कक्षा 12 इतिहास अध्याय 12 के नोट्स हिंदी में
संविधान का निर्माण notes
यहाँ हम कक्षा 12 इतिहास के 12th अध्याय “संविधान का निर्माण” के नोट्स उपलब्ध करा रहे हैं। इस अध्याय में “संविधान का निर्माण” से जुड़ी प्रमुख विशेषताओं का अध्ययन किया गया है।
ये नोट्स उन छात्रों के लिए उपयोगी सिद्ध होंगे जो इस वर्ष बोर्ड परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं। सरल और व्यवस्थित भाषा में तैयार की गई यह सामग्री अध्याय को तेजी से दोहराने और मुख्य बिंदुओं को याद रखने में मदद करेगी।
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class 12 History chapter 12 notes in hindi
संविधान
- संविधान जिसके माध्यम से किसी देश को सुचारू रूप से चलाया जाता है अर्थात ऐसी लिखित पुस्तक जो शासन चलाने में सहायक है।
- संविधान, सरकार, समूह, न्यायालय व अन्य संगठनो के बीच, विश्वास व तालमेल बिठाता है।
उथल-पुथल का दौर
- 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र तो हो गया था लेकिन इसके साथ ही इसे विभाजन का डंक झेलना पड़ा।
- 1940 का दशक एक ऐसा दशक था जिसमे जगह जगह पर आन्दोलन होते रहे जैसे भारत छोडो आन्दोलन और कुछ जगहों पर मजदूरों तथा किसानों के आन्दोलन भी हो रहे थे।
- अगस्त 1946 में कलकत्ता में आरंभ हुई हिंसा के साथ उत्तरी तथा पूर्वी भारत में करीब वर्ष भर तक चलने वाला दंगे-फसाद तथा हत्याओं का लंबा सिलसिला आरंभ हो गया था।
- 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता दिवस पर ख़ुशी और आशा का जो माहौल था
- यह वह समय था जिसमे अनगिनत लोग एक जगह से दूसरी जगह जाने लगे ।
- करोड़ों शरणार्थी यहाँ से वहाँ जा रहे थे।
- मुस्लमान पूर्वी तथा पश्चिमी पाकिस्तान की ओर तो हिन्दू और सिख पश्चिमी बंगाल व पूर्वी पंजाब की ओर बढ़े जा रहे थे।
- उनमें से अनेक लोग कभी मंजिल तक नही पहुंचे, बीच रास्ते में ही मारे गए।
- सबसे बड़ी समस्या रियासतों को लेकर थी। अंग्रेजी राज के दौरान एक तिहाई भू-भाग ऐसे नवाबों तथा रजवाड़ों के नियंत्रण में था जो अंग्रेजी ताज की अधीनता मंजूर कर चुके थे।
- उस समय वो सीमित ही सही लेकिन स्वतंत्र रूप से अपने राज्यों को चला सकते थे
- कुछ तो भारत में स्वतंत्र सत्ता का सपना देख रहे थे।
संविधान सभा का गठन
- सार्वभौमिक मताधिकार के आधार पर संविधान सभा के सदस्यों का चुनाव नही किया गया था।
- 1945-46 की सर्दियों में भारतीय प्रान्तों में चुनाव संपन्न हुए थे। इसके बाद प्रांतीय संसदों ने संविधान सभा के सदस्यों का चुनाव किया।
- नई संविधान सभा में कांग्रेस का प्रभुत्व था। मुस्लिम लीग को आरक्षित सीटे मिली । परन्तु लीग ने संविधान सभा का बहिष्कार बेहतर समझा।
- आरंभ में समाजवादी भी संविधान सभा से दूर रहे क्योंकि वे उसे अंग्रेजों की बनाई हुई संस्था समझते थे ।
- संविधान सभा के 82 प्रतिशत सदस्य कांग्रेस पार्टी के ही सदस्य थे लेकिन सभी एक मत के नहीं थे कुछ समाजवाद के पक्ष में थे, तो कुछ जमींदार के, तो कुछ धर्मनिरपेक्ष के मत में थे।
विशेष मुद्दे :-
- कई भाषाई अल्पसंख्यक अपनी मातृभाषा की रक्षा की मांग करते थे।
- धार्मिक अल्पसंख्यक अपने विशेष हित सुरक्षित करवाना चाहते थे और दलित जाति – शोषण की समाप्ति की मांग करते हुए सरकारी संस्थाओं में आरक्षण चाहते थे।
- सांस्कृतिक अधिकारों एवं सामाजिक न्याय के बहुत से महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर चल रही सार्वजानिक चर्चाओं पर बहस हुई।
संविधान सभा के उद्देश्य
- भारत एक स्वतंत्र, संप्रभु गणराज्य है
- अल्पसंख्यकों, पिछड़े जाति तथा जनजातियों, दलितों और दुसरे पिछड़े वर्गों को समुचित सुरक्षा दी जाएगी।
- गणराज्य की क्षेत्रीय अखंडता और जल, थल, आकाश, में इसके संप्रभु अधिकारों की रक्षा सभ्य राष्ट्रों के कानून और न्याय के अनुसार की जाएगी।
- विश्व शांति तथा मानव कल्याण के विकास हेतु देश स्वेच्छापूर्ण और पूर्ण सहयोग करेगा।
- भारत के सभी लोगों को सामाजिक, आर्थिक तथा राजनितिक न्याय, कानून के समक्ष समानता, प्रतिष्ठा तथा अवसर की समानता दी जाएगी।
- संप्रभुता, स्वतंत्र भारत और इसके संविधान की तमाम शक्तियों और सत्ता का स्रोत “जनता” है
संविधान की आवश्यकता
- देश को सुचारू रूप से चलाने के लिए संविधान की आवश्यकता पड़ती है
- यह स्पष्ट करता है कि समाज में निर्णय लेने की शक्ति किसके पास होगी।
- संविधान यह भी तय करता है की सरकार का निर्माण कैसे होगी।
- संविधान सरकार द्वारा अपने नागरिकों पर लागू किए जाने वाले कानूनों की सीमा तय करता है।
संविधान का गठन
- संविधान सभा की प्रथम बैठक 9 दिसम्बर 1946 को हुआ।
- 13 दिसम्बर 1946 को पंडित जवाहर लाल नेहरु ने संविधान का
- उद्देश्य प्रस्ताव प्रस्तुत किया ।
- इस उद्देश्य प्रस्ताव को संविधान सभा ने 22 जनवरी 1947 को स्वीकार कर लिया ।
- संविधान सभा की रचना । करीब उसी योजना के अनुरूप हुई जिसे ब्रिटिश मंत्रिमंडल की एक समिति – “कैबिनेट मिशन” ने प्रस्तावित किया था।
- हर एक प्रान्त, देशी रियासत अथवा रियासतों के समूह को उनकी आबादी के अनुपात में सीटें दी गई।
- 10 लाख की जनसंख्या पर 1 प्रतिनिधि चुनने का विचार था।
- ब्रिटिश सरकार के प्रत्यक्ष शासन वाले प्रान्तों को 292 सदस्य चुनने थे और देशी रियासतों को न्यूनतम 93 सीटें आबंटित की गई तथा 4 सदस्य चीफ कमिश्नरी प्रान्तों के चुने गए।
- हर एक प्रान्त की सीटो को तीन समुदायों (मुसलमान, सिख तथा सामान्य वर्ग) में उनकी आबादी के अनुपात में बांट दिया गया था
- विभाजन के पश्चात वे तमाम प्रतिनिधि संविधान सभा के सदस्य नही रहे जो पाकिस्तान से चुन के आए थे।
- 31 अक्टूबर 1947 को संविधान सभा बुलाई गई, तब उसमें संविधान सभा के वास्तविक सदस्यों की तादाद कम होकर 299 रह गई।
- इसमें से 26 Nov 1949 को कुल 284 सदस्यों उपस्थित थे।
- इन्होने ही अंतिम तौर पर पारित संविधान पर अपने हस्ताक्षर किए जिसमे 15 महिलाएं थी।
अन्य महत्वपूर्ण बाते :-
- 22 भाग, 8 अनुसूचियां और 395 अनुच्छेद बनाए गए थे । (470 अनुच्छेद है 12 अनुसूचियां है और 25 भाग है)
- 2 वर्ष, 11 माह और 18 दिन लगे थे ।
- कुल 11 सत्र और 165 दिन तक संविधान की बैठके चली थी।
- संविधान को बनाने में 6.4 करोड़ रुपये खर्च हुए।
- 22 जुलाई 1947 को संविधान सभा द्वारा राष्ट्रीय ध्वज को अपनाया गया।
- 24 जनवरी 1950 को भारत के प्रथम राष्ट्रपति के रूप में डॉ राजेन्द्र प्रसाद को चुना गया था।
- 24 जनवरी 1950 को इसने राष्ट्रीय गान और राष्ट्रीय गीत को अपनाया गया।
संविधान में विभिन्न मुद्दों के लिए संविधान सभा की आठ प्रमुख कमेटियां थी
भारतीय संविधान सभा के सामने उपस्थित चुनौतियाँ :-
भारतीय संविधान सभा के सामने भारत का संविधान बनाने की जिम्मेदारी थी।
इस संविधान के निर्माण के दौरान उन्हें अनेकों चुनौतियों का सामना करना पड़ा जैसे :-
1. अल्पसंख्यक वर्गों का विकास ।
2. देश में स्थित विभिन्नता के साथ एकता कायम करना ।
3. केंद्र एवं राज्य की सरकारों में शक्तियों का बंटवारा करना ।
4. भारतीय शासन व्यवस्था में स्थित संगठनों एवं संस्थाओं में शक्तियों का बराबर बंटवारा करना।
संविधान सभा के मुख्य नेता :-
वैसे तो संविधान सभा में तीन सौ सदस्य थे। इनमें से छः सदस्यों की भूमिका खास रही।
1. जवाहर लाल नेहरू:-
उद्देश्य प्रस्ताव प्रस्तुत किए, राष्ट्रिय ध्वज का निर्धारण किया।
2. वल्लभ भाई पटेल :-
पटेल मुख्य तौर पर परदे के पीछे कई खास कार्य कर रहे थे। उन्होंने कई रिपोर्टों के प्रारूप लिखने में विशेष सहायता की, तथा परस्पर विरोधी विचारों के मध्यस्थता किए।
3. राजेन्द्र प्रसाद :-
संविधान सभा के अध्यक्ष थे, सभा में चर्चा रचनात्मक दिशा ले और सभी सदस्यों को अपनी बात कहने का अवसर मिले – यह उनकी जिम्मेदारियाँ थीं।
4. बी. आर. अम्बेडकर :-
सभा के सबसे महत्वपूर्ण सदस्यों में से एक थे, संविधान की प्रारूप समिति के अध्यक्ष के तौर पर काम किए, संविधान के जनक के रूप में जाने जाते है
5. बी. एन. राव :-
यह भारत सरकार के संवैधानिक सलाहकार थे और उन्होंने अन्य देशों की राजनीतिक व्यवस्थाओं का सूक्ष्मता से अध्ययन करके बहुत से चर्चा पत्र तैयार किए थे।
6. एस. एन. मुखर्जी :-
मुख्य योजनाकार थे, जटिल प्रस्तावों को स्पष्ट वैधिक भाषा में व्यक्त करने की क्षमता रखते थे।
अन्य नेता :-
गुजरात के के. एम. मुंशी और मद्रास के अल्लादि कृष्णास्वामी अय्यर, (दोनों ने ही संविधान के प्रारूप पर खास सुझाव दिए)
पृथक निर्वाचन
- 27 अगस्त 1947 को मद्रास के बी. पोकर बहादुर द्वारा पृथक निर्वाचन क्षेत्र के पक्ष में एक भाषण दिया गया।
- इस भाषण में उन्होंने कहा कि हमें एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था की जरूरत है जहां पर अल्पसंख्यक भी अन्य लोगों की तरह समाज में समान रूप से रह सके एवं राजनीति में उनका पूरा प्रतिनिधित्व हो सके उनकी आवाज सुनी जाए और उनके विचारों पर ध्यान दिया जाए।
- इसीलिए उन्होंने पृथक निर्वाचन क्षेत्रों की मांग की ताकि देश में सभी अल्पसंख्यकों को राजनीति में उनकी हिस्सेदारी मिली सके परन्तु संविधान सभा के कई सदस्यों द्वारा इसका विरोध किया गया।
- सरदार वल्लभभाई पटेल ने कहा कि पृथक निर्वाचन क्षेत्र एक ऐसा विषय है जिसने देश में एक समुदाय को दुसरे समुदाय से लड़ने पर मजबूर कर दिया इसी वजह से देश के टुकडें हुए और देश में इतने बड़े स्तर पर दंगे हुए अगर देश में शांति स्थापित करनी है तो इस विषय को यही छोड़ देना सही रहेगा।
आदिवासी और उनके अधिकार :-
- मुख्य आदिवासी नेता जयपाल सिंह जी ने कहा कि आदिवासी संख्या के आधार पर अल्पसंख्यक नहीं है परन्तु उन्हें संरक्षण की आवश्यकता है।
- शुरू से ही उन्हें संसाधनों से वंचित रखा गया है।
- उन्हें आदिम और पिछड़ा मानते हुए समाज ने उनकी उपेक्षा की है।
- जिस वजह से वह पिछड़ा हुआ जीवन जीने के लिए मजबूर है ऐसे में उन्हें मुख्यधारा में शामिल करना और अधिकार उपलब्ध करवाना अत्यंत आवश्यक है।
दलित
- संविधान सभा में दलितों के विषय पर लंबी बहस हुई।
- राष्ट्रिय आंदोलनों के दौरान डॉ भीमराव अंबेडकर द्वारा जातियों के लिए पृथक निर्वाचन क्षेत्रों की मांग की गई थी जिसका महात्मा गांधी ने विरोध किया था और कहा था कि ऐसा करने से दलित समुदाय बाकी समाज से पूरी तरह से कट जायगा।
- जे अंगप्पा ने कहा की हरिजन अल्पसंख्यक नहीं है परन्तु समाज के अन्य वर्गों द्वारा उन्हें हमेशा संसाधनों और राजनीतिक शक्ति से दूर रखा गया है। जिस वजह से वह हमेशा पीड़ा का शिकार रहे है न तो उन्हें शिक्षा के अवसर दिए गए में साझेदारी दी गई।
- इन सब तर्कों को सुनते हुए संविधान सभा में यह सुझाव दिया गया की:-
- अस्पृश्यता का उन्मूलन किया जाएगा।
- हिन्दू मंदिरों को सभी जातियों के लिए खोल दिया जाएगा।
- निचली जातियों के लोगों को विधायिका और सरकारी नौकरी में आरक्षण दिया जायगा।
राज्य की शक्तियाँ :-
- जवाहरलाल नेहरू समेत अन्य लोग केंद्र को शक्तिशाली बनाने के पक्ष में थे।
- एक दुर्बल केन्द्रीय शासन की व्यवस्था देश के लिए हानिकारक होगी।
- इसलिए हमें ऐसी केंद्र की स्थापना करना होगा जो सभी के बीच समन्वय स्थापित करने में और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर देश के लिए आवाज उठाने में सक्षम होगा।
- इसी को देखते हुए संविधान में तीन सूचियों का निर्माण किया गया।
1. केन्द्रीय सूची :-
केंद्र सरकार अधीन जैसे- युद्ध और शांति, रेलवे, मुद्रा आदि
2. राज्य सूची :-
राज्य सरकार अधीन जैसे- पुलिस, सार्वजानिक स्वास्थ्य, शराब आदि
3. समवर्ती सूची :-
केंद्र और राज्य दोनों के अधीन जैसे मजदूर संगठन, सामानों में मिलावट, शिक्षा, वन इत्यादी ।
- अनुच्छेद 356 में गवर्नर की सिफारिश पर केंद्र सरकार को राज्य सरकार के सभी अधिकार अपने हाथ में लेने का अधिकार सौप दिया।
राज्यों / प्रान्तों के लिए ज्यादा शक्तियों के पक्ष में दिए गए तर्क :-
- मद्रास के सदस्य के संतनम ने कहा केंद्र के पास आवश्यकता से ज्यादा जिम्मेदारियां होंगी तो वह प्रभावी ढंग से कम नहीं कर पायेगा । उसके कुछ दायित्व राज्यों को देने चाहिए।
- संतनम का तर्क था कि शक्तियों का वर्तमान विवरण राज्य को पंगु बना देगा क्योंकि भू-राजस्व को छोड़कर अधिकांश कर केंद्र सरकार के अधिकार में है। पैसे के अभाव में राज्यों में विकास परियोजनाएं नहीं चल सकती ।
- इन नेताओं ने पुरे प्रयास किए ताकि केंद्र एवं समवर्ती सूची में कम से कम विषय रखे जाएं।
राष्ट्रिय भाषा
- आजाद भारत में अनेकों भाषाएँ बोलने वाले लोग रहते थे इन सब की संस्कृति और मान्यताएं अलग थी।
- ऐसे में एक बड़े राष्ट्र का निर्माण करना बहुत मुश्किल था क्योंकि यह सभी लोग अलग अलग मान्यताओं और अलग अलग संस्कृतियों से जुड़े हुए थे और इनकी भाषाएँ अलग होने के कारण एक दुसरे को ठीक प्रकार से समझ भी नही सकते थे।
- संविधान सभा में इस बात पर तीखी बहस हुई की आखिर किस भाषा को देश की राष्ट्रभाषा बनाया जाए।
- शुरुआत में गाँधी का मानना था कि एक ऐसी भाषा को राष्ट्रभाषा बनाना उचित रहेगा जिसे देश का हर व्यक्ति आसानी से समझ सके ।
- इसी को देखते हुए गाँधी जी हिंदी और उर्दू के मेल से बनी हिन्दुस्तानी भाषा को देश की राष्ट्रभाषा बनाना चाहते थे क्योंकि भारतीय जनता के बहुत बड़े हिस्से द्वारा इस भाषा को बोला और समझा जाता था ।
- परन्तु जैसे – जैसे व्यवस्था आगे बढ़ी तो देश में बढ़ रहे सांप्रदायिक टकराव के कारण हिंदी और उर्दू एक दुसरे से दूर होती गई एक तरफ जहाँ हिंदी को संस्कृत से जोड़ने के प्रयास किए गए वहीं दूसरी तरफ उर्दू में फारसी शब्द जुड़ते गए जिस वजह से हिंदुस्तानी भाषा के स्वभाव में परिवर्तन आया।
हिंदी भाषा का समर्थन
- संयुक्त प्रान्त से निर्वाचित कांग्रेस के सदस्य आर. वी. धूलेकर ने हिंदी भाषा को राष्ट्रभाषा बनाने का बढ़-चढ़कर समर्थन किया।
- लगभग अगले 3 साल तक राष्ट्रभाषा का मसला संविधान सभा के लिए समस्या बना रहा।
- कई बार इस मसले को लेकर संविधान सभा में हंगामा भी हुआ।
- इसके बाद संविधान सभा की भाषा समिति ने अपनी रिपोर्ट पेश की।
- इसके अंतर्गत समिति ने कहा कि हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए हमें धीरे-धीरे आगे बढ़ना होगा।
- उन्होंने सुझाव दिया कि पहले 15 साल तक सभी सरकारी कामकाज अंग्रेजी भाषा में किया जाए।
- प्रत्येक प्रांत को अपने कार्यों के लिए एक क्षेत्रीय भाषा चुनने का अधिकार होगा।
- इस तरह राष्ट्रभाषा के मुद्दे को सुलझाया गया।
समानता का अधिकार
राज्य ने सभी धर्मो के प्रति समान व्यवहार की गारंटी देते हुए उन्हें कुछ अधिकार भी दिए जिसे मौलिक अधिकारों में रखा गया है :-
- धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार :- अनुच्छेद 25-28
- सांस्कृतिक व शैक्षिक अधिकार :- अनुच्छेद 29,30
- समानता के अधिकार :- अनुच्छेद 14,16,17
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