प्राथमिक क्रियाएं Notes
Class 12 Geography Chapter 4 Notes in Hindi

यहाँ हम कक्षा 12 भूगोल के 4th अध्याय “प्राथमिक क्रियाएं” के नोट्स उपलब्ध करा रहे हैं। इस अध्याय में प्राथमिक क्रियाएं से जुड़ी प्रमुख विशेषताओं का अध्ययन किया गया है।

ये नोट्स उन छात्रों के लिए उपयोगी सिद्ध होंगे जो इस वर्ष बोर्ड परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं। सरल और व्यवस्थित भाषा में तैयार की गई यह सामग्री अध्याय को तेजी से दोहराने और मुख्य बिंदुओं को याद रखने में मदद करेगी।

प्राथमिक क्रियाएं Notes, Class 12 Geography Chapter 4 Notes in Hindi

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Class 12 Geography Chapter 4 Notes in Hindi

मानव क्रियाएं

  1. मनुष्य अपने जीवन यापन के लिए जो काम करता है, उन्हीं कार्यों को मानव क्रियाएं कहते हैं।
  2. जैसे:- शिकार, पशु चारण, मछली पकड़ना, लकड़ी काटना, खनन, कृषि, उद्योग,परिवहन, व्यापार, चिकित्सा, शिक्षा आदि

आर्थिक क्रियाएं:-

  1. मानव के वह क्रियाकलाप जिससे उसे आय की प्राप्ति होती है आर्थिक क्रियाएं कहलाती है।
  2. जैसे:- व्यापार करना,शिक्षण का कार्य करना,चिकित्सा आदि।

आर्थिक क्रियाओं के प्रकार

1. प्राथमिक क्रियाएं :-

  • वे सभी क्रियाएं जिसमें मानव सीधे-सीधे प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करता है, प्राथमिक क्रिया कहलाता है। यह क्रियाएं पर्यावरण पर निर्भर होती है और इसमें भूमि, जल वनस्पति, खनिज आदि का उपयोग किया जाता है।
  • जैसी:- कृषि, पशुपालन, मछली पालन, मधुमक्खी पालन, आखेट, खनन आदि
  • प्राथमिक क्रियाकलाप से जुड़े लोगों को लाल कॉलर वाले श्रमिक कहते हैं।
  • प्राथमिक क्षेत्र को कृषि क्षेत्र के नाम से जाना जाता है।

2. द्वितीयक क्रियाएं :-

  • वे सभी क्रियाएं जिसमें प्राथमिक क्षेत्र से प्राप्त वस्तुओं को कच्चे माल के रूप में उपयोग करके दूसरी नई वस्तुएं बनाई जाती है जिसके कारण उनका मूल्य में मूल्य में वृद्धि हो जाती है।
  • जैसे:- गेहूं से आटा तथा मैदा तैयार करना, कपास से कपड़ा तैयार करना आदि
  • द्वितीयक क्रियाएं:- निर्माण, विनिर्माण, उद्योग, जलापूर्ति, आदि
  • द्वितीयक क्षेत्र को उद्योग क्षेत्र के नाम से जाना जाता है।

3. तृतीयक क्रियाएं :-

  • वे सभी क्रियाएं जिसके अंतर्गत प्राथमिक और द्वितीयक क्षेत्र से प्राप्त वस्तुओं को लोगों तक और उद्योगपतियों तक पहुंचाने का काम किया जाता है। इसके अंतर्गत सेवाएं प्रदान की जाती है।
  • जैसे:- परिवहन, व्यापार, बैंकिंग, संचार, मनोरंजन आदि
  • तृतीयक क्षेत्र को सेवा क्षेत्र के नाम से जाना जाता है।

4. चतुर्थक क्रियाएं:-

  • वह क्रियाएं जिसमें बहुत अधिक खोज बीन, अनुसंधान और ज्ञान की जरूरत पड़ती है उसे चतुर्थक क्रियाकलाप करते हैं।
  • जैसे:- सूचना प्रौद्योगिकी, विश्वविद्यालय शिक्षण आदि
  • यह बौद्धिक कार्यों से संबंधित क्रियाकलापों होते हैं।

प्रमुख प्राथमिक क्रियाएं

  1. आखेट एवं भोजन संग्रह
  2. पशु चारण
  3. मछली पकड़ना
  4. कृषि
  5. खनन

आखेट एवं भोजन संग्रह

  • मानव सभ्यता की शुरुआती काल में आदिमानव अपने जीवन यापन के लिए अपने चारों ओर के वातावरण पर निर्भर रहता था और वे मुख्य रूप से दो प्रकार के काम करते थे।
  • पशुओं का शिकार करना।
  • जंगलों से फल-फूल, कंदमूल आदि जमा करना।

आखेट एवं भोजन संग्रह की विशेषताएं-

  • आदिम मानव का जीवन पूरी तरह प्रकृति पर निर्भर था।
  • जीविका का साधन शिकार और फल-फूल, कंद-मूल आदि जुटाना था।
  • वेजिंगल नदियों और पहाड़ों से भोजन पाते थे।
  • कोई स्थायी घर या गाँव नहीं था, जीवन घुमंतू था।
  • साधारण औजार – पत्थर लकड़ी और हड्डी के प्रयोग किए जाते थे।
  • भोजन प्राप्त करना कठिन था, इसलिए जीवन अनिश्चित और असुरक्षित था।

विश्व के भोजन संग्रह क्षेत्र-

1. निम्न अक्षांश के क्षेत्र:-

अमेजन बेसिन, अफ्रीका का कांगो बेसिन, ऑस्ट्रेलिया,दक्षिण – पूर्वी एशिया का आंतरिक प्रदेश इक्वाडोर के औका, उत्तरी कालाहारी के बुशमैन, कांगो के पिग्मी और न्यूगिनी की पापुआ अनेक प्रकार के कंदमूल-फल एकत्र करते हैं तथा पशुओं और मछलियों का फंदों से

2. उच्च अक्षांश के क्षेत्र:-

  • उत्तरी कनाडा, उत्तरी यूरेशिया एवं दक्षिणी चिली
  • आधुनिक समय में भोजन संग्रह के कार्यों का कुछ भाग में व्यापारीकरण हो गया।
  • उदाहरण-
  • छाल का उपयोग:- कुनेन (मलेरिया के उपचार)
  • पत्तियों का उपयोग:- पेय पदार्थ, दवाइयां
  • रेशे का उपयोग:- कपड़ा बनाना
  • तने का उपयोग:- रबर, गोंद
  1. जेपोटा नामक वृक्ष के दूध से च्यूइंगम बनाया जाता है।
  2. च्युंगम को चबाने के बाद शेष बचे भाग को चिकल कहते हैं।

पशु चारण

पशुपालन का अर्थ है पशुओं को पालना और उनकी देखभाल करना। इसमें गाय, भैंस, बकरी, भेड़, ऊँट आदि पाले जाते हैं। इससे दूध, मांस, ऊन, अंडे और चमड़ा जैसे चीजें मिलती हैं। यह गाँव और ग्रामीण जीवन की प्रमुख जीविका है तथा किसानों की आमदनी का मुख्य साधन है।

पशु चारण के प्रकार

1. चलवासी पशु चारण :-

चलवासी पशु चारण का अर्थ है, पशुओं को एक जगह न रखकर चारागाह और पानी की तलाश में लगातार इधर-उधर ले जाना। इसमें लोग अपने झुंड के साथ जगह-जगह घूमते रहते हैं। यह जीवन घुमंतू होता है और मुख्य रूप से शुष्क व घास के मैदान वाले क्षेत्रों में किया जाता है।

प्रमुख पशु :

  • उष्णकटिबंधीय अफ्रीका:- गाय एवं बैल
  • सहारा एवं एशिया के मरुस्थल:- भेड़, बकरी एवं ऊंटतिब्बत एवं एंडीज के पर्वतीय भाग:- याक एवं लामा आर्कटिक औग उप उत्तरी ध्रुवीय
  • क्षेत्र:- रेंडियर

चलवासी पशु चारण के प्रमुख क्षेत्रः-

  1. पहला क्षेत्र:- उत्तरी अफ्रीका के अटलांटिक तट से अरब प्रायद्वीप होता हुआ मंगोलिया एवं मध्य चीन तक
  2. दूसरा क्षेत्रः- यूरोप तथा एशिया के टुंड्रा प्रदेश
  3. तीसरा क्षेत्रः- दक्षिणी गोलार्ध में दक्षिणी पश्चिमीअफ्रीका एवं मेडागास्कर द्वी

चलवासी पशु चारण की प्रमुख विशेषताएं-

  • यह घुमंतू जीवन पद्धति पर आधारित है।
  • पशुओं को चराने के लिए घास और पानी की खोज में लगातार स्थान बदलते हैं।
  • स्थायी बस्ती या खेत नहीं होते।
  • मुख्य रूप से शुष्क व घास के मैदान वाले क्षेत्रों में पाया जाता है।
  • जीविका का प्रमुख साधन दूध, मांस, ऊन और चमड़ा है।

2. वाणिज्य पशुधन पालनः-

वाणिज्य पशुधन पालन का अर्थ है, पशुओं को बड़े पैमाने पर व्यापारिक उद्देश्य से पालना। इसमें पशुओं से दूध, मांस, ऊन, अंडे और चमड़ा प्राप्त कर बाजार में बेचा जाता है। यह आधुनिक ढंग से किया जाता है, जहाँ पशुओं की देखभाल के लिए मशीनें, दवाइयाँ और अच्छी नस्लें इस्तेमाल होती हैं।

वाणिज्य पशुधन पालन की विशेषताएं :-

  • यह पालन व्यापारिक उद्देश्य से किया जाता है।
  • बड़े पैमाने पर गाय, भैंस, भेड़, बकरी, मुर्गी आदि पाले जाते हैं।
  • आधुनिक तकनीक, मशीनें और दवाइयों का उपयोग होता है।
  • उच्च नस्ल के पशु पाले जाते हैं।
  • मुख्य उत्पाद – दूध, मांस, ऊन, अंडे और चमड़ा।
  • उत्पादों को बाजार में बेचकर आय अर्जित की जाती है

विश्व के प्रमुख क्षेत्रः-

  1. न्यू जीलैंड
  2. ऑस्ट्रेलिया
  3. अर्जेंटीना
  4. उरुग्वे
  5. संयुक्त राज्य अमेरिका

कृषि

  1. जीवन निर्वाह कृषि
  2. रोपण कृषि
  3. विस्तृत वाणिज्य अनाज कृषि
  4. मिश्रित कृषि 
  5. डेरी कृषि 
  6. भूमध्य सागरीय कृषि
  7. सहकारी कृषि
  8. सामूहिक कृषि 

जीवन निर्वाह कृषि

ऐसी कृषि जो मुख्य रूप से परिवार की जरूरतों को पूरा करने के लिए किया जाता है इसमें उत्पादन का अधिकांश हिस्सा खेती करने वाले परिवार अपने भोजन, वस्त्र और घरेलू जरूरत के लिए इस्तेमाल करता है ना की बाजार में बेचने के लिए।

1. आदिकालीन निर्वाह कृषि

  • ऐसी कृषि जिसमें किसान द्वारा सबसे पहले जंगलों को काटा जाता है फिर उसको जला दिया जाता है जिससे जली हुई राख से मिट्टी की उपजाऊ क्षमता बढ़ जाती है और कुछ साल खेती करने के बाद किसान दूसरी जगह चले जाते हैं, इसे कर्तन और दहन कृषि भी कहते हैं।
  • विश्व के अलग-अलग क्षेत्रों में इसे अलग-अलग नामों से जाना जाता है।
  • जैसे:-
  • भारत के उत्तरी पूर्वी राज्य:- झूमिंग
  • मलेशिया तथा इंडोनेशियाः- लादांग
  • मध्य अमेरिका तथा मेक्सिको:- मिल्पा

2. गहन निर्वाह कृषि :-

यह कृषि मुख्य रूप से मानसूनी एशिया के घनी जनसंख्या वाले देश भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश व जापान आदीं में की जाती है।

गहन निर्वाह कृषि के दो प्रकार हैं:-

  1. चावल प्रधान गहन निर्वाह कृषि
  2. चावल रहित गहन निर्वाह कृषि

रोपण कृषि

  • ऐसी कृषि जिसमें फसल को एक बार रोपण करने के बाद कई वर्षों तक उत्पादन की प्राप्ति होती है यह कृषि व्यापार और लाभ प्राप्त करने के लिए किया जाता है रोपण कृषि की शुरुआत यूरोपवासियों द्वारा अपने उपनिवेशों में किया गया था।
  • रोपण कृषि को एकल कृषि और बागवानी कृषि भी कहा जाता है। जैसे:- चाय, कॉफी, रबड़, कपास, गन्ना, केला आदि
  • रबड़ उत्पादक दो देश
  1. थाईलैंड
  2. इंडोनेशिया

रोपण कृषि की विशेषताएं:

  • एक ही फसल का उत्पादन:- रोपण कृषि के अंतर्गत बड़े से क्षेत्र में केवल एक ही नकदी फसल का उत्पादन किया जाता है जैसे चाय, कॉफी, रबर आदि
  • अधिक पूंजी और श्रम की आवश्यकता:-रोपण कृषि करने के लिए बहुत अधिक पूजी और कुशल मजदूरों की जरूरत होती है।
  • निर्यात प्रधानः- रोपण कृषि मुख्य रूप से विदेशी बाजारों में वस्तुओं को बेचने के लिए किया जाता है जिससे बहुत अधिक मात्रा में मुनाफा कमाया जाता है।
  • तकनीक का अधिक प्रयोग:- रोपण कृषि करने के लिए आधुनिक तकनीक और मशीनों का बहुत ज्यादा प्रयोग किया जाता है।

यूरोपीय लोगों द्वारा ब्राजील में कॉफी बागान स्थापित किए हैं। ब्राजील के इन कॉफी बागानों को फजेंडा कहा जाता है।

विस्तृत वाणिज्य अनाज कृषि

यह कृषि मुख्य रूप से मध्य अक्षांशों के घासभूमि क्षेत्रों में की जाती है। इसकी सबसे प्रमुख फसल गेहूँ है, साथ ही जौ, मक्का और राई भी उगाई जाती हैं। खेत बहुत बड़े होते हैं और अधिकांश कार्य मशीनों से किए जाते हैं। यह खेती पूरी तरह व्यावसायिक होती है और उपज का बड़ा भाग बाज़ार व निर्यात के लिए प्रयोग किया जाता है।

उत्पादन के प्रमुख क्षेत्र:-

  1. एशिया के स्टेपीज
  2. उत्तरी अमेरिका के प्रेयरीज
  3. अर्जेंटीना के पंपास
  4. दक्षिणी अफ्रीका के वेल्डस
  5. ऑस्ट्रेलिया के डाउंस
  6. न्यूजीलैंड का कैंटरबरी मैदान

उत्तरी अमेरिका के प्रेयरीज मैदान को विश्व के अनाज का कटोरा या कटोरा कहा जाता है।

मिश्रित कृषि

  1. मिश्रित कृषि वह पद्धति है जिसमें किसान फसल उत्पादन और पशुपालन दोनों साथ-साथ करते हैं। इसमें गेहूँ, मक्का, जौ जैसी फसलें बोई जाती हैं और साथ ही गाय, भेड़, बकरी, सुअर आदि पाले जाते हैं। इससे किसान को अनाज, दूध, मांस, ऊन सब कुछ मिलता है। यह खेती यूरोप, अमेरिका और एशिया के कुछ हिस्सों में अधिक पाई जाती है।
  2. इसमें बोई जाने वाली फैसले गेहूं, जौ, राई, मक्का, चारे की फसल एवं कंदमूल प्रमुख है।
  3. शस्यावर्तन एवं अंत: फसली कृषि मृदा की उर्वरता को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

मिश्रित कृषि के क्षेत्रः-

  • उत्तरी पश्चिमी यूरोप
  • उत्तरी अमेरिका का पूर्वी भाग
  • यूरेशिया के कुछ भाग
  • दक्षिणी महाद्वीपों के समशीतोष्ण अक्षांश

डेरी कृषि

  1. दूध व दूध से निर्मित पदार्थ जैसे घी, मक्खन, पनीर आदि के लिए दुधारू पशुओं के पालने के व्यवसाय को ही डेरी कृषि कहा जाता है।
  2. इसमें पूंजी की अधिक आवश्यकता होती है।
  3. पशुओं के स्वास्थ्य, प्रजर्मन। अजर्मन एवं पशु चिकित्सा पर र भी भी अधिक ध्यान दिया जाता है।
  4. इसमें गहन श्रम की आवश्यकता होती है पशुओं को चराने, दूध निकलने आदि कार्यों के लिए वर्ष भर श्रम की आवश्यकता रहती है क्योंकि फसलों की तरह इनमें कोई अंतराल नहीं होता।

डेरी कृषि के प्रमुख क्षेत्रः

सबसे बड़ा प्रदेश उत्तरी पश्चिमी यूरोप, कनाडा, न्यूजीलैंड, दक्षिर्णी पूर्वी ऑस्ट्रेलिया, तस्मानिया

भूमध्य सागरीय कृषि

भूमध्य सागरीय जलवायु वाले क्षेत्रों में की जाने वाली कृषि को भूमध्य सागरीय कृषि कहा जाता है। यह एक अति विशिष्ट प्रकार की कृषि है जिसमें खट्टे रसदार फलों का उत्पादन प्रमुख रूप से किया जाता है। जैसे अंगूर अंजीर तथा जैतून। अंगूर की कृषि भूमध्य सागरीय कृषि की एक प्रमुख विशेषता है।

भूमध्य सागरीय कृषि क्षेत्रः-

  1. भूमध्य सागर का समीपवर्ती क्षेत्र
  2. दक्षिणी कैलिफोर्निया
  3. मध्य चिली
  4. दक्षिण अफ्रीका का दक्षिणी पश्चिमी भाग
  5. ऑस्ट्रेलिया के दक्षिणी भाग

बाजार के लिए सब्जी की खेती एवं उद्यान कृषिः-

  • इस कृषि के अंतर्गत अधिक आर्थिक लाभ प्रदान करने वाली कृषि फसलों जैसे सब्जियों, फलों एवं पुष्पों की खेती की जाती है जिनकी मांग निकटवर्ती नगरीय क्षेत्रों में अधिक होती है। इस कृषि में अधिक पूंजी तथा गहन श्रम की आवश्यकता होती है खेतों का आकार छोटा होता है और खेतों का सीधा संपर्क उच्च स्तर के यातायात के साधनों द्वारा नगरों से जुड़ा होता है।
  • इस कृषि में गहन श्रम एवं अधिक पूंजी के साथ-साथ सिंचाई, उर्वरक, अच्छी किस्म के बीज आदि की आवश्यकता होती है।

बाजार के लिए सब्जी की खेती एवं उद्यान कृषि क्षेत्रः-

  1. उत्तरी पश्चिमी यूरोप
  2. संयुक्त राज्य अमेरिका के उत्तर पूर्वी भाग
  3. भूमध्याय सागरीय प्रदेश

नीदरलैंड फूल उत्पादन में प्रथम स्थान रखता है। यहां से बागवानी फसल विशेषतः ट्यूलिप (एक प्रकार का फूल) पूरे यूरोप के प्रमुख शहरों में भेजा जाता है।

ट्रक कृषि:-

सब्जियों के उत्पादन को ट्रक कृषि कहा जाता है क्योंकि सब्जियों को उत्पादन करने के बाद ट्रकों में भरकर सीधे मंडी में भेज दिया जाता है।

सहकारी कृषि

  1. जब कृषकों का एक समूह अपनी कृषि से अधिक लाभ कमाने के लिए स्वेच्छा से एक सहकारी संस्था बनाकर कृषि कार्य संपन्न करें तो उसे सहकारी कृषि कहते हैं।
  2. सहकारी कृषि को सर्वाधिक सफलता डेनमार्क में मिली है।

सामूहिक कृषि

जब कृषकों के एक समूह द्वारा अपने संसाधनों को मिलाकर कृषि कार्य परस्पर सहयोग से किया जाता है तो उसे सामूहिक कृषि कहते हैं। इस कृषि की शुरुआत पूर्व सोवियत संघ में कोलखोज नाम से प्रारंभ हुई थी।

खनन

  1. धरती की सतह या अंदर से खनिज पदार्थों को निकालने की प्रक्रिया को खनन कहते हैं। इसमें कोयला, लौह-अयस्क, बॉक्साइट, सोना, चांदी, पेट्रोलियम आदि खनिज निकाले जाते हैं। खनन से उद्योगों को कच्चा माल मिलता है और यह देश की अर्थव्यवस्था के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
  2. औद्योगिक क्रांति के पश्चात खनन की क्रिया काफी तीव्र हो गई।

खनन की विधियां-

1. धरातलीय खनन या विवृत खनन विधि

  • जब अयस्क धरातल के नीचे गहराई में होता है तब भूमिगत अथवा कूपकी खनन विधि का प्रयोग किया जाता है।
  • खनन का यह तरीका जोखिम भरा होता है क्योंकि जहरीली गैसें, आग एवं बाढ़ के कारण कई बार दुर्घटना होने का भय रहता है।
  • अफ्रीका के कई देश, दक्षिण अमेरिका के कुछ देश एवं एशिया में आय के साधनों का 50% तक खनन कार्य से प्राप्त होता है।

2. कूपकी खनन विधि:-

  • जब अयस्क धरातल के नीचे गहराई में होता है तब भूमिगत अथवा कूपकी खनन विधि का प्रयोग किया जाता है।
  • खनन का यह तरीका जोखिम भरा होता है क्योंकि जहरीली गैसें, आग एवं बाढ़ के कारण कई बार दुर्घटना होने का भय रहता है।
  • अफ्रीका के कई देश, दक्षिण अमेरिका के कुछ देश एवं एशिया में आय के साधनों का 50% तक खनन कार्य से प्राप्त होता है।

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