कक्षा 12 राजनीति विज्ञान अध्याय 6 के नोट्स हिंदी में
लोकतान्त्रिक व्यवस्था का संकट notes
यहाँ हम कक्षा 12 राजनीतिक विज्ञान के 6th अध्याय “लोकतान्त्रिक व्यवस्था का संकट” के नोट्स उपलब्ध करा रहे हैं। इस अध्याय में लोकतान्त्रिक व्यवस्था का संकट से जुड़ी प्रमुख विशेषताओं का अध्ययन किया गया है।
ये नोट्स उन छात्रों के लिए उपयोगी सिद्ध होंगे जो इस वर्ष बोर्ड परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं। सरल और व्यवस्थित भाषा में तैयार की गई यह सामग्री अध्याय को तेजी से दोहराने और मुख्य बिंदुओं को याद रखने में मदद करेगी।
कक्षा 12 राजनीतिक विज्ञान अध्याय 6 के नोट्स हिंदी में, लोकतान्त्रिक व्यवस्था का संकट notes

class 12 Political Science book 2 chapter 6 notes in hindi
लोकतान्त्रिक व्यवस्था का संकट
- कांग्रेस द्वारा 1971 के चुनाव में ‘गरीबी हटाओं’ का नारा दिया गया था, लेकिन देश की सामाजिक आर्थिक स्थिति में विशेष सुधार नहीं हुआ ।
- 1971 भारत-पाक युद्ध में पाकिस्तान को बड़ी हार का सामना करना पड़ा । तकरीबन 80 लाख लोग पूर्वी पाकिस्तान की सीमा पार करके भारत आ गया थे।
- युद्ध के पश्चात् अमरीका ने भारत को हर प्रकार की मदद देना समाप्त कर दिया। इसी अवधि में अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में कई गुना बढ़ोतरी हुई।
- 1973 में चीजों की कीमतों में 23 फीसदी और 1974 में 30 फीसदी की बढ़ोतरी हुई।
- इस तेज मूल्यवृद्धि से लोगों को भारी कठिनाई हुई।
- औद्योगिक विकास की दर काफी कम थी और बेरोजगारी ज्यादा बढ़ गई थी। खर्चे को कम करने हेतु सरकार ने अपने कर्मचारियों की पगार को रोक लिया।
- 1972-73 के वर्ष में मानसून नाकामयाब रहा इससे कृषि की पैदावार में भयंकर गिरावट आई।
- खाद्यान्न का उत्पादन 8 प्रतिशत कम हो गया ।
- 1960 के दशक से ही छात्रों के मध्य विरोध के स्वर उठने लगे थे।
गुजरात आंदोलन या छात्र आंदोलन
- गुजरात के छात्रों ने 1974 के जनवरी माह में खाद्यान, खाद्य तेल तथा दूसरी जरुरी वस्तुओं की बढ़ती हुई कीमत और उच्च पद पर जारी भ्रष्टाचार के विरुद्ध आन्दोलन छेड़ दिया, एल० डी० इंजीनियरिंग महाविद्यालय के छात्रावास में खाने में 20% की वृद्धि पर विवाद ।
- छात्र आन्दोलन में बड़ी राजनीतिक पार्टियाँ भी शामिल हो गई और इस आन्दोलन ने भयंकर रूप धारण कर लिया।
- गुजरात में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया। मोरारजी देसाई समेत और भी विपक्षी दलों ने चुनाव करवाने की मांग की।
- चुनाव ना होने की स्थिति में मोरारजी भाई देसाई भूख हड़ताल पर बैठ जाने को कहा, और जून 1975 के विधानसभा के चुनाव हुए जिसमे कांग्रेस की हार हुई।
जय प्रकाश नारायण और सम्पूर्ण क्रांति
- 1974 के मार्च माह में बढ़ती हुई कीमतों, खाद्यान्न की कमी, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार के विरुद्ध बिहार में छात्रों ने आन्दोलन छेड़ दिया।
- छात्रों के अनुरोध पर जय प्रकाश नारायण ने नेतृत्व करना स्वीकार कर लिया, लेकिन उनकी 2 शर्ते थी
- आन्दोलन अहिंसक रहेगा।
- यह आन्दोलन केवल बिहार तक सीमित नहीं रहेगा।
- सच्चे लोकतंत्र की स्थापना के लिए सम्पूर्ण क्रांति नारा दिया गया ।
- जय प्रकाश नारायण चाहते थे की ये आन्दोलन देश के अन्य भागों में भी फैले ।
- जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में चल रहे आन्दोलन के साथ ही साथ रेलवे के कर्मचारियों ने भी एक राष्ट्रव्यापी हड़ताल का अनुरोध किया।
- जेपी को भारतीय जनसंघ, कांग्रेस (ओ), भारतीय लोकदल, सोशलिस्ट पार्टी जैसे गैर कांग्रेसी दलों का समर्थन प्राप्त हुआ। इन दलों ने जेपी को इंदिरा गाँधी के विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया।
लोकनायक ने कहा था की सम्पूर्ण क्रांति में सात क्रांति शामिल है :-
- राजनैतिक
- आर्थिक
- सामाजिक
- सांस्कृतिक सम्पूर्ण क्रांति का एक यह भी उद्देश्य था कि समाज में व्याप्त कुरीतियाँ, जातिवाद छुआ-छुत साम्प्रदायिकता तथा दहेज प्रथा को पूरा खत्म करना होगा।
- बौद्धिक
- शैक्षिणिक
- आध्यात्मिक क्रांति
आपातकाल का अर्थ
- आपातकाल का अर्थ है की संवैधानिक शासन को निलंबित करके देश का शासन एक दल या एक व्यक्ति की अपनी इच्छानुसार चलाया जाए ।
- आपातकाल की घोषणा के पीछे क्या कारण है :-
1. 1971 के युद्ध में हुआ अत्यधिक खर्च : -
1975 में लागू की गई आपातकाल की घोषणा का एक प्रमुख कारण 1971 में हुए पाकिस्तान के साथ युद्ध को माना जाता है। इस युद्ध में भारत को बहुत अधिक धन खर्च करना पड़ा। इसके अतिरिक्त पूर्वी पाकिस्तान से आए करोड़ों शरणार्थियों का भार भी भारत पर पड़ा | इससे भारतीय अर्थव्यवस्था ख़राब हो गई।
2. अधिक एवं अच्छी फसल का पैदा न होना : -
1972-1973 में भारत में फसल भी अच्छी नहीं हुई। दुसरे शब्दों में सरकार को कृषि क्षेत्र में भी असफलता मिल रही थी, जिससे भारत का आर्थिक विकास नहीं हो पा रहा था
3. तेल संकट : -
1973 में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर तेल संकट पैदा हो गया इस तेल संकट के कारण अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर तेल की कीमतें बढ़ गई । तेल की कीमतें बढ़ने से भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी उसका प्रभाव देखा जाने लगा | इससे भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति और ख़राब हो गई।
4. औद्योगिक उत्पाद में कमी : -
भारत प्रशिक्षित एवं कुशल वैज्ञानिकों इंजीनियरों ओर कर्मचारियों के ओने के बावजूद भी भारत के औद्योगिक उत्पाद में निरंतर कमी हो रही थी जिससे कर्मचारियों में असंतोष बढ़ रहा था।
5. रेलवे की हड़ताल :-
1975 में की गई आपातकालीन घोषणा का एक कारण रेलवे कर्मचारियों द्वारा की गई हड़ताल भी थी जिससे यातायात बिलकुल ख़राब हो गई।
6. गुजरात का नवनिर्माण आन्दोलन -
आंदोलन के एल० डी० इंजीनियरिंग महाविद्यालय के छात्रावास में खाने में 20% की वृद्धि पर विवाद के कारण अहमदाबाद में असंतोष फैल गया तथा आगे चलकर इस असंतोष ने गुजरात नवनिर्माण आन्दोलन का रूप धारण कर लिया। यह आन्दोलन इतना व्यापक था की गुजरात के मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल को त्याग- पत्र देना पड़ा। 1975 में श्री मति गाँधी ने जो आपातकाल की घोषणा की थी, उसका एक प्रमुख कारण गुजरात का नवनिर्माण आन्दोलन भी था
7. बिहार आंदोलन :-
जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में बिहार में चलाया गया बिहार आन्दोलन भी 1975 में आपातकाल को घोषणा का एक प्रमुख कारण था, क्योंकि इस आन्दोलन के कारण जयप्रकाश नारायण ने लोगों को इन्दिरा गाँधी के विरुद्ध एकजुट कर दिया था। बिहार आन्दोलन ने केंद्र में कांग्रेस सरकार को चुनौतियाँ पेश की, तथा श्रीमती गाँधी ने इस आन्दोलन के दबाब में आपातकाल की घोषणा की।
8. इंदिरा गाँधी के निर्वाचन को अवैध घोषित करना :-
- गाँधी द्वारा 1975 में आपातकाल की घोषणा का सबसे महत्वपूर्ण एवं तात्कालिक कारण इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा उनके निर्वाचन को अवैध घोषित करना था।
- इंदिरा गाँधी को छ : वर्ष तक संसद की सदस्यता न ग्रहण करने की सजा दी गई। परन्तु अदालत ने श्रीमती गाँधी को अपील का एक मौका देते हुए अपने निर्णय को स्थगित रखा।
- अदालत ने साथ ही यह भी कहा की श्रीमती गाँधी अपना प्रधानमंत्री का कार्यकाल पूरा कर सकती है परन्तु इस दौरान वह न तो संसद में भाषण दे सकती है, न ही किसी विषय में मतदान कर सकती है और न ही वेतन प्राप्त कर सकती है।
- इस प्रकार के निर्णय से श्रीमती गाँधी के लिए परिस्थितियाँ एकदम प्रतिकूल हो गई, क्योंकि विरोधी दलों ने इस आधार पर उनसे त्याग-पत्र की मांग की तथा श्रीमती गाँधी के विरुद्ध एकजुट होकर आन्दोलन करने लगे। इस परिस्थितियों पर काबू पाने के लिए श्रीमती इंदिरा गांधी ने 25 जून 1975 को आपातकाल की घोषणा की।
आपातकाल की घोषणा
- इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा ने 12 जून 1975 को एक निर्णय सुनाया। इस निर्णय में उन्होंने लोकसभा के लिए इन्दिरा गाँधी के निर्वाचन को अवैधानिक करार दिया।
- न्यायमूर्ति ने यह निर्णय समाजवादी नेता राजनारायण द्वारा दायर एक चुनाव याचिका के मामले में सुनाया था
- राजनारायण ने तर्क दिया की इन्दिरा गाँधी चुनाव प्रचार में सरकारी कर्मचारियों की सेवाओं का प्रयोग की थी। उच्च न्यायालय के इस निर्णय का मतलब यह था की कानून अब इन्दिरा गाँधी संसद नहीं रही।
- 24 जून 1975 को सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय के इस निर्णय पर अपना फैसला सुनाया की जब तक इस अपील की पूरी सुनवाई नही होती तब तक इंदिरा गाँधी संसद बनी रहेंगी परन्तु वे लोकसभा की कार्यवाई में हिस्सा नही ले सकती है
- जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में विपक्षी दलों ने इंदिरा गाँधी के त्यागपत्र के लिए दबाव डाला।
- 25 जून 1975 को इन दलों ने दिल्ली के रामलीला मैदान एक व्यापक प्रदर्शन किया।
- जयप्रकाश नारायण ने इंदिरा गाँधी से त्याग-पत्र की मांग करते हुए राष्ट्रव्यापी सत्याग्रह का ऐलान किया।
- जेपी ने सेना, पुलिस और सरकारी कर्मचारियों का आग्रह किया की वे सरकार के अनैतिक तथा अवैधानिक आज्ञाओं का पालन न करें।
इंदिरा गाँधी किन चीजो के आधार पर आपातकाल लागू की :-
- सरकार ने 25 जून 1975 के दिन घोषणा की कि देश में घोटाले की आशंका है और इस तर्क के साथ उसने संविधान के अनुच्छेद 352 को लागू कर दिया।
- इस अनुच्छेद के तरह प्रावधान किया गया है की बाहरी या भीतरी घोटाले की आशंका होने पर सरकार आपातकाल लागू कर सकती है। सरकार का फैसला था की भयंकर संकट की घड़ी आन पड़ी है इस कारण से आपातकाल की घोषणा आवश्यक हो गई है।
- आपातकाल की स्थिति में सारी शक्तियां केंद्र सरकार के हाथ में चली आती है।
- सरकार चाहे तो ऐसी हालत में किसी एक या सभी मौलिक अधिकारों पर अंकुश लगा सकती है या उनमें कटौती कर सकती है
- 25 जून 1975 की रात्रि में प्रधानमंत्री ने राष्ट्रपति फखरुद्दीन आली अहमद से आपातकाल लागू करने की सिफारिश की।
- राष्ट्रपति ने शीघ्र ही यह घोषणा कर दी।
- आधी रात्रि के पश्चात् सभी बड़े अख़बारों के दफ्तर की बिजली काट दी गई। तड़के सबेरे विशाल पैमाने पर विपक्षी दलों के नेताओं तथा कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी हुई।
- 26 जून की प्रातः 6 बजे एक खास बैठक में मंत्री मंडल को इन बातों की सुचना दी गई किन्तु तब तक बहुत कुछ हो चूका था।
आपातकाल के परिणाम
- आपातकाल के दौरान लोगों पर बहुत से अत्याचार हुए।
- लोगों की स्वतंत्रता को निलंबित कर दिया गया।
- कोई भी व्यक्ति या दल सत्ताधारी पार्टी एवं आपातकाल के विरुद्ध नहीं बोल सकता था इस कारण लोगो में कांग्रेस पार्टी के विरुद्ध असंतोष पैदा हुआ।
- 1975 में इन्दिरा गाँधी ने बीस सूत्री कार्यक्रम चलाया, लेकिन इसके वावजूद भी इंदिरा गाँधी को हार का सामना करना पड़ा।
- आपातकाल के परिणाम स्वरूप 1977 के चुनाव में इन्दिरा गाँधी को हार का सामना करना पड़ा।
- 1977 जनता पार्टी की सरकार बनी।
- आपातकाल के दौरान कई मुख्य नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया था कुल 676 नेताओं की गिरफ्तारी हुई थी।
- शाह जांच आयोग के एक रिपोर्ट में बताया गया है कि 1 लाख ग्यारह हजार लोगों को गिरफ्तार किया गया।
- 26 जून 1975 की रात्रि 2 बजे मौखिक हुक्म मिला कि सभी समाचार पत्रों को बिजली आपूर्ति दो-तीन दिन बाद पुनः बहाल की गई, तब तक प्रेस सेंसरशिप का पूरा ढांचा खड़ा किया जा चुका था।
- प्रेस पर सेंसरशिप लागू कर दिया गया।
- धरना प्रदर्शन और हड़ताल पर रोक लगा दिया गया ।
- नागरिकों के मौलिक अधिकार निष्प्रभावी कर दिए गए।
- प्रधानमंत्री के छोटे बेटे संजय गाँधी उस समय किसी आधिकारिक पद पर नहीं थे फिर भी प्रश्न पर उनका प्रभाव था और आरोप लगाया जाता है की उन्होंने सरकारी कामकाज में दखल दिया ।
- दिल्ली में झुग्गी बस्तियों को हटाने और जबर्दस्ती नसबंदी करने की मुहीम में उनकी भूमिका को लेकर बड़े विवाद उठे।
- निर्धन लोगों को मनमाने तरीके से एक जगह से उजाड़कर दूसरी जगह बसाने की भी घटना हुई।
- इन्डियन एक्सप्रेस और स्टेटस मैन जैसे अख़बारों पर सेंसरशिप लागू कर दिया गया
- जिन समाचारों को छपने से रोका जाता था, वे उनकी जगह खाली छोड़ देते थे।
- 42 वें संशोधन के जरिए हुए अनेक बदलावों में एक देश की विधायिका के कार्यकाल को 5 से बढ़ाकर 6 वर्ष करना ।
आपातकाल के सबक
- आपातकाल के दौरान भारतीय लोकतंत्र की ताकत और कमजोरियां उजागर हो गई थी
- इस प्रकार आपातकाल का पहला सबक तो यही है की बेसक लोकतंत्र की ताकत कम हो सकती है लेकिन खत्म कर पाना बहुत मुश्किल है
- द्वितीय, संविधान में आपातकाल के प्रावधान में कुछ बदलाव किए गए। अब ‘अंदरूनी आपातकाल केवल ‘सशस्त्र विद्रोह’ की हालत में लगाया जा सकता है। इसके लिए यह भी आवश्यक है की आपातकाल की घोषणा का मशविरा मंत्रिपरिषद् राष्ट्रपति को लिखत में दे।
- तीसरा, आपातकाल से प्रत्येक नागरिक अधिकारों के प्रति अधिक सजग हुआ ।
- आपातकाल की समाप्ति के पश्चात अदालतों ने व्यक्ति के नागरिक अधिकारों की रक्षा में सक्रिय भूमिका अदा की।
- आपातकाल में वचनबद्ध नौकरशाही का झलक मिला जहाँ ये संस्थाएं आजाद होकर कार्य नही कर पाई,
- आपातकाल में शासक दल ने पुलिस तथा प्रशासन को अपना राजनीतिक औजार बनाकर इस्तेमाल किया था यह संस्थाएं स्वतंत्र रूप से कार्य नही कर पाई थी।
लोकसभा के चुनाव-1977
- 18 महीने के आपातकाल के पश्चात जनवरी 1977 में सरकार ने चुनाव कराने का निर्णय किया।
- सभी नेताओं को जेल से रिहा कर दिया गया ।
- चुनाव 1977 के मार्च में हुए।
- चुनाव के एकदम पहले इन पार्टियों ने एकजुट होकर जनता पार्टी नाम से एक नया दल बनाया जिसका नेतृत्व जयप्रकाश नारायण का नेतृत्व मंजूर किया।
- कांग्रेस से कुछ अन्य नेताओं ने जगजीवन राम के नेतृत्व में एक नई पार्टी बनाई।
- इस पार्टी का नाम ‘कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी’ था, और आगे चल के जनता पार्टी में सम्मिलित हो गई।
- 1977 के छठे आम चुनाव कई कारणों से भारतीय राजनीति में ऐतिहासिक महत्व रखते है इन चुनाव में पहली बार केंद्र में कांग्रेस पार्टी को हार का सामना करना पड़ा । तथा उसका भारतीय राजनीति पर एकाधिकार समाप्त हो गया | इन चुनावों में मतदाताओं ने जनता पार्टी को ऐतिहासिक जीत दिलाई।
- स्वतंत्रता के बाद पहली बार ऐसा हुआ कि कांग्रेस लोकसभा का चुनाव हार गई।
- कांग्रेस बिहार, उत्तर प्रदेश हरियाणा, दिल्ली और पंजाब में एक भी सीट न पा सकी। राजस्थान और मध्य प्रदेश में उन्हें केवल एक एक सीट मिली।
- कांग्रेस देश में हर जगह चुनाव नहीं हारी थी। महाराष्ट्र, गुजरात और उड़ीसा में उसने अनेक सीटों पर अपना नियंत्रण बरकरार रखा था ।
- आपातकाल का असर हर राज्य पर एकसमान नहीं पड़ा था। उत्तर भारत में आपातकाल का असर ज्यादा देखने को मिला क्योंकि वहाँ लोगों को जबरदस्ती उजड़ने और विस्थापित होने या जबरन नसबंदी करने पर विवश थे ।
- उत्तर भारत में राजनीतिक प्रतिद्वंदिता ज्यादा देखने को मिली क्योंकि मध्यवर्ग के अनेक वर्ग कांग्रेस से दूर जा रही थी और जनता पार्टी के करीब आ रही थी।
जनता पार्टी
- 1977 के चुनावों के पश्चात बनी जनता पार्टी की सरकार में आपस में तालमेल नहीं था।
- आपस में प्रधानमंत्री के पद के लिए खींचातानी मची। इस खींचातानी में मोरारजी देसाई, चरण सिंह और जगजीवन राम सम्मिलित थे।
- मोरारजी देसाई प्रतिद्वंदी थे
- चरण सिंह – उत्तर प्रदेश के कृषक नेता
- जगजीवन राम – मंत्री पद का अनुभव
- जनता पार्टी के सरकार ने मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री तथा चौधरी चरण सिंह व जगजीवन राम दो उपप्रधानमंत्री बने |
- आपसी विवाद की वजह से निंदकों ने कहा कि जनता पार्टी के पास दिशा, नेतृत्व या एक साझे कार्यक्रम की कमी थी।
- मोरारजी देसाई के नेतृत्व वाली सरकार ने 18 महीने में ही अपना बहुमत खो दिया।
- कांग्रेस पार्टी के समर्थन पर दूसरी सरकार चरण सिंह के नेतृत्व में बनी।
- किन्तु बाद में कांग्रेस पार्टी ने समर्थन वापस लेने का निर्णय किया। इस कारण से चरण सिंह की सरकार केवल चार महीने तक सत्ता में रही।
- 1980 के जनवरी में लोकसभा के लिए दुबारा चुनाव हुआ उसमे कांग्रेस पार्टी को वैसी ही बहुमत मिली जैसे की 1971 में मिली थी
- 353 सीटों के साथ कांग्रेस जीत जाती है।
1977 के चुनाव में कांग्रेस पार्टी की हार तथा जनता पार्टी की जीत के कारण :-
1.आपातकाल की घोषणा :-
1977 के चुनाव में कांग्रेस पार्टी की हार का प्रमुख कारण और तत्कालीन कारण इंदिरा गाँधी द्वारा की गई आपातकाल की घोषणा थी। इस घोषणा के विरोध में सभी राजनीतिक दल एकजुट हो गए तथा जनता पार्टी का निर्माण किया तथा 1977 के चुनाव में इस पार्टी को आपातकाल के कारण जीत प्राप्त हुई।
2.आपातकाल के दौर अत्याचार :-
इंदिरा गाँधी ने न केवल आपातकाल लागू किया बल्कि लोगों पर कई प्रकार के अत्याचार भी किए गए । लोगो की स्वतंत्रता को निलंबित कर दिया गया । कोई भी व्यक्ति या दल सत्ताधारी पार्टी एवं आपातकाल के विरुद्ध नही बोल सकता था । इस कारण से लोगों ने कांग्रेस पार्टी को हराकर जनता पार्टी को जितवाया ।
3.मिसा कानून :-
आपातकाल के दौरान इंदिरा गाँधी ने मिसा कानून लागू किया, जिसके अंतर्गत किसी भी व्यक्ति को बिना कारण बताए तथा मुकदमा चलाकर जेल में डाला जा सकता था । इस कानूनके कारण किसी भी व्यक्ति का जीवन, स्वतंत्रता तथा सम्पत्ति सुरक्षित नहीं थी।
4.अनिवार्य नसबंदी :-
आपातकाल के समय संजय गाँधी द्वारा चलाया गया नसबंदी कार्यक्रम भी कांग्रेस की हार का एक प्रमुख कारण बना । यद्यपि भारत की जनसंख्या तेजी से बढ़ रही थी तथा जनसंख्या वृद्धि को रोकने के उपाय करने आवश्यक थे। परन्तु इसके लिए अनिवार्य नसबंदी कर दी जाती थी। इस कारण कई लोगो की मृत्यु भी हो गई।
5.कीमतों का बढ़ना :-
इंदिरा गाँधी की सरकार सभी प्रकार के उपाय करके भी कीमतों की वृद्धि को नही रोक पा रही थी तथा 1971 के चुनाव में उनके द्वारा दिया गया गरीबी हटाओ’ का नारा भी दम तोड़ता नजर आ रहा था।
6. कर्मचारियों की ख़राब दशा :-
कीमतों के बढ़ने से सरकारी कर्मचारियों की दशा ख़राब होने लगी, क्योंकि उनका वेतन निश्चित था तथा उस वेतन से वे बढ़ती हुई मंहगाई में अपनी अनिवार्य आवश्यकताओं की पूर्ति नही कर पा रहे थे
7.बोनस की समाप्ति :-
कांग्रेस पार्टी ने सार्वजानिक क्षेत्रों के कर्मचारियों के बोनस को भी समाप्त कर दिया, जिससे कर्मचारी वर्ग भी कांग्रेस पार्टी के विरुद्ध हो गया।
8.प्रेस पर प्रतिबंध :-
आपातकाल के समय इंदिरा गाँधी ने प्रेस पर प्रतिबंध लगा दिया कोई भी समाचार – पत्र या पत्रिका सरकार एवं कांग्रेस पार्टी के विरुद्ध नहीं लिख सकती थी । समाचार- पत्र एवं पत्रिका में प्रकाशित होने वाली खबरों को पहले सरकार द्वारा पास किया जाता था। इस तरह के प्रतिबंधों से भी लोगो में असंतोष था।
निष्कर्ष :-
उपरोक्त वर्णन के आधार पर कहा जा सकता है की 1977 के चुनावों में कांग्रेस पार्टी की हार एवं जनता पार्टी की जीत के कई कारण थे । परन्तु उस समय महत्वपूर्ण कारण आपातकाल की घोषणा थी जिसके कारण अधिकांश मतदाता कांग्रेस के विरुद्ध हो गए।
राम मनोहर लोहिया तथा समाजवाद :-
- भारत के स्वतन्त्रता संग्राम के सेनानी, प्रखर चिन्तक तथा समाजवादी राजनेता थे
- राम मनोहर लोहिया ने समाज में व्याप्त सात असमानता को चिन्हित किया
- जिसे सात क्रांतियाँ भी कहा जाता है
- यह सात क्रांतियाँ इस प्रकार है :-
- नर-नारी की समानता के लिए,
- चमड़ी रंग पर असमानताओं के विरुद्ध
- जन्मजात तथा जाति प्रथा के खिलाफ
- परदेशी गुलामी के खिलाफ
- निजी पूंजी की विषमताओं के खिलाफ
- अस्त्र शास्त्र के खिलाफ
- सत्याग्रह के लिए।
ncert Class 12 Political Science book 2 Chapter 6 Notes in Hindi
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