यूरोप में राष्ट्रवाद का उदय notes
Class 10 Social Science Chapter 1 Notes in Hindi
यहाँ हम कक्षा 10 सामाजिक विज्ञान के 1st अध्याय “यूरोप में राष्ट्रवाद का उदय” के नोट्स उपलब्ध करा रहे हैं। इस अध्याय में “यूरोप में राष्ट्रवाद का उदय” से जुड़ी प्रमुख विशेषताओं का अध्ययन किया गया है।
ये नोट्स उन छात्रों के लिए उपयोगी सिद्ध होंगे जो इस वर्ष बोर्ड परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं। सरल और व्यवस्थित भाषा में तैयार की गई यह सामग्री अध्याय को तेजी से दोहराने और मुख्य बिंदुओं को याद रखने में मदद करेगी।
यूरोप में राष्ट्रवाद का उदय notes, Class 10 Social Science Chapter 1 Notes in Hindi

कक्षा 10 सामाजिक विज्ञान अध्याय 1 के नोट्स हिंदी में
राष्ट्रवाद
- जो विचारधारा किसी भी राष्ट्र के सदस्यों में एक साझा पहचान को बढ़ावा देती है उसे राष्ट्रवाद कहते हैं।
- राष्ट्रवाद की भावनाओं की जड़े जमाने के लिये कई प्रतीकों का सहारा लिया जाता है; जैसे राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रीय प्रतीक, राष्ट्रगान, आदि।
यूरोप में राष्ट्रवाद का उदय
- उन्नीसवीं सदी के मध्य तक यूरोपीय देशों का रूप वैसा नहीं था जैसा कि आज है।
- विभिन्न क्षेत्रों पर अलग-अलग वंश के लोग राज करते थे।
- इन इलाकों में राजतंत्र का शासन हुआ करता था।
फ्रांसीसी क्रांति
- राष्ट्रवाद की पहली अभिव्यक्ति फ्रांस में हुई।
- फ्रांसीसी क्रांति ने वहां की राजनीति और संविधान में कई बदलाव किये।
- सन 1789 में सत्ता का स्थानांतरण राजतंत्र से प्रजातांत्रिक संस्था को हुआ।
- इस नई संस्था का गठन नागरिकों द्वारा हुआ था।
राष्ट्र की भावना की रचना
- क्रांतिकारियों ने लोगों में राष्ट्रवाद की भावना स्थापित करने के लिए कई कदम उठाए। उनमें से कुछ निम्नलिखित हैं:
- राजसी प्रतीक को हटाकर एक नए फ्रांसीसी झंडे का इस्तेमाल किया गया।
- राष्ट्र के नाम पर नए स्तुति गीत बनाए गए।
यूरोप के अन्य भागों पर प्रभाव
- फ्रांस में होने वाली गतिविधियों ने यूरोप के कई शहरों के लोगों को प्रभावित किया।
- इन शहरों में शिक्षित मध्यवर्ग के लोगों और छात्रों द्वारा जैकोबिन क्लब बनाए जाने लगे।
- इन क्लबों की गतिविधियों ने फ्रांस की सेना द्वारा घुसपैठ का रास्ता साफ कर दिया।
- 1790 के दशक में फ्रांस की सेना ने हॉलैंड, बेल्जियम, स्विट्जरलैंड और इटली के एक बड़े भूभाग में घुसपैठ कर ली थी।
- इस तरह फ्रांसीसी सेना ने अन्य देशों में राष्ट्रवाद का प्रचार करने का काम शुरु किया।
नेपोलियन
- नेपोलियन 1804 से 1815 के बीच फ्रांस का राजा था।
- नेपोलियन ने फ्रांस में प्रजातंत्र को तहस नहस कर दिया और वहाँ फिर से राजतंत्र की स्थापना हो गई।
- नेपोलियन ने प्रशासन के क्षेत्र में कई क्रांतिकारी बदलाव किए और प्रशासन व्यवस्था को बेहतर और कुशल बनाया।
नेपोलियन के कार्य
- नेपोलियन ने 1804 में सिविल कोड लागू किया।
- इसे नेपोलियन कोड भी कहा जाता है।
- इस कोड ने जन्म के आधार पर मिलने वाली हर सुविधा को समाप्त कर दिया।
- हर नागरिक को समान हैसियत (सामाजिक स्थिति) प्रदान की गई और संपत्ति के अधिकार को पुख्ता (मजबूत) किया गया।
- नेपोलियन ने फ्रांस की तरह अपने नियंत्रण वाले हर इलाके में प्रशासनिक सुधार किये।
- उसने सामंती व्यवस्था को खत्म किया।
- किसानों को लगने वाले शुल्क (एक प्रकार का टैक्स) को हटाया गया।
- उसने शहरों में प्रचलित शिल्प मंडलियों द्वारा लगाई गई पाबंदियों को भी समाप्त किया।
जनता की प्रतिक्रिया
- आम आदमी को यह समझ में आ गया था कि एक समान कानून और एक मुद्रा से व्यवसाय में कितना लाभ होगा।
- इसलिये किसानों, कारीगरों और मजदूरों ने इस नई आजादी का खुलकर स्वागत किया।
- लेकिन फ्रांस ने जिन इलाकों पर कब्जा जमाया था, वहाँ के लोगों की फ्रांसीसी शासन के बारे में मिली जुली प्रतिक्रिया थी।
- शुरुआत में लोगों ने फ्रांस की सेना को आजादी के दूत के रूप में देखा। लेकिन जल्दी ही यह भावना बदल गई।
- टैक्स में भारी बढ़ोतरी हुई।
- लोगों को जबरदस्ती फ्रांस की सेना में भर्ती कराया गया।
- इस सबके फलस्वरूप लोगों का शुरुआती जोश जल्दी ही विरोध में बदलने लगा।
अभिजात वर्ग
- यूरोपीय महाद्वीप में जमीन से संपन्न कुलीन वर्ग हमेशा से ही सामाजिक और राजनैतिक तौर पर प्रभावशाली हुआ करता था।
- कुलीन वर्ग के लोगों की जीवन शैली एक जैसी होती थी जिसका इस बात से कोई लेना देना नहीं था कि वे किस क्षेत्र में रहते थे।
- शायद इसी जीवन शैली के कारण वे एक सूत्र में बंधे रहते थे।
- उनकी जागीरें ग्रामीण इलाकों में होती थीं और उनके आलीशान बंगले शहरी इलाकों में होते थे।
- आपस में संबंध बनाये रखने के लिये उनके परिवारों के बीच शादियाँ भी होती थीं।
- वे फ्रेंच भाषा बोलते थे ताकि अपनी एक खास पहचान बनाए रखें।
- सत्ता से संपन्न यह वर्ग संख्या में छोटा था।
- जनसंख्या का अधिकांश हिस्सा किसानों से बना हुआ था।
- पश्चिमी यूरोप में ज्यादातर जमीन पर छोटे किसान खेती करते थे।
- पूर्वी और केंद्रीय यूरोप में बड़ी-बड़ी जागीरें हुआ करती थीं जहाँ दासों से काम लिया जाता था।
मध्यम वर्ग का उदय
- पश्चिमी और केंद्रीय यूरोप के कुछ भागों में उद्योग धंधे में वृद्धि होने लगी थी।
- इससे शहरों का विकास हुआ और उन शहरों में एक नये व्यावसायिक वर्ग का उदय हुआ।
- यह नया वर्ग बाजार के लिये उत्पादन करना चाहता था।
- इस परिघटना ने समाज में नये समूहों और वर्गों को जन्म दिया।
- इस नये सामाजिक वर्ग में एक वर्ग मजदूरों का था और दूसरा मध्यम वर्ग का।
- उस मध्यम वर्ग के मुख्य हिस्सा थे उद्योगपति, व्यापारी और व्यवसायी।
- इसी मध्यम वर्ग ने राष्ट्रीय एकता की भावना को एक रूप प्रदान किया।
उदार राष्ट्रवाद की भावना
- उन्नीसवीं सदी के शुरु के दौर में यूरोप में राष्ट्रवाद की भावना और उदारवाद की भावना में गहरा तालमेल था।
- नये मध्यम वर्ग के लिये उदारवाद के रूप में व्यक्ति की स्वतंत्रता और समानता की भावनाएँ थीं।
- यदि हम राजनैतिक दृष्टिकोण से देखें तो उदारवाद की भावना ने ही आम सहमति से शासन के सिद्धांत को बल दिया होगा।
- उदारवाद के कारण ही तानाशाही और विशेषाधिकारों का अंत हुआ।
- इससे एक संविधान की आवश्यकता महसूस होने लगी।
- इससे प्रतिनिधित्व पर आधारित सरकार की आवश्यकता भी महसूस होने लगी।
मताधिकार
- फ्रांस के लोगों को मताधिकार के लिये लंबा संघर्ष करना पड़ा था। हर नागरिक को मताधिकार नहीं मिला था।
- क्रांति के पिछले दौर में केवल उन पुरुषों को मताधिकार मिला था जिनके पास संपत्ति होती थी।
- जैकोबिन क्लबों के दौर में थोड़े समय के लिये हर वयस्क पुरुष को मताधिकार मिला था।
- लेकिन नेपोलियन कोड ने फिर से पुरानी व्यवस्था बहाल कर दी थी।
- नेपोलियन के शासन काल में महिलाओं को नाबालिग जैसा दर्जा दिया गया।
- इसलिये महिलाएँ अपने पिता या पति के नियंत्रण में होती थीं।
- पूरी उन्नीसवीं सदी और बीसवीं सदी के शुरु तक महिलाओं और संपत्तिविहीन पुरुषों को मताधिकार के लिये संघर्ष करना पड़ा।
आर्थिक क्षेत्र में उदारीकरण
- नेपोलियन कोड की एक और खास बात थी आर्थिक उदारीकरण।
- मध्यम वर्ग; जिसका उदय अभी अभी हुआ था; आर्थिक उदारीकरण के पक्ष में था।
- आर्थिक उदारीकरण की जरूरत को समझने के लिये ऐसे क्षेत्र का उदाहरण लेते हैं जहाँ जर्मन भाषा बोलने वाले लोग रहते थे।
- उन्नीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में इस क्षेत्र में 39 प्रांत थे जो कई छोट-छोटी इकाइयों में बँटे हुए थे।
- हर इकाई की अपनी अलग मुद्रा थी और मापन की अपनी अलग प्रणाली थी।
- यदि कोई व्यापारी हैम्बर्ग से न्यूरेमबर्ग जाता था तो उसे ग्यारह चुंगी नाकों से गुजरना होता था।
- हर नाके पर लगभग 5% चुंगी देनी होती थी।
- चुंगी का भुगतान भार और नाप के अनुसार होता था।
- अलग-अलग स्थानों के भार और मापन में अत्यधिक अंतर होने के कारण इसमें बड़ी उलझन होती थी।
- इस तरह से व्यवसाय के लिये बिलकुल प्रतिकूल माहौल थे जिनसे आर्थिक गतिविधियों में विघ्न (रूकावट) उत्पन्न होते थे।
- 1834 में प्रसिया की पहल पर जालवेरिन के कस्टम यूनियन का गठन हुआ।
- बाद में अधिकांश जर्मन राज्य भी इस यूनियन में शामिल हो गये।
- चुंगी की सीमाएँ समाप्त की गई और मुद्राओं के प्रकार को तीस से घटाकर दो कर दिया गया।
- इसी बीच रेल नेटवर्क के विकास ने आवागमन को और सरल बना दिया।
1815 के बाद एक नए रुढ़िवाद का जन्म
- सन 1815 में ब्रिटेन, रूस, प्रसिया और ऑस्ट्रिया की सम्मिलित ताकतों ने नेपोलियन को पराजित कर दिया।
- नेपोलियन की पराजय के बाद, यूरोप की सरकारें रुढ़िवाद की ओर वापस लौटना चाहती थीं।
- रुढ़िवादियों को लगता था कि समाज और देश की परंपरागत संस्थाओं का संरक्षण जरूरी था।
- वे राजतंत्र, चर्च, सामाजिक दाँचे, संपत्ति और परिवार के पुराने ढाँचे को बचाकर रखना चाहते थे।
- लेकिन उनमें से ज्यादातर लोग इस बात को भी मानते थे कि प्रशासन के क्षेत्र में उन बदलावों को जारी रखना चाहिए जो नेपोलियन ने किये थे।
- उन्हें लगता था कि उस प्रकार के आधुनिकीकरण से परंपरागत संस्थाएँ और मजबूत होंगी।
- उन्हें यह भी लगता था कि एक आधुनिक सेना, एक कुशल प्रशासन, एक गतिशील अर्थव्यवस्था और दासता की समाप्ति से यूरोप के राजतंत्र को और मजबूती मिलेगी।
वियेना संधि
- सन 1815 में ब्रिटेन, रूस, प्रसिया और ऑस्ट्रिया (जो यूरोपियन शक्ति के प्रतिनिधि थे) ने यूरोप की नई रूपरेखा तय करने के लिए वियेना में एक मीटिंग की।
- ऑस्ट्रिया के चांसलर ड्यूक मेटर्निक पर इस कांग्रेस की मेहमाननवाजी का भार था।
- इस मीटिंग में वियेना संधि का खाका तैयार किया गया।
- इस संधि का मुख्य लक्ष्य था नेपोलियन के काल में यूरोप में आए हुए अधिकाँश बदलावों को बदल देना।
वियना संधि में कुछ उठाए गए कदम
- इस संधि के अनुसार कई कदम उठाए गए जिनमे से कुछ निम्नलिखित हैं:
- फ्रांसीसी क्रांति के दौरान बोर्बोन वंश को सत्ता से हटा दिया गया था। उसे फिर से सत्ता दे दी गई।
- फ्रांस की सीमा पर कई राज्य बनाए गए ताकि भविष्य में फ्रांस अपना साम्राज्य बढ़ाने की कोशिश न करे।
- उदाहरण के लिए: उत्तर में नीदरलैंड का राज्य स्थापित किया गया।
- इसी तरह दक्षिण में पिडमॉट से जेनोआ को जोड़ा गया।
- प्रसिया को उसकी पश्चिमी सीमा के पास कई महत्वपूर्ण इलाके दिए गए।
- ऑस्ट्रिया को उत्तरी इटली का कब्जा दिया गया।
- पूर्व दिशा में रूस को पोलैंड के कुछ भाग दिए गए, जबकि प्रसिया को सैक्सोनी का एक भाग दिया गया।
- 1815 में जो रुढ़िवादी शासन व्यवस्थाएँ आई वे सब तानाशाही प्रवृत्ति की थी।
- वे किसी प्रकार की आलोचना या विरोध को बर्दाश्त नहीं करते थे।
- उनमें से अधिकाँश ने अखबारों, किताबों, नाटकों और गानों में व्यक्त होने वाले विषय वस्तु पर कड़ा सेंसर कानून लगा दिया।
एक क्रांतिकारी : जियुसेपे मेत्सीनी
- 1815 की घटनाओं के बाद सजा के डर से कई उदार राष्ट्रवादी जमींदोज हो गए थे।
- जियुसेपे मेत्सीनी एक इटालियन क्रांतिकारी था।
- उसका जन्म 1807 में हुआ था।
- वह कार्बोनारी के सीक्रेट सोसाइटी का एक सदस्य बन गया।
- 1831 में जब वह महज 24 साल का था, तभी लिगुरिया में क्रांति फैलाने की कोशिश में उसे देशनिकाला दे दिया गया था।
उन्होंने दो संगठन बनाए:-
सीक्रेट सोसाइटी:
- मार्सेय में :– यंग इटली
- बर्ने में :- यंग यूरोप
- मेत्सीनी का मानना था कि भगवान ने राष्ट्र को मानवता की नैसर्गिक (एकजातीय) इकाई बनाया है।
- इसलिए इटली को छोटे छोटे राज्यों के बेमेल संगठन से बदलकर एक लोकतंत्र बनाने की जरूरत थी।
- मेत्सीनी का अनुसरण करते हुए लोगों ने जर्मनी, फ्रांस, स्विट्जरलैंड और पोलैंड में ऐसी कई सीक्रेट सोसाइटी बनाई।
- रुढ़िवादियों को मेत्सिनी से डर लगता था।
- इस बीच जब रुढ़िवादी ताकतें अपनी शक्ति को और मजबूत करने में जुटी थीं,
- उदारवादी और राष्ट्रवादी लोग क्रांति की भावना को अधिक से अधिक फैलाने की कोशिश कर रहे थे।
- इन लोगों में ज्यादातर मध्यम वर्ग के अभिजात लोग थे; जैसे कि प्रोफेसर, स्कूल टीचर, क्लर्क और व्यवसायी।
ग्रीस की आजादी
- ग्रीस की आजादी का संघर्ष 1821 में शुरु हुआ था।
- ग्रीस के राष्ट्रवादियों को ग्रीस के ऐसे लोगों से भारी समर्थन मिला जिन्हे देश निकाला दे दिया गया था।
- इसके अलावा उन्हें पश्चिमी यूरोप के अधिकांश लोगों से भी समर्थन मिला जो प्राचीन ग्रीक संस्कृति का सम्मान करते थे।
- मुस्लिम साम्राज्य के विरोध करने वाले इस संघर्ष का समर्थन बढ़ाने के लिए कवियों और कलाकारों ने भी जन भावना को इसके पक्ष में लाने की भरपूर कोशिश की।
- आखिरकार 1832 में कॉन्स्टैंटिनोपल की ट्रीटी के अनुसार ग्रीस को एक स्वतंत्र देश की मान्यता दे दी गई।
- ग्रीस की आजादी की लड़ाई ने पूरे यूरोप के पढ़े लिखे वर्ग में राष्ट्रवाद की भावना को और मजबूत कर दिया।
1830 का विद्रोह (फ्रांस)
- वियना की कांग्रेस के बाद, फ्रांस में एक संवैधानिक राजतंत्र था। शाही लोगों ने सोचा कि राजा के पास बहुत कम शक्ति है
- उदारवादियों और कट्टरपंथियों ने सोचा कि राजा के पास बहुत अधिक शक्ति है।
- किंग चार्ल्स एक्स पूर्ण राजतंत्र में विश्वास करता था।
- उन्होंने संविधान को खारिज कर दिया और अधिक शक्तिशाली बनने की कोशिश की।
- प्रेस को प्रतिबंधित कर दिया।
- चार्ल्स की कार्रवाइयों ने सड़कों पर क्रांति ला दी, वह इंग्लैंड भाग गया।
- 1830 की फ्रांसीसी क्रांति, जिसे जुलाई क्रांति के नाम से भी जाना जाता है।
- इसने फ्रांसीसी बोर्बोन सम्राट किंग चार्ल्स एक्स को उखाड़ फेंका।
- संवैधानिक राजतंत्र में लुई फिलिप को मुखिया बनाया गया।
- जुलाई की उस क्रांति के बाद ब्रसेल्स में भी आक्रोश बढ़ने लगा।
- जिसके फलस्वरूप नीदरलैंड के यूनाइटेड किंगडम से बेल्जियम अलग हो गया।
"जब फ्रांस छिंकता है तो यूरोप को सर्दी जुखाम हो जाता है" : ड्यूक मेटरनिख
- इस पंक्ति का अर्थ है कि 19वीं शताब्दी में फ्रांस की राजनीतिक और सामाजिक घटनाएं पूरे यूरोप को प्रभावित करती थीं।
- अगर फ्रांस में कोई छोटी सी भी हलचल (क्रांति या विद्रोह) होती थी, तो उसका असर जंगल की आग की तरह पूरे यूरोपीय महाद्वीप में फैल जाता था।
फ्रांस का प्रभाव:-
उस समय फ्रांस यूरोप का राजनीतिक केंद्र था। 1789 की फ्रांसीसी क्रांति ने साबित कर दिया था कि फ्रांस के विचार सीमाओं को पार कर सकते हैं।
क्रांति की लहर:-
मेटरनिख ने यह विशेष रूप से 1830 की जुलाई क्रांति के संदर्भ में कहा था। जब पेरिस में विद्रोह हुआ, तो उसकी चिंगारी से बेल्जियम, पोलैंड और इटली जैसे देशों में भी विद्रोह भड़क उठे थे।
मेटरनिख की सोच:-
मेटरनिख एक रूढ़िवादी नेता था। वह क्रांति और लोकतंत्र के विचारों से डरता था, इसलिए वह फ्रांस को यूरोप की स्थिरता के लिए एक ‘खतरे’ के रूप में देखता था।
1848 का विद्रोह (फ्रांस)
- लुई फिलिप के नेतृत्व में फ्रांस में संवैधानिक राजतंत्र की स्थापना हुई।
- उनके शासनकाल में मध्यम वर्ग समृद्ध हुआ लेकिन अधिकांश फ्रांसीसी अभी भी मतदान नहीं कर सके।
- लुई फिलिप की सरकार भ्रष्ट थी।
- मंदी के कारण बेरोजगारी और रोटी की कीमतों में वृद्धि हुई।
- फ्रांसीसी लोगों ने सड़कों पर दंगे किए। अब व्यवस्था बहाल हो गई और सरकार (फिर से) बदल गई।
- फ्रांस एक संविधान के साथ गणतंत्र बना और लोगों को मतदान का अधिकार मिला।
- लुई नेपोलियन (नेपोलियन बोनापार्ट का भतीजा) फ्रांस का राष्ट्रपति बना।
विद्रोह के बाद बदलाव
- 21 साल से ऊपर की उम्र के सभी वयस्क पुरुषों को मताधिकार दे दिया गया।
- लोगों को काम के अधिकार की घोषणा भी की गई।
- रोजगार मुहैया कराने के लिए राष्ट्रीय कार्यशाला बनाई गई।
उदारवादियों की क्रांति
- जब गरीबों का विद्रोह 1848 में हो रहा था, तभी एक अन्य क्रांति भी शुरु हो चुकी थी
- जिसका नेतृत्व पढ़ा लिखा मध्यम वर्ग कर रहा था।
- यूरोप के कुछ भागों में स्वाधीन राष्ट्र जैसी कोई चीज नहीं थी।
- जैसे कि जर्मनी, इटली, पोलैंड और ऑस्ट्रो-हंगैरियन साम्राज्य में।
- इन क्षेत्रों के मध्यम वर्ग के स्त्री और पुरुषों ने राष्ट्रीय एकीकरण और संविधान की मांग शुरु कर दी।
- उनकी मांग थी कि संसदीय प्रणाली पर आधारित राष्ट्र का निर्माण हो।
- वे एक संविधान, प्रेस की आजादी और गुटबंदी की आजादी चाहते थे।
जर्मनी का एकीकरण
- 1848 के बाद यूरोप में राष्ट्रवाद प्रजातंत्र और क्रांति से दूर हो चुका था।
- रुढ़िवादी ताकतें राष्ट्रवाद की भावना को इसलिए हवा देने लगे थे
- ताकि शासक की शक्ति बढ़ाई जा सके और यूरोप में राजनैतिक प्रभुता हासिल की जा सके।
- पहले आपने देखा कि किस तरह से राजा और सेना की मिली जुली ताकतों ने जर्मनी में मध्यम वर्ग के आंदोलन को कुचल दिया था।
- प्रसिया के बड़े भूस्वामी (जिन्हें जंकर कहा जाता था) भी उन दमनकारी नीतियों का समर्थन करते थे।
- उसके बाद प्रसिया ने राष्ट्रीय एकीकरण के आंदोलन की कमान संभाल ली।
- ओटो वॉन बिस्मार्कः ये प्रसिया के प्रधानमंत्री थे
- जिन्होंने जर्मनी के एकीकरण की बुनियाद रखी थी।
- इस काम में बिस्मार्क ने प्रसिया की सेना और प्रशासन तंत्र का सहारा लिया था।
- सात सालों में तीन युद्ध हुए; ऑस्ट्रिया, डेनमार्क और फ्रांस के खिलाफ।
- प्रसिया की जीत के साथ युद्ध समाप्त हुए और इस तरह से जर्मनी के एकीकरण का काम पूरा हुआ।
- प्रसिया के राजा विलियम प्रथम को जर्मनी का बादशाह घोषित किया गया।
- इसके लिए वार्सा में 1871 की जनवरी में एक समारोह का आयोजन हुआ था।
- नए राष्ट्र ने जर्मनी में मुद्रा, बैंकिंग, और न्याय व्यवस्था के आधुनिकीकरण पर खास ध्यान दिया।
- अधिकतर मामलों में प्रसिया के कायदे कानून ही जर्मनी के लिए आदर्श का काम करते थे।
इटली का एकीकरण
- इटली का भी राजनैतिक अलगाव और विघटन का एक लंबा इतिहास रहा है।
- इटली में एक तरफ तो बहुराष्ट्रीय हैब्सबर्ग साम्राज्य का शासन था तो दूसरी ओर कुछ हिस्सों में कई छोटे-छोटे राज्य थे।
- उन्नीसवीं सदी के मध्य में इटली सात प्रांतों में बँटा हुआ था।
- उनमें से एक; सार्डिनिया-पिडॉट पर किसी इटालियन राजपरिवार का शासन था।
- उत्तरी भाग ऑस्ट्रिया के हैब्सबर्ग साम्राज्य के नियंत्रण में था, मध्य भाग पोप के शासन में
- दक्षिणी भाग स्पेन के बोर्बोन राजाओं के नियंत्रण में था।
- 1830 के दशक में जिउसेपे मेत्सीनी ने एक समग्र इटालियन गणराज्य की स्थापना के लिए एक योजना बनाई।
- लेकिन 1831 और 1848 के विद्रोहों की विफलता के बाद अब इसकी जिम्मेदारी सार्डिनिया पिडमॉट और इसके शासक विक्टर इमैन्युएल द्वितीय पर आ गई थी।
- इटली के विभिन्न क्षेत्रों को एक करने के आंदोलन की अगुवाई मुख्यमंत्री काउंट कावुर ने की थी।
- वह ना तो कोई क्रांतिकारी था ना ही कोई प्रजातांत्रिक व्यक्ति।
- वह तो इटली के उन धनी और पढ़े लिखे लोगों में से था जिनकी संख्या काफी थी। उसे भी इटालियन से ज्यादा फ्रेंच भाषा पर महारत थी।
- उसने फ्रांस से एक कूटनीतिक गठबंधन किया और इसलिए 1859 में ऑस्ट्रिया की सेना को हराने में कामयाब हो गया।
- उस लड़ाई में सेना के जवानों के अलावा, कई सशस्त्र स्वयंसेवकों ने भी भाग लिया था जिनकी अगुवाई जिउसेपे गैरीबाल्डी कर रहा था।
- 1860 के मार्च महीने में वे दक्षिण इटली और टू सिसली के राज्य की ओर बढ़ चले।
- उन्होंने स्थानीय किसानों का समर्थन जीत लिया और फिर स्पैनिश शासकों को उखाड़ फेंकने में कामयाब हो गए।
- 1861 में विक्टर इमैंयुएल (द्वितीय) को एक समग्र इटली का राजा घोषित किया गया।
बाल्कन में संकट
- बाल्कन ऐसा क्षेत्र था जहाँ भौगोलिक और नस्ली विविधता भरपूर थी।
- आज के रोमानिया, बुल्गेरिया, अल्बेनिया, ग्रीस, मैकेडोनिया, क्रोशिया, बोस्निया-हर्जेगोविना, स्लोवेनिया, सर्बिया और मॉन्टेनीग्रो इसी क्षेत्र में आते थे।
- इस क्षेत्र में रहने वाले लोगों को स्लाव कहा जाता था।
- बाल्कन का एक बड़ा हिस्सा ओटोमन साम्राज्य के नियंत्रण में था। यह वह दौर था
- जब ओटोमन साम्राज्य बिखर रहा था और बाल्कन में रोमांटिक राष्ट्रवादी भावना बढ़ रही थी।
- इसलिए यह क्षेत्र ऐसा था जैसे किसी बारूद की देर पर बैठा हो।
- पूरी उन्नीसवीं सदी में ओटोमन साम्राज्य ने आधुनिकीकरण और आंतरिक सुधारों से अपनी ताकत बढ़ाने की कोशिश की थी।
- लेकिन इसमे उसे अधिक सफलता नहीं मिली।
- इसके नियंत्रण में आने वाले यूरोपीय देश एक एक करके इससे अलग होते गए और अपनी आजादी घोषित करते गए।
- बाल्कन के देशों ने अपने इतिहास और राष्ट्रीय पहचान का हवाला देते हुए अलग होने की घोषणा की।
- लेकिन जब ये देश अपनी पहचान बनाने और आजादी पाने के लिए संघर्ष कर रहे थे तब यह क्षेत्र कई गंभीर झगड़ों का अखाड़ा बन चुका था।
- इस प्रक्रिया में बाल्कन के क्षेत्र में ताकत हथियाने के लिए भी जबरदस्त लड़ाई जारी थी।
- उसी दौरान विभिन्न यूरोपियन ताकतों के बीच उपनिवेशों और व्यापार को लेकर कशमकश चल रही थी; और वह झगड़ा नौसेना और सेना की ताकत बनाने लिए भी जारी था।
- रूस, जर्मनी, इंगलैंड, ऑस्ट्रो-हंगरी; हर शक्ति का लक्ष्य था कि किस तरह से बाल्कन पर नियंत्रण पाया जाए और फिर अन्य क्षेत्रों पर।
- इसके कारण कई लड़ाइयां हुई; जिसकी परिणति प्रथम विश्व युद्ध के रूप में हुई।
- इस बीच उन्नीसवीं सदी में यूरोपियन शक्तियों के उपनिवेश बने कई देश अब उपनिवेशी ताकतों का विरोध शुरु कर चुके थे।
- अलग-अलग उपनिवेशों के लोगों ने राष्ट्रवाद की अपनी नई परिभाषा बनाई।
- इस तरह से ‘राष्ट्र’ का आइडिया एक विश्वव्यापी आइडिया बन गया।
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