कक्षा 12 राजनीति विज्ञान अध्याय 3 के नोट्स हिंदी में
नियोजित विकास की राजनीति notes
यहाँ हम कक्षा 12 राजनीतिक विज्ञान के 3rd अध्याय “नियोजित विकास की राजनीति” के नोट्स उपलब्ध करा रहे हैं। इस अध्याय में नियोजित विकास की राजनीति से जुड़ी प्रमुख विशेषताओं का अध्ययन किया गया है।
ये नोट्स उन छात्रों के लिए उपयोगी सिद्ध होंगे जो इस वर्ष बोर्ड परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं। सरल और व्यवस्थित भाषा में तैयार की गई यह सामग्री अध्याय को तेजी से दोहराने और मुख्य बिंदुओं को याद रखने में मदद करेगी।
कक्षा 12 राजनीतिक विज्ञान अध्याय 3 के नोट्स हिंदी में, नियोजित विकास की राजनीति notes

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नियोजित विकास
- नियोजन का अर्थ कम से कम व्यय द्वारा उपलब्ध साधनों का प्रयोग करते हुए पूर्व निश्चित लक्ष्य को प्राप्त करना है।
- योजनाबद्ध विकास को नियोजित विकास कहते है।
- वर्तमान समय में नियोजित का विशेष महत्व है नियोजित से अभिप्राय किसी कार्य को व्यवस्थित ढंग से करने के लिए तैयारी करना है, कुछ विशेष उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए विधि निर्धारित करना ही नियोजित कहलाता है।
आजादी के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था
- आजादी के समय भारत की अर्थव्यवस्था डगमगा गई थी।
- लोग ज्यादा तर कृषि पर निर्भर थे।
- उद्योगों का विकास धीमा होना।
- जनसंख्या वृद्धि के साथ साथ अधिकतर लोगो का गरीब होना।
- आधारिक संरचना का अभाव (बिजली, सड़क, बाजार आदि)।
- मूलभूत सुविधाओं का अभाव।
- आजादी के साथ साथ भारत पाकिस्तान का विभाजन हो जाना जिससे अर्थव्यवस्था को काफी नुकसान हुआ।
विकास के मॉडल
- समाजवादी मॉडल
- पूंजीवादी मॉडल
विकास का अर्थ :-
विकास शब्द से अभिप्राय उन्नति, प्रगति, कल्याण, तथा बेहतर जीवन की अभिलाषा के विचारों से है विकास का संबंध आर्थिक संवृद्धि तथा आर्थिक सामाजिक न्याय
समाजवादी मॉडल :-
साम्यवाद विचारधारा ऐसी विचारधारा होती है जिसमे समाज कि सारी व्यवस्था सरकार के हाथ में रहेगा, इस व्यवस्था में निजी संपत्ति का विरोध किया जाता है।
पूंजीवादी मॉडल :-
पूंजीवाद विचारधारा एक ऐसी विचारधारा थी जिसमे समाज में सरकार का हस्तक्षेप कम होता है। व्यापार को अधिक महत्व दिया जाता है, निजी व्यवस्था को ज्यादा महत्त्व दिया जाता है।
मिश्रित मॉडल :-
- भारत ने मिश्रित अर्थव्यवस्था को अपनाया है
- मिश्रित अर्थव्यवस्था से अभिप्राय ऐसी व्यवस्था से है जिसमे पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के साथ – साथ साम्यवादी अर्थव्यवस्था भी शामिल होता है
विकास की विचारधाराएँ
1. वाम पंथी विचारधारा :-
- यह वो लोग थे जो चाहते थे की देश में गरीबी और पिछड़े वर्ग को ध्यान में रख कर विकास की व्यवस्था बनाई जाए।
- यह लोग गरीबों के लिए चिंतित थे
- यह चाहते थे की ऐसी व्यवस्था बनाई जाय जिससे की देश में गरीब लोगो का कल्याण हो सके।
2. दक्षिणपंथी विचारधारा :-
- यह वो लोग थे जो पूंजीवादी के समर्थन में थे।
- दक्षिणपंथी विचारधारा खुली प्रतिस्पर्धा को प्रेरित करती है।
- इस विचारधारा के अनुसार सरकार को अर्थव्यवस्था में अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
नियोजन
- नियोजन का अर्थ कम – से कम व्यय द्वारा उपलब्ध साधनों का प्रयोग करते हुए पूर्व निश्चित लक्ष्य को प्राप्त करना है
- सोवियत संघ की नियोजित विकास की व्यवस्था से प्रभावित होकर भारत ने भी नियोजन को अपनाया ।
योजना आयोग (Planning Commission)
- स्थापना – 15 मार्च 1950 में
- अध्यक्ष – प्रधानमंत्री
कार्य :-
- पंचवर्षीय योजना बनाना
- संसाधनों का सही प्रकार से इस्तेमाल
- योजना के प्रत्येक चरण का मूल्यांकन करना
उद्देश्य :-
इसका मुख्य उद्देश्य देश के संसाधनों को ध्यान में रखते हुए भविष्य के लिए योजना का निर्माण करना था ताकि देश तेजी से विकास कर सके।
- 1 जनवरी 2015 को योजना आयोग का नाम बदल कर नीति (NITI) आयोग रख दिया गया।
नीति(NITI)
- National Institution for Transforming India
- अध्यक्ष – प्रधानमंत्री
- उपाध्यक्ष – अरविंद पनगढ़ियाँ
योजना आयोग में कमियां
- योजना आयोग में मुख्य रूप से केंद्र सरकार का प्रभाव था और सभी योजनाएं केंद्र सरकार द्वारा बनाकर राज्यों पर थोप दी जाती थी।
- राज्यों का प्रतिनिधित्व ना होने के कारण राज्यों के लिए उन योजनाओं को लागू कराना मुश्किल होता था।
- विभिन्न पार्टियों के बीच होने वाली राजनीती की वजह से भी योजनाओं को बनाने और लागू कराने में समस्या आती थी।
- राज्यों में संसाधनों का आबंटन करने में समस्या आती थी।
नीति आयोग बनाने के कारण
- इन्ही सब समस्याओं को देखते हुए सरकार ने योजना आयोग की समाप्ति कर 1 जनवरी 2015 को नीति आयोग की स्थापना की।
- नीति आयोग में योजना आयोग की तरह संसाधनों का बंटवारा आयोग द्वारा नही किया जाता बल्कि अब यह जिम्मेदारी देश के वित्त मंत्रालय को सौंपी गई है जिस वजह से संसाधन आबंटन की समस्या समाप्त हो गई।
- संचालन परिषद में सभी राज्यों के मुख्यमंत्री और केंद्र शासित प्रदेशों के उप राज्यपालों को स्थान दिया गया जिससे राज्यों के प्रतिनिधित्व की समस्या को समाप्त हुई।
पंचवर्षीय योजना
पंचवर्षीय योजना से अभिप्राय एक ऐसे योजना से है जिसके लक्ष्य को एक निश्चित समय में पूरा किया जाता है अर्थात् पांच वर्षों के लिए बनाई गई योजना को पंचवर्षीय योजना कहते है
प्रथम पंचवर्षीय योजना
- समय 1951-1956
- नेतृत्व – के.वि. राज
उद्देश्य -
- कृषि क्षेत्र को बढावा देना क्योंकि अधिकतर लोग कृषि पर निर्भर थे।
- द्वितीय विश्वयुद्ध तथा देश के विभाजन के फलस्वरूप देश में जो आर्थिक अव्यवस्था तथा असंतुलन पैदा हो चूका था उसको ठीक करना था
- देश में सर्वांगीण संतुलित विकास का प्रारम्भ करना था।
- उत्पादन क्षमता में वृद्धि तथा आर्थिक विषमता को यथासंभव कम करना था।
दूसरी पंचवर्षीय योजना
- समय – 1956-1961
- उद्देश्य – उद्योगों को बढावा देना
- नेतृत्व – पी. सी. महालनोविस
उद्देश्य :-
- तेज गति से प्रगति करना।
- भारी उद्योगों को बढावा देना (बिजली, रेलवे, इस्पात)।
- औद्योगीकरण करना।
- राष्ट्रिय आय में पर्याप्त वृद्धि की जाए ताकि लोगो के रहन-सहन के स्तर में सुधार हो सके।
- रोजगार के अवसरों में अधिक से अधिक विस्तार किया जाए।
मुख्य विवाद
कृषि बनाम उद्योग
- हमारे समक्ष एक बड़ा सवाल यह है कि भारत जैसी पिछड़ी अर्थव्यवस्था में कृषि और उद्योग के मध्य किसमें अधिक संसाधन लगाए जाने चाहिए।
- अधिकतर लोगो का मानना था की द्वितीय पंचवर्षीय योजना का उद्देश्य उद्योगों को बल देने से खेती और ग्रामीण क्षेत्रों को चोट पहुंची है।
- चौधरी चरण सिंह ने कहा कि नियोजन से शहरी और औद्योगिकी वर्ग समृद्ध हो रहे है और इसकी कीमत कृषकों और ग्रामीण जनता को अदा करनी पड रही है।
- कई दुसरे लोगों का मानना था कि औद्योगिक उत्पादन के वृद्धि दर को तीव्र किए बिना निर्धनता के मकड़जाल से छुटकारा नही मिल सकता ।
- भूमि-सुधार तथा ग्रामीण निर्धनों के मध्य संसाधन के विभाजन के लिए कानून बनाए। नियोजन में सामुदायिक विकास के कार्यक्रम तथा सिंचाई परियोजनाओं पर काफी रकम व्यय करने की बात मानी गई थी।
निजी क्षेत्र बनाम सार्वजनिक क्षेत्र
- भारत ने ना तो पूंजीवादी अपनाया ना ही साम्यवाद को क्योंकि पूंजीवादी मॉडल में विकास का कार्य पूरी तरह से निजी क्षेत्र के सहारे होता है जबकि साम्यवाद मॉडल में निजी संपत्ति को समाप्त कर दिया गया है और प्रत्येक प्रकार के उत्पादन पर राज्य का नियंत्रण होता है
- भारत ने दोनों मॉडल की कुछ बातों को शामिल किया जिसको मिश्रित अर्थव्यवस्था कहा जाता है
- कृषि – किसानी, व्यापार तथा उद्योगों का एक बड़ा हिस्सा निजी क्षेत्र के हाथों में रहा।
- राज्य ने अपने हाथ में भारी उद्योगों को रखा तथा उसने आधारभूत ढांचा प्रदान किया।
सार्वजानिक क्षेत्र :-
सार्वजानिक क्षेत्र से अभिप्राय उन व्यवसायों तथा आर्थिक क्रियाकलापों से है जिनके साधनों पर सरकार का स्वामित्व होता है और जिनका प्रबन्ध व नियंत्रण सरकार के हाथो में ही होता हे
सार्वजानिक क्षेत्र की विशेषताएं:-
- सार्वजानिक क्षेत्र एक व्यापक धारणा है जिसमे सरकार की समस्त आर्थिक तथा व्यावसायिक गतिविधियाँ शामिल की जाती है।
- सार्वजानिक क्षेत्र के अंतर्गत स्थापित किए जाने वाले विभिन्न उद्यमों, निगमों तथा अन्य संस्थाओं पर सरकार का स्वामित्व, प्रबंध तथा संचालन होता है।
भूमि सुधार
भूमि सुधार को लेकर एक गंभीर समस्या थी लेकिन भूमि सुधार के लिए काफी प्रयत्न किए गए :-
- जमींदारी प्रथा को समाप्त करना
- जोतों का चकबंदी करना
- सहकारिता तथा ग्रामीण बैंको को स्थापित करना
- किसानो के लाभ के लिए भारत सरकार ने किसान क्रेडिट कार्ड और व्यक्तिगत दुर्घटना बीमा योजना भी शुरू की है
भूमि सुधार की कुछ और कोशिशों को थोड़ी कम कामयाबी मिली
जैसे :-
- एक आदमी अधिकतम कितनी जमीन अपने नाम पर रख सकता है
- किंतु जिनके पास अधिक भूमि थी उन्होंने इस कानून का तोड़ ढूंढ लिया जैसे वो अपनी जमीनों पत्नी के नाम, बच्चो के नाम या किसी जान पहचान वालो के नाम करवा देते थे, कुछ लोग अपनी जमींने काश्तकरों को बताई पर जोतने बोने के लिए दे दिए थे।
हरित क्रांति
- भारत में हरित क्रांति की शुरुआत सन 1966-67 से हुई। हरित क्रांति प्रारम्भ करने का श्रेय नोबल पुरस्कार विजेता प्रोफ़ेसर “नारमन बोरलॉग” को जाता है।
- हरित क्रांति से अभिप्राय देश के कृषि क्षेत्र में अधिक उपज देने वाले शंकर तथा बौने बीज, उच्च गुणवत्ता के उर्वरक, कीटनाशक और बेहतर सिंचाई सुविधा, किसानो को उपलब्ध करना था।
- सरकार ने इस बात की भी गारंटी दी कि उपज को एक निर्धारित कीमत पर खरीद लिया जाएगा
हरित क्रांति की पद्धति के मुख्य रूप से तीन तत्व थे -
- कृषि का निरन्तर विस्तार
- दोहरी फसल का उद्देश्य
- अच्छे बीजों का प्रयोग
हरित क्रांति के सकारात्मक और नकारात्मक प्रभाव
सकारात्मक प्रभाव
- उत्पादन में रिकार्ड वृद्धि।
- औद्योगिक विकास को बढ़ावा।
- जल – विद्युत शक्ति को बढ़ावा।
- विदेशों में भारतीय किसानो की मांग।
- विदेशी कर्जों की वापसी।
- किसानों की स्थिति में सुधार आया।
नकारात्मक प्रभाव
- निम्नीकृत मिट्टी उर्वरता।
- जल स्तर का घटना।
- रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों का प्रयोग।
- खाद्य श्रृंखला में विष का स्तर।
- ज्यादातर किसानों को लाभ नी हुआ।
- अमीर और गरीब में और अंतर हो गया।
श्वेत क्रांति
- मिल्कमैन ऑफ इंडिया – वर्गीज कुरियन ।
- अमूल की शुरुआत गुजरात के आणन्द शहर के वर्गीज कुरियन की थी।
- जिससे कि भारत में दूध की कमी को दूर किया जा सके। इसे ‘श्वेत क्रांति’ भी कहते हैं 13 जनवरी 1970 को इसकी शुरुआत हुई थी।
- इसमें 25 लाख दूध उत्पादक जुड़े, जिससे अन्य जगहों पर भी दूध पहुंचाया जा सके।
- दूध के पाउडर आ जाने से लोग दूध को लम्बे समय तक स्टोर कर पाते है ।
- 1970 में ऑपरेशन फ्लड के नाम से ग्रामीण विकास कार्यक्रम शुरू हुआ ।
बॉम्बे प्लान
- 1944 में भारतीय उद्योगपतियों का एक समूह बांबे में एकत्र हुआ
- इस बैठक में इन उद्योगपतियों ने नियोजित अर्थव्यवस्था चलाने का एक संयुक्त प्रस्ताव तैयार किया
- इसे ही बॉम्बे प्लान के नाम से जाना जाता है
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के notes आपको कैसे लगे अपनी राय जरूर दे
Acha ha par thodi Kami ha par acha ha
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