दौरान तुर्की ने अंग्रेजों के खिलाफ जर्मनी और ऑस्ट्रिया के साथ गठबंधन किया था।
असंतुष्ट भारतीय मुसलमान :-
- भारतीय मुसलमानों ने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान इस विश्वास के साथ ब्रिटिश सरकार का समर्थन किया कि तुर्क साम्राज्य (Ottoman Empire) के पवित्र स्थान खलीफा को दे दिये जाएगे।
- हालांकि प्रथम विश्व युद्ध के बाद तुर्क साम्राज्य विभाजित हो गया और तुर्की को अलग कर दिया गया तथा खलीफा को सत्ता से हटा दिया गया था।
- इससे मुस्लिम नाराज हो गए तथा इसे खलीफा का अपमान माना।
- अली भाइयों, शौकत अली और मोहम्मद अली ने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ खिलाफत आंदोलन को शुरू कर दिया।
- वर्ष 1919 से 1924 के मध्य यह आंदोलन हुआ।
- खिलाफत समिति वर्ष 1919 की शुरुआत में अली बंदुओं, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद अजमल खान और हसरत मोहानी के नेतृत्व में अखिल भारतीय खिलाफत समिति का गठन किया गया था ताकि ब्रिटिश सरकार को तुर्की के प्रति अपना रवैया बदलने हेतु मजबूर किया जा सके।
- 1920 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में खिलाफत आंदोलन के समर्थन करने प्रस्ताव पारित हुआ।
- खिलाफत के मुद्दे ने गांधीजी एक ऐसा अवसर दिया जिससे हिंदू और मुसलमानों को एक मंच पर लाया जा सकता था।
असहयोग आंदोलन
- रॉलैट सत्याग्रह मुख्य रूप से शहरों तक ही सीमित था।
- महात्मा गांधी को महसूस हुआ कि भारत में आंदोलन का विस्तार होना चाहिए।
- उनको लगता था कि ऐसा तभी संभव था जब हिंदू और मुसलमान एक मंच पर आ जाएँ।
- महात्मा गांधी ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक हिंद स्वराज (1909) में लिखा
- भारत में अंग्रेजी राज इसलिए स्थापित हो पाया क्योंकि भारत के लोगों ने उनके साथ सहयोग किया।
- भारतीय लोगों के सहयोग के कारण अंग्रेज यहाँ पर हुकूमत करते रहे।
- यदि भारत के लोग सहयोग करना बंद कर दें, तो अंग्रेजी राज एक साल के अंदर चरमरा जायेगा और स्वराज आ जायेगा।
- गांधीजी को पूरा विश्वास था कि यदि भारतीय लोग अंग्रेजों से सहयोग करना बंद कर देंगे तो अंग्रेजों के पास भारत को छोड़कर जाने के सिवा और कोई रास्ता नहीं बचेगा।
असहयोग आंदोलन के कुछ प्रस्ताव :-
- अंग्रेजी सरकार द्वारा प्रदान की गई उपाधियों को वापस करना।
- सिविल सर्विस, सेना पुलिस, कोर्ट, लेजिस्लेटिव काउंसिल और स्कूलों को बहिष्कार।
- विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार।
- यदि सरकार अपनी दमनकारी नीतियों से बाज न आये, तो संपूर्ण अवज्ञा आंदोलन शुरु करना।
- असहयोग आंदोलन की शुरुआत 1920 में हुई थी।
- इस आंदोलन में समाज के विभिन्न वर्गों ने शिरकत की थी और
- हर वर्ग की अपनी-अपनी महत्वाकांक्षाएँ थीं।
- सबने स्वराज के आह्वान का सम्मान किया था, लेकिन विभिन्न लोगों के लिए इसके विभिन्न अर्थ थे।
शहरों में आंदोलन :-
- शहरों में मध्य-वर्ग की सक्रिय भागीदारी रही; छात्रों ने स्कूल-कॉलेज छोड़े, शिक्षकों ने इस्तीफे दिए और वकीलों ने वकालत छोड़ दी।
- मद्रास की जस्टिस पार्टी (गैर-ब्राह्मण) को छोड़कर अधिकांश प्रांतों में काउंसिल चुनावों का बहिष्कार किया गया।
- विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार, शराब की दुकानों की पिकेटिंग और विदेशी कपड़ों की होली जलाई गई।
- 1921 से 1922 के बीच विदेशी कपड़ों का आयात 102 करोड़ से घटकर 57 करोड़ रह गया।
- विदेशी कपड़ों के बहिष्कार से भारतीय कपड़ा मिलों और हथकरघा (handlooms) के उत्पादन और मांग में भारी वृद्धि हुई।
आंदोलन में सुस्ती आने के कारण :-
- मिलों के कपड़े की तुलना में खादी बहुत महंगी थी, जिसे गरीब लोग खरीदने में असमर्थ थे।
- अंग्रेजी संस्थानों के बहिष्कार के बाद भारतीय शिक्षण संस्थानों का अभाव था, और नए संस्थान बहुत धीरे-धीरे बन रहे थे।
- वैकल्पिक व्यवस्था न होने के कारण छात्र और शिक्षक दोबारा सरकारी स्कूलों में लौटने लगे।
- इसी प्रकार, वकील भी धीरे-धीरे अदालतों में अपने काम पर वापस जाने लगे।
- शहरों के बाद असहयोग आंदोलन गाँवों की ओर फैला, जहाँ किसानों और आदिवासियों ने भी इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।
असहयोग आंदोलन के बाद :-
1921 के अंत तक आंदोलन हिंसक होने लगा था, जिसके कारण फरवरी 1922 में गांधीजी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया।
कांग्रेस के कुछ नेता लंबे जनांदोलन से थक चुके थे और गवर्नमेंट ऑफ इंडिया ऐक्ट 1919 के तहत काउंसिल चुनावों में हिस्सा लेना चाहते थे।
सी.आर. दास और मोतीलाल नेहरू ने परिषद की राजनीति के माध्यम से विरोध करने के लिए कांग्रेस के भीतर ‘स्वराज पार्टी’ का गठन किया।
इसके विपरीत, जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस जैसे युवा नेता अधिक उग्र जनांदोलन और पूर्ण स्वराज के पक्ष में थे।
इसी दौरान भारत पर विश्वव्यापी आर्थिक मंदी (Great Depression) का असर पड़ने लगा; 1926 से कृषि उत्पादों की कीमतें गिरने लगीं और 1930 तक पूरी तरह धराशायी हो गईं।
लगान चुकाना नामुमकिन होने के कारण ग्रामीण इलाकों में भारी उथल-पुथल और तबाही का माहौल बन गया।
असहयोग आन्दोलन के परिणाम :-
पूरे देश में समान विचारधारा और राष्ट्रीयता की भावना का संचार हुआ।
विभिन्न संप्रदायों और प्रांतों के लोग एकजुट होकर कांग्रेस के झंडे के नीचे आ गए।
आंदोलन के दौरान अभूतपूर्व हिंदू-मुस्लिम एकता स्थापित हुई।
गांधीजी ने सभी वर्गों को एक दिशा में चलने वाले एक ‘पचरंगी दल’ के रूप में संगठित कर दिया।
इस आंदोलन ने ब्रिटिश शासन के बुनियादी ढांचे को झकझोर कर रख दिया।
अंग्रेजों को अहसास हुआ कि वे उदारवादियों के सहयोग के बिना लंबे समय तक शासन नहीं कर पाएंगे।
स्वदेशी के प्रति लगाव बढ़ा, जिससे कुटीर उद्योगों को भारी प्रोत्साहन मिला।
अंग्रेजी का महत्व कम हुआ और कांग्रेस ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार किया।
साइमन कमीशन
अंग्रेजी सरकार ने सर जॉन साइमन की अध्यक्षता में एक वैधानिक कमीशन गठित किया।
इस कमीशन का उद्देश्य भारत की संवैधानिक प्रणाली की समीक्षा करना और बदलावों का सुझाव देना था।
कमीशन के सभी सदस्य अंग्रेज थे और एक भी भारतीय सदस्य न होने के कारण भारतीय नेताओं ने इसका कड़ा विरोध किया।
1928 में जब साइमन कमीशन भारत पहुँचा, तो उसका स्वागत ‘साइमन वापस जाओ’ (Simon Go Back) के नारों के साथ हुआ।
विरोध प्रदर्शनों में कांग्रेस और मुस्लिम लीग सहित सभी राजनीतिक दल शामिल हुए।
अक्टूबर 1929 में लॉर्ड इरविन ने भारत के लिए ‘डॉमिनियन स्टेटस’ का अस्पष्ट प्रस्ताव दिया और ‘गोलमेज सम्मेलन’ का न्योता दिया।
कांग्रेस के भीतर सुभाष चंद्र बोस और जवाहरलाल नेहरू जैसे उग्र नेता इस प्रस्ताव से संतुष्ट नहीं थे, जबकि नरम दल का प्रभाव कम हो रहा था।
अंततः गांधीजी ने स्वाधीनता के अमूर्त विचार को लोगों के दैनिक जीवन के ठोस मुद्दों से जोड़ने की रणनीति बनाई।
लाहौर अधिवेशन
- दिसंबर 1929 में जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में कांग्रेस का लाहौर अधिवेशन हुआ था।
- इसमें पूर्ण स्वराज के संकल्प को पारित किया गया।
- 26 जनवरी 1930 को स्वाधीनता दिवस घोषित किया गया
- और लोगों से आह्वान किया गया कि वे संपूर्ण स्वाधीनता के लिए संघर्ष करें।
दांडी मार्च
गांधीजी का मानना था कि नमक एक ऐसा शक्तिशाली साझा मुद्दा है जो पूरे देश को एकजुट कर सकता है, हालांकि अंग्रेजों और कुछ अन्य लोगों ने इस सोच को गलत माना।
गांधीजी ने वायसराय इरविन को एक पत्र लिखकर अन्य मांगों के साथ नमक कर (Salt Tax) को समाप्त करने की मांग रखी।
दांडी मार्च: 12 मार्च 1930 को गांधीजी ने अपने 78 विश्वसनीय अनुयायियों के साथ साबरमती आश्रम से दांडी तक की 240 मील की यात्रा शुरू की।
24 दिनों की पदयात्रा के बाद, 6 अप्रैल 1930 को गांधीजी ने दांडी में मुट्ठी भर नमक उठाकर प्रतीकात्मक रूप से कानून तोड़ा।
सविनय अवज्ञा आंदोलन: दांडी मार्च से इस आंदोलन की शुरुआत हुई और देश भर में हजारों लोगों ने नमक कानून तोड़ा।
आंदोलन के प्रभाव स्वरूप विदेशी कपड़ों का बहिष्कार हुआ, शराब की दुकानों की पिकेटिंग की गई और किसानों ने लगान देने से मना कर दिया।
लोगों ने सरकारी नमक कारखानों के सामने शांतिपूर्ण प्रदर्शन किए, जिससे ब्रिटिश शासन की नींव हिल गई।
अंग्रेजी शासन की प्रतिक्रिया :-
अंग्रेजी सरकार ने कांग्रेस नेताओं को गिरफ्तार करना शुरू कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप कई स्थानों पर हिंसक झड़पें हुईं।
आंदोलन के लगभग एक महीने बाद गांधीजी को भी हिरासत में ले लिया गया।
आक्रोशित जनता ने पुलिस थानों, नगर पालिकाओं और अदालतों जैसे ब्रिटिश शासन के प्रतीकों पर हमले किए।
सरकार ने बेहद क्रूरतापूर्ण दमन चक्र चलाया, जिसमें शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के साथ-साथ महिलाओं और बच्चों को भी पीटा गया।
इस दमन के दौरान लगभग एक लाख लोगों को जेलों में डाल दिया गया।
गोल मेज सम्मेलन
जब आंदोलन हिंसक होने लगा, तो गांधीजी ने इसे समाप्त करने का निर्णय लिया।
5 मार्च 1931 को गांधीजी और वायसराय के बीच गांधी-इरविन पैक्ट पर हस्ताक्षर हुए।
इस समझौते के तहत गांधीजी द्वितीय गोलमेज सम्मेलन (लंदन) में शामिल होने के लिए सहमत हुए और बदले में सरकार राजनीतिक कैदियों को रिहा करने पर राजी हुई।
दिसंबर 1931 में गांधीजी लंदन गए, लेकिन वार्ता विफल रही और उन्हें खाली हाथ लौटना पड़ा।
भारत लौटने पर उन्होंने देखा कि सरकार ने दमन चक्र बढ़ा दिया था, कांग्रेस को गैरकानूनी घोषित कर दिया था और बड़े नेता जेल में थे।
गांधीजी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन दोबारा शुरू किया, लेकिन 1934 तक यह अपनी गति खो चुका था और धीमा पड़ गया।
किसान
किसानों के लिए स्वराज का अर्थ अत्यधिक लगान के विरुद्ध संघर्ष था।
1931 में लगान की दरों में बिना किसी सुधार के आंदोलन वापस लेने से किसान अत्यंत निराश हुए।
1932 में जब आंदोलन दोबारा शुरू हुआ, तो बहुत से किसानों ने इसमें हिस्सा लेने से इनकार कर दिया।
गरीब किसान चाहते थे कि उनका बकाया लगान पूरी तरह माफ कर दिया जाए।
कांग्रेस द्वारा धनी जमींदारों को नाराज न करने की नीति के कारण, गरीब किसान समाजवादियों और कम्युनिस्टों के उग्र आंदोलनों की ओर झुकने लगे।
इस कारण कांग्रेस और गरीब किसानों के संबंधों में अनिश्चितता और खटास बनी रही।
औद्योगिक मजदूर
- ांग्रेस के सविनय अवज्ञा आंदोलन के प्रति औद्योगिक मजदूरों का रवैया ठंडा ही रहा।
- चूंकि उद्योगपति कांग्रेस के नजदीकी थे
- इसलिए मजदूरों ने इस आंदोलन से दूरी बनाए रखी।
- लेकिन कुछ मजदूर आंदोलन में शामिल हुए थे।
- कांग्रेस भी उद्योगपतियों को दरकिनार नहीं करना चाहती थी
- इसलिए इसने मजदूरों की मांगों को अनसुना कर दिया।
महिलाओं की भागीदारी
- सविनय अवज्ञा आंदोलन में महिलाओं ने भी बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया।
- लेकिन उनमें से अधिकांश शहरों में रह रही ऊँची जाति से थीं और ग्रामीण इलाकों के धनी घरों से थीं।
- लेकिन काफी लंबे समय तक कांग्रेस अपने संगठन में महिलाओं को जिम्मेदारी के पद देने से कतराती रही।
- कांग्रेस केवल महिलाओं की प्रतीकात्मक भागीदारी से ही संतुष्ट रहना चाहती थी।
दलितों की भागीदारी
शुरुआत में कांग्रेस ने रूढ़िवादी सवर्ण हिंदुओं को नाराज न करने के लिए दलितों (अछूतों) के मुद्दों पर ध्यान नहीं दिया।
गांधीजी ने घोषणा की कि छुआछूत को समाप्त किए बिना स्वराज प्राप्त नहीं किया जा सकता; उन्होंने दलितों को ‘हरिजन’ नाम दिया।
कई दलित नेता अपनी समस्याओं का राजनीतिक समाधान चाहते थे, इसलिए उन्होंने शिक्षण संस्थानों में आरक्षण और पृथक निर्वाचन क्षेत्र (Separate Electorates) की मांग की।
डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने 1930 में ‘दमित वर्ग एसोसिएशन’ (Depressed Classes Association) का गठन किया।
दूसरे गोलमेज सम्मेलन में पृथक निर्वाचन के मुद्दे पर गांधीजी और अंबेडकर के बीच विवाद हुआ; अंग्रेजों द्वारा यह मांग मानने पर गांधीजी आमरण अनशन पर बैठ गए।
अंततः सितंबर 1932 में पूना पैक्ट (Poona Pact) हुआ, जिसके तहत दलितों को प्रांतीय और केंद्रीय विधायी परिषदों में आरक्षित सीटें दी गईं, लेकिन मतदान सामान्य निर्वाचन क्षेत्रों के माध्यम से ही होना तय हुआ।
मुसलमानों की भागीदारी
असहयोग-खिलाफत आंदोलन के धीमा पड़ने के बाद मुसलमानों का एक बड़ा वर्ग कांग्रेस से अलग-थलग महसूस करने लगा।
1920 के दशक के मध्य में कांग्रेस की छवि हिंदू राष्ट्रवादी समूहों (जैसे हिंदू महासभा) के करीब होने लगी, जिससे दूरियां बढ़ीं।
कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच गठबंधन के प्रयास हुए, जिसमें मुहम्मद अली जिन्ना ने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
जिन्ना पृथक निर्वाचन क्षेत्र (Separate Electorates) की मांग छोड़ने को तैयार थे, बशर्ते मुसलमानों को केंद्रीय असेंबली में आरक्षित सीटें और पंजाब व बंगाल जैसे मुस्लिम बहुल प्रांतों में जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व मिले।
1928 के सर्वदलीय सम्मेलन में हिंदू महासभा के एम.आर. जयकर द्वारा इस समझौते का कड़ा विरोध करने के कारण एकता की उम्मीदें खत्म हो गईं।
इस विरोध के परिणामस्वरूप कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच अविश्वास बढ़ा, जिसका असर सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान मुस्लिम भागीदारी पर पड़ा।
राष्ट्रवाद की भावना
राष्ट्रवाद की भावना तब पनपती है जब लोग स्वयं को एक ही राष्ट्र का अभिन्न अंग मानने लगते हैं और साझा एकता के सूत्र में बंध जाते हैं।
स्वाधीनता संग्राम के साझा संघर्ष ने लोगों के बीच एकता की भावना को सुदृढ़ किया।
सांस्कृतिक प्रक्रियाएँ: राष्ट्रवाद को यथार्थ रूप देने में लोककथाओं, गीतों और प्रतीकों जैसी सांस्कृतिक प्रक्रियाओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
भारत माता की छवि: राष्ट्र की पहचान को मूर्त रूप देने के लिए भारत माता के चित्र बनाए गए, जिससे लोगों में मातृभूमि के प्रति जुड़ाव पैदा हुआ।
वंदे मातरम: बंकिम चंद्र चटर्जी ने 1870 में ‘वंदे मातरम’ गीत लिखा, जिसे बंगाल के स्वदेशी आंदोलन के दौरान व्यापक रूप से गाया गया।
कलात्मक अभिव्यक्ति: विभिन्न कलाकारों (जैसे अबनींद्रनाथ टैगोर) ने भारत माता को अपने-अपने तरीके से चित्रित किया, जो श्रद्धा और राष्ट्रवाद का प्रतीक बनीं।
लोककथाएँ
- कई राष्ट्रवादी नेताओं ने राष्ट्रवाद की भावना का प्रसार करने के लिए लोककथाओं का सहारा लिया।
- उनका ऐसा मानना था कि लोककथाएँ ही पारंपरिक संस्कृति को सही ढंग से दिखाती हैं।
राष्ट्रीय ध्वज
- जो राष्ट्र ध्वज हम आज देखते हैं उसका विकास कई चरणों में हुआ है।
- स्वदेशी आंदोलन के दौरान एक तिरंगे (लाल, हरा और पीला) का प्रयोग हुआ था।
- इस झंडे में उस समय के आठ राज्यों के प्रतीक के रूप में आठ कमले के फूल बने हुए थे।
- इस पर एक दूज का चाँद भी था जो हिंदू और मुसलमानों का प्रतीक था।
- गाँधीजी ने 1921 तक स्वराज ध्वज का डिजाइन तैयार किया था।
- यह भी एक तिरंगा ही था (लाल, हरा और सफेद) जिसके बीच में एक चरखा था।
इतिहास की पुनर्व्याख्या
- कई भारतीयों का मानना था कि अंग्रेजों ने भारत के इतिहास को तोड़ मरोड़कर पेश किया था।
- उन्हें लगता था कि हमारे इतिहास को भारतीय दृष्टिकोण से जानने की जरूरत है।
- वे भारत के सुनहरे अतीत को उजागर करना चाहते थे ताकि भारतीय लोगों को इसपर गर्व महसूस हो सके।
क्रिप्स प्रस्ताव
- क्रिप्स 22 मार्च, 1942 को भारत आया।
- उसने पर्याप्त काल तक भारत के विभिन्न राजनीतिक दलों तथा सम्प्रदायों के नेताओं से वार्ता की तथा अपनी योजना प्रस्तुत की,
- परन्तु उसकी योजना को सभी राजनीतिक दलों द्वारा अस्वीकृत कर दिया गया।
- कांग्रेस मुख्यतया क्रिप्स योजना से इस कारण असन्तुष्ट थी, क्योंकि इसमें उसकी पूर्ण स्वाधीनता की माँग को स्वीकार नहीं किया गया था।
- सम्पूर्ण प्रशासनिक शक्ति देशी नरेशों को प्रदान करके राज्यों की प्रजा के हितों की अवहेलना की गयी थी।
- कांग्रेस चाहती थी कि युद्धकाल में ही भारत में संसदीय शासन प्रणाली की स्थापना हो,
- परन्तु युद्धकाल में ब्रिटेन तनिक भी शक्ति का परित्याग नहीं करना चाहता था।
भारत छोड़ो आन्दोलन
ऐतिहासिक शुरुआत: 1942 में ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ शुरू हुआ, जो एक वास्तविक जन-आंदोलन था और राष्ट्र की स्वाधीनता के लिए स्व-प्रेरणा से उपजा था।
प्रस्ताव और नारा: 8 अगस्त, 1942 को अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने ‘भारत छोड़ो’ प्रस्ताव पारित किया। इसी अवसर पर गांधीजी ने ‘करो या मरो’ का ऐतिहासिक संदेश दिया।
नेताओं की गिरफ्तारी: प्रस्ताव पारित होने के अगले ही दिन गांधीजी और अन्य प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया, जिससे जनता में भारी आक्रोश फैल गया।
आंदोलन का स्वरूप: नेतृत्व के अभाव में आंदोलन ने हिंसक रूप ले लिया; सरकारी प्रतीकों पर हमले हुए और कई स्थानों पर आंदोलनकारियों ने अपनी स्वतंत्र सरकारें स्थापित कर लीं।
दमन और प्रभाव: ब्रिटिश सरकार ने अत्यंत कठोरता से दमन चक्र चलाया और 1945 तक आंदोलन को दबा दिया।
दूरगामी परिणाम: हालांकि सरकार ने आंदोलन को कुचल दिया था, लेकिन इस व्यापक जनजागृति ने ऐसा माहौल बनाया कि अंग्रेजों को जल्द ही भारत छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा।
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