द्वितीयक क्रियाएँ Notes
Class 12 Geography Chapter 5 Notes in Hindi
यहाँ हम कक्षा 12 भूगोल के 5th अध्याय “द्वितीयक क्रियाएँ” के नोट्स उपलब्ध करा रहे हैं। इस अध्याय में द्वितीयक क्रियाएँ से जुड़ी प्रमुख विशेषताओं का अध्ययन किया गया है।
ये नोट्स उन छात्रों के लिए उपयोगी सिद्ध होंगे जो इस वर्ष बोर्ड परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं। सरल और व्यवस्थित भाषा में तैयार की गई यह सामग्री अध्याय को तेजी से दोहराने और मुख्य बिंदुओं को याद रखने में मदद करेगी।
द्वितीयक क्रियाएँ Notes, Class 12 Geography Chapter 5 Notes in Hindi

Class 12 Geography Chapter 5 Notes in Hindi
द्वितीयक क्रिया
प्राकृतिक रूप से प्राप्त कच्चे माल को जब मनुष्य अपना कौशल ज्ञान एवं श्रम लगाकर नये उपयोगी उत्पाद में बदल देता है तो इस द्वितीयक क्रिया कहा जाता है।
विनिर्माण :-
विनिर्माण से आशय किसी भी वस्तु के उत्पादन से है। हस्तशिल्प से लेकर लोहे व इस्पात को गढ़ना, अंतरिक्ष यान का निर्माण इत्यादि सभी प्रकार के उत्पादन को विनिर्माण के अन्तर्गत ही माना जाता है।
उद्योगो का वर्गीकरण :-
उद्योगो का वर्गीकरण मुख्यतः 4 आधारों पर किया जाता है।
1) आकार के आधार पर
- कुटीर उद्योग
- छोटे पैमाने के उद्योग
- बड़े पैमाने के उद्योग
2) कच्चे माल के आधार पर
- कृषि आधारित
- खनिज आधारित
- धात्विक खनिज उद्योग
- अधात्विक खनिज उद्योग
- रसायन आधारित
- पशु आधारित
- वन आधारित
3) उत्पाद के आधार पर
- आधारभूत उद्योग
- उपभोक्ता वस्तु उद्योग
4) सुवामित्व के आधार पर
- सार्वजानिक उद्योग
- निजी उद्योग
- संयुक्त क्षेत्र के उद्योग
कच्चे माल के आधार पर उद्योगों का वर्गीकरण:
कच्चे माल के आधार धार पर उद्योगों को मुख्य रूप से चार भागों में बांटा जाता है।
1.कृषि आधारित उद्योग :-
वह उद्योग जो कृषि द्वारा उत्पादित कच्चे माल पर निर्भर होते हैं कृषि आधारित उद्योग कहलाते हैं। उदाहरण के लिए शक्कर उद्योग, आचार उद्योग, मसाले एवं तेल उद्योग आदि इन उद्योगों में कृषि से प्राप्त कच्चे माल को तैयार माल में बदलकर ग्रामीण एवं नगरीय भागों में बेचने के लिए भेजा जाता है।
2.खनिज आधारित उद्योग :-
वे उद्योग जिनमें खनिजों का उपयोग कच्चे माल के रूप में किया जाता है खनिज आधारित उद्योग कहलाते हैं उदाहरण के लिए लोहा
खनिज आधारित उद्योग को मुख्य रूप से दो भागों में बांटा जाता है :-
धात्विक खनिज उद्योग:-
इसमें वे उद्योग आते हैं जो धात्विक खनिजों जैसे कि लोहा, एलुमिनियम, तांबा आदि का उपयोग करते हैं।
अधात्विक खनिज उद्योग :-
इसमें वे उद्योग आते हैं जो मुख्य रूप से अधात्विक खनिज जैसे कि सीमेंट आदि का उपयोग करते है
3.रसायन आधारित उद्योग :-
इस प्रकार के उद्योगों में प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले रासायनिक खनिजों का उपयोग होता है जैसे कि पेट्रो रसायन उद्योग, प्लास्टिक उद्योग आदि ।
4.पशु आधारित उद्योग :-
वह उद्योग जिन में पशुओं से प्राप्त वस्तुओं का उपयोग कच्चे माल के रूप में किया जाता है
उत्पाद के आधार पर उद्योगों को मुख्य रूप से दो भागों में बांटा जाता है
1.उपभोक्ता वस्तु उद्योग :-
उपभोक्ता वस्तु उद्योग ऐसे सामान का उत्पादन करते हैं जो प्रत्यक्ष रूप से उपभोक्ता द्वारा उपयोग कर लिया जाता है। जैसे ब्रेड़ एंव बिस्कुट, चाय, साबुन इत्यादि।
2.आधारभूत उद्योग :-
वह उद्योग जो दूसरे उद्योगों के लिए आवश्यकता की वस्तुएं बनाते हैं उन्हें आधारभूत उद्योग कहा जाता है उदाहरण के लिए मशीन बनाने वाले उद्योग, लोहा और इस्पात उद्योग ।
स्वामित्व के आधार पर उद्योगों का वर्गीकरण
सार्वजनिक क्षेत्र :-
- ऐसे उद्योग सरकार के अधीन होते हैं।
- सरकार ही इनका प्रबंध करती है।
- में बहुत से उद्योग सार्वजनिक क्षेत्र के बीच है जैसे लोह इस्पात उद्योग। भारत में
- अधिकतर समाजवादी, साम्यवादी देशों में ऐसा होता हैं।
निजी क्षेत्र :-
- ऐसे उद्योगों का मालिक एक व्यक्ति या एक कम्पनी होती है।
- व्यक्ति या निजी कंपनियां इन उद्योगों का प्रबंधन करती है।
- पूंजीवाद देशों में यह व्यवस्था होती है।
- भारत में टाटा समूह, विरला, रिलायंस इंडस्ट्री इसके उदाहरण है।
संयुक्त क्षेत्र
- कुछ उद्योगों का संचालन सरकार और निजी कंपनियाँ मिलकर करती है।
- हिन्दुस्तान पेट्रोलियम कोर्पोटेशन लिमिटेड (HPCL) तथा मित्तल एनर्जी लिमिटेड साझेदारी (HPCL Mittal energy limited (HMFL) इसका उदाहरण है।
उत्पादन की प्रतिक्रिया के आधार पर
परंपरागत
उच्च प्रोद्योगिकी उद्योग
आकार के आधार पर उद्योगों का वर्गीकरण
आकार के आधार पर उद्योगों को मुख्य रूप से तीन भागों में बांटा जाता है।
1.कुटीर उद्योग
- ऐसे छोटे-छोटे उद्योग जिनका संचालन बहुत छोटे स्तर पर किया जाता है कुटीर उद्योग कहलाते है।
- यह निर्माण की सबसे छोटी इकाई हैं।
- स्थानीय कच्चे माल का प्रयोग
- स्थानीय बाजारों तक पहुँच
- कम पूंजी और परिवहन की आवश्यकता
- रोजमर्रा के जीवन की छोटी छोटी वस्तुओं का उत्पादन
- उदाहरण मिट्टी के बर्तन , चटाई आदि ।
2.छोटे पैमाने के उद्योग
- कम पूंजी की आवश्यकता
- स्थानीय बाजार बाजार तक पहुँच
- स्थानीय कच्चे माल का उपयोग
- कम श्रमिकों की आवश्यकता
- प्रौद्योगिकी का कम प्रयोग
- निम्न शक्ति साधनों की आवश्यकता
- छोटी मशीनों द्वारा कार्य
- उदाहरण कुर्सी उद्योग, कपड़ा उद्योग आदि।
3.बड़े पैमाने के उद्योग
- अधिक पूंजी की आवश्यकता
- उत्पादित वस्तु बेचने के लिए विशाल बाजार की आवश्यकता
- कच्चे माल का विभिन्न जगहों से आयत
- अतयाधिक एवं कुशल श्रमिकों की आवश्यकता
- उच्च प्रौद्योगिकी का प्रयोग
- अत्याधिक शक्ति साधनों की आवश्यकता
- बड़ी-बड़ी मशीनों द्वारा कार्य
- उदाहरण लोहा इस्पात, उद्योग कार उद्योग
उद्योगों की अवस्थिति को प्रभावित करने वाले कारको :-
1. कच्चे माल की उपलब्धता:-
उद्योग के लिए कच्चा माल अपेक्षाकृत सस्ता एवं सरलता से परिवहन योग्य होना चाहिए। भारी वजन सस्ते मूल्य एवं वजन घटाने वाले पदार्थों व शीघ्र नष्ट होने वाले पदार्थों पर आधारित उद्योग कच्चे माल के स्त्रोत के समीप ही स्थित हो। जैसे लौह इस्पात उद्योग, चीनी उद्योग ।
2. अनुकूल जलवायु :
- कुछ उद्योग विशेष प्रकार की जलवायु वाले क्षेत्रों में ही स्थापित किये जाते हैं। उदाहरण के लिए दक्षिण भारत में सूती वस्त्र उद्योग विकसित होने में नमी वाले पर्यावरण का लाभ मिला है। नमी के कारण कपास से
- वस्त्र की कताई आसान हो जाती है। अत्याधिक ठंडे व अत्याधिक गर्म प्रदेशों में उद्योगों की स्थापना कठिन कार्य है।
3. शक्ति के साधन :-
वे उद्योग जिनमें अधिक शक्ति की आवश्यकता होती है वे ऊर्जा के स्रोतों के समीप लगाए जाते हैं, जैसे एल्यूमिनियम उद्योग।
4. श्रम की उपलब्धता :-
बढ़ते हुए यंत्रीकरण, स्वचालित मशीनों इत्यादि में उद्योगों में श्रमिकों पर निर्भरता को कम किया है, फिर भी कुछ प्रकार के उद्योगों में अब भी कुशल श्रमिकों की आवश्यकता है। अधिकांश उद्योग सस्ते व कुशल श्रमिकों की उपलब्धता वाले स्थानों पर अवस्थित होते हैं। स्विटजरलैंड का घड़ी उद्योग व जापान का इलैक्ट्रोनिक उद्योग कुशल और दक्ष श्रमिकों के बल पर ही टिके हैं।
5. पूँजी :-
किसी भी उद्योग के सफल विकास के लिए पर्याप्त पूँजी का उपलब्ध होना अनिवार्य है। कारखाने के लिए जमीन, मशीने, कच्चा माल, श्रमिकों को वेतन देने के लिए पर्याप्त पूँजी की आवश्यकता होती है। उदाहरण के लिए यूरोप में पर्याप्त मात्रा में पूँजी उपलब्ध होती है तथा वहाँ उद्योग भी काफी विकसित है।
6. बाजार तक पहुंच :-
- उत्पादन करने के बाद प्रत्येक उद्योग को अपना सामान बाजार में बेचना होता है इसीलिए किसी भी उद्योग की बाजार तक पहुँच होना अत्यंत आवश्यकता होता है।
- यहाँ पर बाजार से मतलब ग्राहकों तक पहुँच से हैं।
7. परिवहन की सुविधा :-
कच्चा माल लाने एवं उत्पादित वस्तु ले जाने के लिए परिवहन अत्यंत महत्वपूर्ण होता है इसलिए पर्याप्त परिवहन एवं संचार के साधनों का होना आवश्यक होता है। SP
बड़े उद्योगों की विशेषताएं :-
1) कौशल का विशिष्टीकरण:-
आधुनिक उद्योगों में उत्पादन बड़े पैमाने पर होने के कारण कौशल का विशिष्टीकरण हो जाता है जिसमें प्रत्येक कारीगर निरंतर एक ही प्रकार का कार्य करता है। कारीगर निर्दिष्ट कार्य के लिये प्रशिक्षित होते है।
2) यन्त्रीकरण :-
यन्त्रीकरण से तात्पर्य है कि किसी कार्य को पूरा करने के लिए मशीनों का प्रयोग करना। आधुनिक उद्योग स्वचालित यन्त्रीकरण की विकसित अवस्था है।
3.प्रौद्योगिकीय नवाचार :-
आधुनिक उद्योगों में नया तकनीकी ज्ञान, शोध व विकासमान युक्तियों को सम्मिलित किया गया है जिसमें विनिर्माण की गुणवत्ता को नियन्त्रित करना, अपशिष्टों का निस्तारण व अदक्षता को समाप्त करना व प्रदूषण के विरूद्ध संघर्ष करना मुख्य है।
4.संगठनात्मक ढांचा व स्तरीकण :-
इसके अतिरिक्त बड़े पैमाने पर होने वाले विनिर्माण में संगठनात्मक ढाँचा बड़ा, पूँजी का निवेश अधिक कर्मचारियों में प्रशासकीय अधिकारी वर्गों का बाहुल्य होता है।
5.अधिक पूंजी:-
बड़े उद्योगों में अधिक पूंजी का उपयोग किया जाता है यह उत्पादित वास्तु की गुणवत्ता को बढ़ाता है एवं उसमें लगने वाले समय को कम कर देता है।
समूहन अर्थव्यवस्था :-
प्रधान उद्योग की समीपता से अन्य अनेक का लाभांवित होना समूहून अर्थव्यवस्था है।
धुएँ की चिमनी वाला उद्योग :-
परंपरागत बड़े पैमाने वाले औद्योगिक प्रदेश जिसमें कोयला खादानों के समीप स्थित धातु पिघलाने वाले उद्योग भारी इंजीनियरिंग, रसायन निर्माण इत्यादि का कार्य किया जाता है। इन्हें धुए की चिमनी वाला उद्योग भी कहते हैं।
स्वच्छंद उद्योग :-
ये वे उद्योग है जो किसी कच्चे माल पर निर्भर नहीं होते वरन संघटक पुरजों पर निर्भर रहते हैं।
स्वच्छंद उद्योग की विशेषताएँ :-
- स्वच्छंद उद्योग व्यापक विविधता वाले स्थानों में स्थित होते हैं।
- ये किसी विशिष्ट प्रकार के कच्चे माल पर निर्भर नहीं होते हैं।
- ये उद्योग संघटन पुरजो पर निर्भर होते हैं।
- इनमें कम मात्रा में उत्पादन होता है।
- इन उद्योगों में श्रमिकों की भी कम आवश्यकता होती है।
- सामान्यतः ये उद्योग प्रदूषण नहीं फैलाते हैं।
कृषि व्यापार या कृषि कारखाने
कृषि व्यापार एक प्रकार की व्यापारिक कृषि है जो औद्योगिक पैमाने पर की जाती है इसका वित्त पोषण वह व्यापार करता है जिसकी मुख्य रूचि कृषि के बाहर हो। यह फार्म से आकार में बड़े यन्त्रीकृत, रसायनों पर निर्भर व अच्छी संरचना वाले होते है। इनकों कृषि कारखाने भी कहा जाता है
लौह इस्पात उद्योग को आधारभूत उद्योग क्यों कहा जाता है ?
लौह – इस्पात उद्योग के उत्पाद को अन्य वस्तुएँ बनाने के लिए कच्चे माल के रूप में प्रयोग में लाया जाता है इसलिए इसे आधारभूत उद्योग कहते हैं। जैसे लौह इस्पात उद्योग, वस्त्र उद्योग व अन आधार है न उद्योग व अन्य उद्योगों के लिए मशीनें बनाता है। है।
लोहा इस्पात उद्योग को भारी उद्योग क्यों कहते हैं?
लोहा इस्पात उद्योगों को भारी उद्योग कहते हैं, क्योंकि इसमें बड़ी मात्रा में भारी भरकम कच्चा माल उपयोग में लाया जाता है, एवं इसके उत्पाद भी भारी होते हैं।
सूती कपड़ा उद्योग
- इस उद्योग में सूती कपड़े का निर्माण मुख्य रूपों से हथकरघा तथा बिजली करघे द्वारा किया जाता है।
- इस उद्योग के संचालन के लिए कम पूंजी की आवश्यकता पड़ती है।
- यह उद्योग अनेकों श्रमिकों को रोजगार प्रदान करता है।
- इस उद्योग के अंतर्गत सूत की कटाई, बुनाई आदि का कार्य किया जाता है।
- कृत्रिम रेशे से प्रतिस्पर्धा के कारण के सूती वस्त्र उद्योग को समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।
प्रौद्योगिक ध्रुव :-
वे उच्च प्रौद्योगिकी उद्योग जो प्रादेशिक रूप में सकेन्द्रित हैं. आत्मनिर्भर तथा उच्च विशिष्टता लिए होते हैं उन्हें प्रौद्योगिक ध्रुव कहा जाता है जैसे उदाहरण सिलीकन घाटी ( स.रा.अ.) बेंगलूरू (भारत में), सियटल के समीप सिलीकन वनघाटी ।
जंग का कटोरा
नाम संयुक्त राज्य अमेरिका में स्थित पिट्सबर्ग को जंग का कटोरा ‘नाम से जाना जाता है क्योंकि पिट्सबर्ग लौह उत्पादन का प्रमुख क्षेत्र था जिसका महत्व अब घट गया है।
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