कक्षा 12 इतिहास अध्याय 11 के नोट्स हिंदी में
महात्मा गांधी और राष्ट्रीय आंदोलन notes
यहाँ हम कक्षा 12 इतिहास के 11th अध्याय “महात्मा गांधी और राष्ट्रीय आंदोलन” के नोट्स उपलब्ध करा रहे हैं। इस अध्याय में महात्मा गांधी और राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ी प्रमुख विशेषताओं का अध्ययन किया गया है।
ये नोट्स उन छात्रों के लिए उपयोगी सिद्ध होंगे जो इस वर्ष बोर्ड परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं। सरल और व्यवस्थित भाषा में तैयार की गई यह सामग्री अध्याय को तेजी से दोहराने और मुख्य बिंदुओं को याद रखने में मदद करेगी।
कक्षा 12 इतिहास अध्याय 11 के नोट्स हिंदी में, महात्मा गांधी और राष्ट्रीय आंदोलन notes

class 12 History chapter 11 notes in hindi
महात्मा गाँधी
- महात्मा गाँधी का पूरा नाम “मोहन दास करम चंद्र गांधी” था जिनका जन्म 2 अक्टूबर 1869 में पोरबंदर (गुजरात) में हुआ था।
- पिता का नाम था दीवान करम चंद्र और माता जी का नाम था पुतली बाई और इनकी पत्नी का नाम था कस्तूरबा गाँधी ।
- 1893 में गाँधी जी “दक्षिण अफ्रीका” गए तथा वहाँ काले गोरे के खिलाफ सत्याग्रह आन्दोलन चलाया जिसकी वजह से वो काफी प्रसिद्ध हो गए।
- 1915 में वो भारत वापस आए ।
- गुरु का नाम – “गोपाल कृष्ण गोखले” था उन्ही के कहने पर गाँधी जी ने भारत दर भ्रमण किया ।
- 1916 का बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय का उद्घाटन समारोह था जिसमे गाँधी जी को मुख्य अतिथि के रूप में बुलाया गया।
- इस समारोह में गाँधी जी ने गरीबों की बात की गाँधी जी ने कहा भारत के लिए आजादी तब तक संभव नही है जब तक की आप अपने को अलंकरणों से मुक्त न कर लें। उन्होंने कहा हमारी आजादी केवल किसानो के माध्यम से हो सकती है ।
- गाँधी जी अहिंसा के पुजारी थे।
- भारत आने के बाद गाँधी जी ने किसानो के लिए तथा अंग्रेजों के विरुद्ध कई सारे आंदोलन चलाए तथा गरीब किसानो के हितों की रक्षा की।
- तथा इस दौरान उन्होंने चम्पारण (1917), खेडा (1918), अहमदबाद (1918), इत्यादी जगहों की यात्रा किए तथा गरीबों की मदद किए।
रॉलट एक्ट
- रॉलट एक्ट को काला कानून भी कहा जाता है।
- यह 19 मार्च 1919 को भारत की ब्रिटिश सरकार द्वारा भारत में उभर रहे राष्ट्रिय आन्दोलन को कुचलने के उद्देश्य से निर्मित कानून था।
- यह एक ऐसा कानून बनाया था की इसके अन्दर ब्रिटिश सरकार को यह अधिकार दिया गया था की वह किसी भी भारतीय लोग को बिना मुकदमा चलाए जेल में बंद कर सकते थे।
- अगर कोई ब्रिटिश सरकार के खिलाफ कोई षडयन्त्र रचता है तो उन्हें कड़ी सजा दी जाएगी तथा बिना जांच के जेल में डाल दिया जायेगा।
- इस काले कानून में बिना दलील, बिना वकील, बिना अपील, कार्यवाही की जायेगी।
- 1914-18 के महान युद्ध के दौरा अंग्रेजों ने प्रेस पर पाबंदी लगा दी और बिना जांच के 2 साल के लिए कारावास की स्वीकृति दे दी थी ।
- इसके उत्तर में गाँधी जी ने देशभर में ‘रॉलेट एक्ट’ के विरुद्ध एक अभियान चलाया ।
रॉलेट सत्याग्रह और जलियांवाला बाग हत्याकांड
- गाँधी जी ने इस अन्यायपूर्ण कानून के विरूद्ध अहिंसात्मक ढंग से सत्याग्रह करने का निर्णय किया ।
- अतः 6 अप्रैल 1919 को हड़ताल का आयोजन किया गया।
- विभिन्न शहरों में रैली – जुलूसों का आयोजन किया गया। अंग्रेजों ने दमन नीति अपना कर राष्ट्रवादियों को बंदी बनाना प्रारम्भ कर दिया। गाँधी जी के दिल्ली में प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया गया और पंजाब जाते समय उनको कैद कर लिया गया।
- पंजाब में एक्ट का घोर विरोध हुआ । अमृतसर में घटनाक्रम इतनी तीव्रता से चला की 10 अप्रैल को पुलिस द्वारा शांतिपूर्ण जुलूस पर गोली चलाने के पश्चात् लोगों ने बैंकों, डाकखानों और रेलवे स्टेशन पर हमले कर दिए । मार्शल लॉ लागू करके जनरल दायर की नियक्ति की गई।
- बैसाखी के दिन 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग में एक सभा रखी गई, जिसमें कुछ नेता भाषण देने वाले थे। शहर में कर्फ्यू लगा हुआ था, फिर भी इसमें सैंकड़ों लोग ऐसे भी थे, जो बैसाखी के मौके पर परिवार के साथ मेला देखने और शहर घूमने आए थे और सभा की खबर सुनकर वहां जा पहुंचे थे। पंजाब के लोग अपने प्रिय नेता की गिरफ्तारी तथा सरकार की दमनकारी नीति के खिलाफ 13 अप्रैल, 1919 को बैसाखी मेले के अवसर पर जालियाँवाला बाग में एक विराट सम्मेलन का आयोजन कर विरोध प्रकट कर रहे थे जिसके कारण ही डायर ने निहत्थी जनता पर गोलियाँ चलवा दी। यह घटना जालियांवाला बाग हत्याकांड के नाम से जाना गया।
- इसके परिणामस्वरूप कई जगह पर हिंसात्मक घटनाएं हुई तथा गाँधी जी ने रॉलेट सत्याग्रह वापिस ले लिया । परन्तु इस सत्याग्रह ने गाँधी जी को एक सच्चा राष्ट्रिय नेता बना दिया।
- इस घटना के 21 साल बाद 1940 में उधम सिंह जी लंदन में जाकर डायर को गोली मर दिए थे।
असहयोग आन्दोलन :
असहयोग आंदोलन अंग्रेजों के अत्याचार के खिलाफ 1 अगस्त 1920 को गांधी जी द्वारा शुरू किया गया सत्याग्रह आंदोलन था।
असहयोग आन्दोलन के उद्देश्य :-
- यह अंग्रेजों द्वारा प्रस्तावित अन्यायपूर्ण कानूनों और कार्यों के विरोध में देशव्यापी अहिंसक आंदोलन था।
- इस आंदोलन में, यह स्पष्ट किया गया था कि स्वराज अंतिम उद्देश्य था।
कार्यक्रम :-
- विद्यार्थियों द्वारा स्कूल व कालेजों का बहिष्कार करना।
- शिक्षकों द्वारा त्यागपत्र देना।
- वकीलों द्वारा मुकदमे लड़ने से इंकार करना।
- प्रांतीय परिषदों के चुनाव का बहिष्कार।
- विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार।
- शराब की दुकानों की पिकेटिंग करना।
- श्रमिक वर्ग द्वारा हड़ताल करना।
- श्रमिकों, किसानो और अन्य लोगों द्वारा अपने हितों की रक्षा के लिए अपने हित के अनुसार तरीके अपनाना।
आन्दोलन की प्रगति तथा अंत:-
- असहयोग आन्दोलन के कार्यक्रम को जनता तक पहुंचने के लिए महात्मा गाँधी तथा मुस्लिम नेता, डॉक्टर, मौलाना अबुल कलाम आजाद तथा अली बंधुओं ने देश का भ्रमण किया।
- परिणाम स्वरूप शीघ्र ही ये आन्दोलन बल पकड़ लिया जनता ने सारी सरकारी विद्यालय का बहिष्कार कर दिया बीच सड़क के चौराहे पर विदेशी वस्त्रों की होली जलाई गई। इसी बीच उत्तर प्रदेश के चौरी चोर नामक स्थान पर उत्तेजित भीड़ ने एक पुलिस चौकी को आग लगा दी।
- इस हिंसात्मक घटना के कारण गाँधी जी ने असहयोग आन्दोलन को समाप्ति की घोषणा की।
असहयोग आन्दोलन का महत्व अथवा स्वतंत्र आन्दोलन में योगदान :-
- असहयोग आन्दोलन के कारण कांग्रेस ने सरकार से सीधे टक्कर ली।
- भारत के इतिहास में पहली बार जनता ने बढ़-चढ़ कर इस आन्दोलन में भाग लिया।
- 1857 के विद्रोह के पश्चात् पहली बार असहयोग आन्दोलन के फलस्वरूप ब्रिटिश राज की नींव हिल गई।
- असहयोग आन्दोलन में स्वदेशी का खूब प्रचार किया फलस्वरूप देश में उद्योग धंधे का विकास हुआ ।
- इसके अतिरिक्त इस आन्दोलन से भारतीय राष्ट्रवाद में महत्वपूर्ण परिवर्तन आया।
- इस आन्दोलन में किसानों, श्रमिकों और कारीगरों का आंदोलन बन चूका था।
- इस आंदोलन में गाँधी जी के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए उन्हें अपना ‘महात्मा’ कहने लगे।
महात्मा गांधी ने खुद को आम लोगों जैसा दिखाने के लिए क्या किया?
- सूती वस्त्र पहनना आरंभ कर दिए तथा सर मुंडवा लिए।
- उनका यह नया रूप तपस्या और संयम प्रतीक भी बना और ये ऐसी विशेषताएँ थीं जिससे सभी लोग गाँधी जी की गुणगान करते थे।
- गाँधी जी ने आम लोगो की तरह वस्त्र पहनना शुरू किया और उन्हीं लोगों के साथ रहने लगे, उनकी भाषा बोलने लगें थे।
- अन्य नेताओं की तरह वे सामान्य जन समूह से अलग नही खड़े होते थे बल्कि वे उनसे सहानुभूति रखते तथा उनसे घनिष्ठ संबंध भी स्थित कर लेते थे।
- गाँधी जी लोगो के बीच एक साधारण धोती में जाते थे।
- इस बीच प्रत्येक दिन का कुछ हिस्सा वे चरखा चलाने में बिताते थे। चरखे के साथ महात्मा गाँधी भारतीय राष्ट्रवाद की सर्वाधिक स्थायी पहचान बन गए।
- सूत कताई के कार्य ने गाँधी जी को पारम्परिक जाति व्यवस्था में प्रचलित मानसिक श्रम और शारीरिक श्रम की दीवार को तोड़ने में मदद की।
किसान महात्मा गाँधी को किस तरह देखते थे ?
- “गाँधी बाबा”, गाँधी महाराज”, “महात्मा” जैसे अलग-अलग नामों से ज्ञात गाँधी जी भारतीय किसान के लिए एक उद्धारक के समान थे जो उनकी हमेशा सहायता करते थे चाहे वो कर हो या कुछ और ।
- गरीबों विशेषकर किसानों के बीच गाँधी जी की अपील को उनकी जीवन शैली और उनके द्वारा धोती तथा चरखा जैसे प्रतीकों के विवेकपूर्ण प्रयोग से बहुत बल मिला ।
- गाँधी जी जहाँ भी गए वहीं उनकी चमत्कारिक शक्तियों की अफवाहें फैल गई। कुछ स्थानों पर यह कहा गया की उन्हें राजा द्वारा किसानो के दुःख तकलीफों में सुधार के लिए भेजा गया है।
- कुछ अन्य स्थानों पर यह दावा किया गया की गाँधी जी की शक्ति अंग्रेज बादशाह से उत्कृष्ट है और उनके आने से औपनिवेशिक शासक जिले से भाग जायेंगे ।
- गांधी जी का विरोध करने वालों के लिए भयंकर परिणाम की बात बताती कहानियां भी थी … इस तरह की अफवाहें फैली की गाँधी जी की आलोचना करने वाले गाँव के लोगो को घोर समस्या आई और उनकी फसल चौपट हो गई।
चरखे को राष्ट्रवाद का प्रतीक क्यों चुना गया ?
- चरखे को राष्ट्रवाद का प्रतीक चुनने का मुख्य कारण चरखे द्वारा गरीबों को पूरक आमदनी प्रदान करना तथा उन्हें स्वावलम्बी बनाना था इसके द्वारा बुना गया खद्दर स्वदेशी कपड़े का उत्तम उदाहरण था जिसका प्रयोग विदेशी कपड़े के बहिष्कार के साथ किया गया ।
- गाँधी जी के अनुसार खद्दर मशीनरी को नष्ट करने के स्थान पर इसके प्रयोग को नियमित करता है और इसके विकास को नियमित करता था।
- गाँधी जी के अनुसार चरखा मशीनरी का प्रयोग सबसे अधिक गरीब लोगो के लिए उनकी अपनी झोपड़ियों में करता है तथा पहिया अपने आप में ही मशीनरी का एक उत्कृष्ट नमूना है
- गाँधी जी ने कहा कि “मै धन का केन्द्रीयकरण कुछ ही लोगों के हाथों में नहीं बल्कि सभी के हाथों में करना चाहता हूँ।
- उपर्युक्त कारणों से चरखे को राष्ट्रवाद का प्रतीक चुना गया। गाँधी जी स्वयं प्रत्येक दिन का कुछ भाग चरखा चलाने में व्यतीत करते थे। उन्होंने अन्य नेताओं या राष्ट्रवादियों को भी ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित किया।
असहयोग आन्दोलन के बाद
- असहयोग आन्दोलन के वजह से हजारों भारतीयों को जेल में ठूंस दिया गया। खुद गाँधी जी को मार्च 1922 में राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया।
- गाँधी जी को 6 साल की सजा सुनाई गई। परन्तु जज ब्रूमफिल्ड ने कहा कि ‘अगर भारत में घट रही घटनाओं की वजह से सरकार के दंड के इन सालों में कमी और आपको स्वतंत्र करना संभव हुआ, तो इससे मुझसे अधिक कोई खुश नही होगा।
- फरवरी 1924 में गाँधी जी जेल से रिहा हो गए और अब उन्होंने अपना ध्यान घर में बुने कपड़े (खादी) को उत्साहित करने और छुआ-छूत को खत्म करने पर लगाया ।
- गाँधी जी जितने राजनीतिक थे उतने ही वे समाज सुधारक भी थे।
- उनका मानना था कि आजादी के योग्य बनने के लिए भारतियों को बाल विवाह तथा
- छुआ-छूत जैसी सामाजिक बुराइयों से स्वतंत्र होना पड़ेगा।
- हिन्दू मुस्लिम एकता पर बल देना होगा।
साइमन कमीशन :-
- साइमन कमीशन ने कुल 2 बार भारत का दौरा किया था। पहली बार वह फरवरी-मार्च 1928 में भारत आया था, जबकि दूसरी बार वह अक्टूबर 1928 में भारत आया था। साइमन कमीशन ने मई 1930 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की थी और यह रिपोर्ट 27 मई, 1930 को ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रकाशित की गई थी।
- भारत के राज्य सचिव लॉर्ड बर्किनहेड ने 8 नवंबर, 1927 को सर जॉन साइमन की अध्यक्षता में एक संवैधानिक आयोग का गठन किया था। इस आयोग में कुल 7 सदस्य थे और ये सभी सातों सदस्य अंग्रेज थे।
साइमन कमीशन ने अपनी रिपोर्ट में यह कहा था कि :-
- भारत में उच्च न्यायालय को भारत सरकार के अधीन रखा जाना चाहिए।
- इसके अलावा, प्रांतों में उत्तरदाई शासन लागू करने की प्रक्रिया आरंभ करनी चाहिए।
- सिंध और उड़ीसा को नए प्रांतों के रूप में स्थापित किया जाना चाहिए।
- नेहरु जी ने रिपोर्ट की शर्तों को स्वीकार नहीं किया।
- इसी रिपोर्ट पर विचार विमर्श करने के लिए तथा भारत की संवैधानिक समस्या का समाधान निकालने के लिए ही, लंदन में तीन बार गोलमेज सम्मेलनों का आयोजन किया गया था। लेकिन कांग्रेस ने सिर्फ दूसरे गोलमेज सम्मेलन में ही भाग लिया था।
- यह कमीशन जहाँ भी गया वहीं इसका स्वागत काली झंडियों से किया गया।
- जगह – जगह पर “साइमन कमीशन वापस जाओ” के नारे लगाए गए।
- लाहौर में इस कमीशन का विरोध करने के कारण लाला लाजपत राय पर लाठियां बरसाई गई।
- जिसके कारण वो शहीद हो गए।
पूर्ण स्वराज दिवस
- 26 जनवरी 1930 (एक दिन जिसे कांग्रेस पार्टी ने भारतीयों से ‘स्वतंत्रता दिवस’ के रूप में मनाने का आग्रह किया था) को एक सार्वजनिक घोषणा की गई थी। 31 दिसंबर, 1929 को, नेहरू जी ने रावी नदी के तट पर तिरंगा फहराया और “पूर्ण स्वराज” या पूरा स्वराज्य की मांग की, और स्वतंत्रता के लिए निर्धारित तिथि 26 जनवरी, 1930 थी।
- 26 जनवरी 1930 को विभिन्न जगहों पर राष्ट्रिय ध्वज फहराकर तथा देशभक्ति के गीत गाकर ‘स्वतंत्रता दिवस’ मनाया गया।
- गाँधी जी ने सुझाव दिया की नगाड़े पीटकर राष्ट्रीय ध्वज को फहराकर समारोह का आरंभ होगा।
- दिन का शेष भाग किसी रचनात्मक कार्य में चाहे वह सूत कटाई हो या अछूतों की सेवा या हिंदुओ तथा मुसलमानों का पुनर्मिलन हो, ये सभी एक साथ करने में व्यतीत होगा।
दाण्डी यात्रा (कारण जिसकी वजह से आन्दोलन शुरू हुआ)
- ब्रिटिश ने एक ऐसे कानून का निर्माण कर दिया था जिसमें नामक के उत्पादन एवं विक्रय पर राज्य को एकाधिकार दे दिया था।
- जिससे नमक की कीमतें आसमान छूने लगी ।
- ब्रिटिश सरकार ने नमक के उत्पादन पर बैन लगा दिया था
- हर घर की आवश्यकता होती है नमक परन्तु इसके बावजूद उन्हें घरेलू इस्तेमाल के लिए भी नामक बनाने से रोका गया तथा इस प्रकार उन्हें दुकानों से ज्यादा दाम पर नमक खरीदने के लिए विवश किया गया।
- नमक कानून को तोड़ने के लिए गाँधी जी द्वारा एक यात्रा का नेतृत्व किया गया जिसे ‘दांडी यात्रा’ कहा जाता है।
- यद्यपि गाँधी जी ने अपनी ‘नमक यात्रा’ की पूर्व सुचना वाइसराय लार्ड इर्विन को दे दी थी परन्तु इर्विन उनकी इस कार्यवाही के महत्त्व को न जान सके।
- 12 मार्च 1930 को गाँधी जी ने साबरमती में अपने आश्रम से समुद्र की तरफ चलना आरंभ किया।
- तीन हफ्तों के पश्चात् 6 अप्रैल 1930 ई को वे अपने गंतव्य स्थान पर पहुंचे।
- वहाँ उन्होंने मुट्ठी भर नामक बनाकर खुद को कानून की नजर में मुजरिम बना दिया।
आन्दोलन इतना बड़ा क्यों हुआ
- सभी भारतियों से अनुरोध किया गया की वो इस आन्दोलन में भाग ले तथा ब्रिटिश सरकार के द्वारा लागू किए गए कानून का विरोध करे।
- गाँधी जी ने सभी भारतीय वर्गों से अनुरोध किया कि औपनिवेशिक शासन के खिलाफ अपना असंतोष जाहीर करें।
- इस आन्दोलन में भारतियों ने बढ़ चढ़ के हिस्सा लिया जैसे वो असहयोग आन्दोलन में लिए थे ।
- किसानो ने वन्य कानूनों को अस्वीकार किया (जिसके वे और उनके मवेशी उन वनों में नहीं जा सकते थे जहाँ एक समय वे बिना रोक टोक के घुमाते थे)
- कुछ फैक्ट्री श्रमिक हड़ताल पर चले गए, वकीलों ने अंग्रेजी आदालतों का बहिष्कार कर दिया |
- विद्यार्थियों ने सरकारी शिक्षा संस्थाओं में पढ़ने से मना कर दिया ।
- एक रिपोर्ट के अनुसार गाँधी जी दांडी यात्रा कर दौरान रास्ते में आए सभी गाँवों को सबको संबोधित किया चाहे वो गरीब हो या अमीर ।
- गाँधी जी ने कहाँ केवल नमक कर अथवा अन्य करों के समाप्त हो जाने से आपको स्वराज नही प्राप्त हो जायेगा ।
- स्वराज के लिए हिन्दू, मुसलमान, सिख तथा पारसी, सबको एकजुट होना पड़ेगा।
- नामक सत्याग्रह के सिलसिले में तकरीबन 60,000 लोगों को गिरफ्तार किया गया । गिरफ्तार होने वालों में गाँधी जी भी शामिल थे।
नमक आन्दोलन के विशिष्टता के तीन कारण :
- इस यात्रा को यूरोप एवं अमेरिकी प्रेस द्वारा व्यापक कवरेज दी गई।
- यह वह आन्दोलन था जिसमे सर्वप्रथम राष्ट्रिय स्तर पर स्त्रियों ने बढ़ चढ़ कर भाग लिया । (समाजवादी कार्यकर्ता कमलादेवी चट्टोपाध्याय का पूर्ण समर्थन)
- तीसरा और शायद सबसे महत्त्वपूर्ण कारण यह था की नमक यात्रा के करण ही अंग्रेजों को यह अनुभव हुआ था की अब उनका शासन बहुत समय तक नहीं टिक सकेगा।
गाँधी ईरविन समझौता क्या था ?
- गाँधी – ईरविन समझौता 5 मार्च 1931 को हुआ।
- इसके अनुसार:-
- गाँधी जी ने लंदन में होने वाले दुसरे गोल मेज सम्मलेन में भाग लेना स्वीकार कर लिया।
- बदले में सरकार राजनीतिक कैदियों को रिहा करने पर सहमत हो गई।
- तटीय प्रदेशो में लोगो को नमक बनाने के अनुमति दे दी गई।
गोल मेज सम्मलेन तथा उसका नतीजा :-
- ब्रिटिश सरकार ने लंदन में गोल मेज सम्मलनो का आयोजन शुरू किया। पहला गोल मेज सम्मलेन नवम्बर 1930 में आयोजित किया गया जिसमें देश के प्रमुख नेता शामिल नही हुए । इसी कारण अंततः यह बैठक निरर्थक साबित हुई। जनवरी 1931 में गाँधी जी को जेल से रिहा किया गया।
- अगले ही महीने वायसराय के साथ उनकी कई लंबी बैठके हुई। इन्ही बैठकों के बाद “गाँधी-इरविन समझौते” पर सहमती बनी, जिसकी शर्तों में सविनय अवज्ञा आन्दोलन को वापस लेना, सारे कैदियों की रिहाई और तटीय इलाकों में नामक उत्पादन की अनुमति देना शामिल था।
- गाँधी जी को इस संभावित लक्ष्य की प्राप्ति के लिए केवल वार्ताओं का आश्वासन मिला था। दूसरा गोल मेज सम्मलेन 1931 के आखिर में लन्दन में आयोजीत हुआ। उसमे गाँधी जी कांग्रेस का नेतृत्व कर रहे थे।
- मुस्लिम लीग का कहना था की वह मुस्लिम अल्पसंख्यकों के हित में काम करती है। राजे रजवाड़ों का दावा था की कांग्रेस का उनके नियंत्रण वाले भूभाग पर कोई अधिकार नहीं है। तीसरी चुनौती तेज – तर्रार वकील और विचारक बी. आर. अम्बेडकर की तरफ से थी जिनका कहना था की गाँधी जी और कांग्रेस पार्टी निचली जातियों का प्रतिनिधित्व नही करते।
- लंदन में हुआ यह सम्मेलन किसी नतीजे पर नहीं पंहुच सका इसलिए गाँधी जी को खाली हाथ लौटना पडा । भारत लौटने पर उन्होंने सविनय अवज्ञा आन्दोलन शुरू कर दिया।
क्रिप्स मिशन भारत कब आया ?
- द्वितीय विश्व युद्ध चल रहा था। ऐसी स्थिति में भारतीयों का समर्थन प्राप्त करने के लिए मार्च 1942 में सर स्टैफोर्ड क्रिप्स की अध्यक्षता में एक मिशन भारत भेजा गया था।
- यह मिशन भारतीय राजव्यवस्था में कुछ संवैधानिक सुधार करने के प्रस्ताव लेकर भारत आया था।
- क्रिप्स मिशन मार्च 1942 में भारत आया।
- तथा क्रिप्स मिशन की वार्ता इसलिए भंग कर दी गई थी क्योकि अंग्रेज सरकार युद्ध के बाद भारत को स्वाधीनता का वचन देने को तैयार नहीं थी।
- क्रिप्स ने कांग्रेस का प्रस्ताव भी ठुकरा दिया की युद्ध के बाद एक राष्ट्रिय सरकार बनाई जाए।
भारत छोड़ों आन्दोलन :-
- भारत छोड़ो आन्दोलन 1942 ई. में चलाया गया इस आन्दोलन का नेतृत्व गाँधी जी ने किया।
- कांग्रेस ने 9 अगस्त 1942 को यह आन्दोलन चलाने का प्रयास किया और अंग्रेजो को भारत छोड़ने के लिए ललकारा ।
- सारा देश भारत छोड़ो के नारे से गूंज उठा अंग्रेजों ने इन नारो को दबाने के लिए बड़ी कठोरता से काम किया।
- प्रस्ताव पास होने के दुसरे ही दिन नेता को बंदी बना लिया गया सारी जनता भी भड़क गई। लोगो ने सरकारी दफ्तरों रेलवे स्टेशनों तथा डाक घरों को लूटना तथा जलाना आरम्भ कर दिया गया।
- सरकार ने अपनी नीति को और भी कठोर कर दिया और असंख्य लोगो को जेल में डाल दिया गया।
- सारा देश एक जेल खाने के समान दिखाई देने लगा इतने बड़े आन्दोलन के कारण ब्रिटिश सरकार की नींव हिल गई।
- भारत छोड़ो आन्दोलन सही मायने में एक जनांदोलन था जिसमें लाखों आम हिन्दुस्तानी सम्मिलित थे।
- इस आन्दोलन ने युवाओं को बड़ी तादाद में अपनी तरफ आकर्षित किया उन्होंने अपने कॉलेज छोड़कर जेल का मार्ग अपनाया।
- जून, 1944 में गाँधी जी को जेल से रिहा कर दिया गया, बाद में उन्होंने मतभेद को सुलझाने के लिए जिन्ना के साथ बैठक की।
- 1946 के आरंभ में प्रांतीय विधान मंडलों के लिए नए सिरे से चुनाव कराए गए। “सामान्य” श्रेणी में कांग्रेस को जबर्दस्त कामयाबी मिली। मुसलमानों के लिए आरक्षित सीटों पर मुस्लिम लीग को भारी बहुमत हासिल हुआ।
- 1946 की गर्मियों में कैबिनेट मिशन भारत आया।
- इस मिशन ने कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग को एक ऐसी संघीय व्यवस्था पर सहमत करने का प्रयत्न किया जिसमें भारत के अन्दर भिन्न-भिन्न प्रांतो को सीमित स्वायत्तता दी जा सकती थी।
- कैबिनेट मिशन का यह प्रयत्न भी असफल रहा। वार्ता टूट जाने के पश्चात् जिन्ना ने पाकिस्तान की स्थापना के लिए मुस्लिम लीग की मांग के समर्थन में एक “प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस” का अनुरोध किया।
- 16 अगस्त, 1946 को, कलकत्ता में दंगे भड़क उठे, बाद में बंगाल के अन्य हिस्सों, फिर बिहार, संयुक्त प्रान्त और पंजाब तक फैल गए। दंगों में दोनों समुदायों क नुकसान हुआ।
- फरवरी 1947 में, वायसराय लार्ड माउन्टबेटन ने वेवेल की जगह ली। उन्होंने वार्ताओं के एक आखिरी दौर का अनुरोध किया। जब सुलह के लिए उनका यह प्रयत्न भी असफल हो गया तो उन्होंने घोषणा कर दी कि ब्रिटिश भारत को स्वतंत्रता दे दी जाएगी, परन्तु उसका विभाजन भी होगा।
- आखिरकार 15 अगस्त 1947 को सत्ता भारत को हस्तांतरित हो गई।
आखिरी बहादुराना दिन
- महात्मा गाँधी 15 अगस्त 1947 को राजधानी में हो रहे उत्सवों में शामिल नही थे।
- वे उस समय कलकत्ता में थे लेकिन वहाँ भी वह किसी कार्यक्रम में भाग नहीं लिए थे न ही कहीं झंडा फहराया था
- उस दिन गाँधी जी 24 घंटे के उपवास पर थे। उन्होंने इतने दिन तक जिस आजादी के लिए संघर्ष किया था वह एक अकल्पनीय मूल्य पर उन्हें मिली थी । उनका देश विभाजित था हिन्दू-मुस्लमान एक दुसरे की गर्दन पर सवार थे
- एक जीवनी लेखक डी.जी. तेंदुलकर ने लिखा है की सितम्बर तथा अक्टूबर के दौरान गाँधी जी “पीड़ितों को सांत्वना देते हुए अस्पतालों तथा शरणार्थी शिविरों के चक्कर काट रहे थे।
- उन्होंने सिखों, हिन्दुओं और मुसलमानों से अतीत को भूलने और मित्रता, सहयोग और शांति का हाथ बढ़ने की अपील की।
- गाँधी जी तथा नेहरू के अनुरोध पर कांग्रेस ने “अल्पसंख्यकों के अधिकारों” पर एक प्रस्ताव पारित कर दिया । कांग्रेस ने “दो राष्ट्र सिद्धांत” को कभी मंजूर नही किया था ।
- कांग्रेस का विश्वास था की भारत एक लोकतान्त्रिक धर्म निरपेक्ष राष्ट्र होगा जहाँ सभी नागरिकों को सम्पूर्ण अधिकार प्राप्त होने और सबको समान माना जायेगा।
महात्मा गाँधी जी की मृत्यु
- गाँधी जी सीमा के दोनों तरफ के अल्पसंख्यकों को लेकर चिंतित थे और यथासंभव उनकी सुरक्षा को लेकर प्रयास भी कर रहे थे।
- गाँधी जी ने स्वतंत्रता तथा अखंड भारत के लिए जिंदगी भर युद्ध लड़ा। फिर भी जब देश का विभाजन हो गया तो उनकी यही इच्छा थी।
- की दोनों देश एक-दुसरे के साथ आदर और मित्रता के संबंध बनाए रखें।
- 30 जनवरी की शाम को गाँधी जी की दैनिक प्रार्थना सभा में नाथूराम गोडसे ने गोली मारकर हत्या कर दी थी
- नाथूराम गोडसे एक ब्राम्हण था जो की चरमपंथी हिन्दुत्ववादी अखबार का संपादक था, वह गाँधी जी को “मुसलमानों का खुशामदी” कहता था ।
- गाँधी जी की मृत्यु से चारों तरफ गहरे शोक की लहर दौड़ गई।
- सभी लोगो ने गाँधी जी की मृत्यु का शोक मनाया तथा श्रद्धांजलि अर्पित की।
- जॉर्ज ऑरवेल और एलबर्ट आइन्स्टीन जैसे मशहूर गैर भारतीय ने भी उनकी मौत पर हृदयस्पर्शी शब्दों में शोक सन्देश भेजे।
- टाइम पत्रिका ने उनके बलिदान की तुलना अब्राहम लिंकन के बलिदान से की।
गाँधी जी समझने के श्रोत
1. सार्वजानिक स्वर और निजी लेखन
- इसमें महात्मा गाँधी और उनके सहयोगियों व् प्रतिद्वंदियों दोनों के समकालीनों के लेखन और भाषण आते है, हमे इस बात को ध्यान में रखना चाहिए की कौन सी चीज जनता के लिए लिखा गया था और कौन सा व्यक्तिगत ।
- निजी लेखन में निजी सोच की झलक मिलती है
- गाँधी जी ‘हरिजन’ नामक अपने समाचार पत्र में उन खतों को प्रकाशित करते थे जो उन्हें लोगो से मिलते थे।
2. छवि गढ़ना (आत्मकथाएं)
- आत्मकथाएं भी हमे अतीत का विवरण देती है किन्तु यहाँ भी हमे यह ध्यान रखना चाहिए की हम आत्मकथाओं को किस प्रकार पढ़ते है और उनकी कैसे व्याख्या करते है।
- हमे यह स्मरण रखना चाहिये की ये आत्मकथाएं प्रायः स्मृति के आधार पर हमे यह स्मरण रखना चाहिये की ये आत्मकथाएं प्रायः स्मृति के आधार पर लिखी गई होती है उनसे हमे ज्ञात होता है की लिखने वाले को क्या याद रहा।
3. सरकारी रिपोर्ट
- इसमें सरकारी रिकार्ड्स पुलिस कर्मियों और अन्य अधिकारीयों द्वारा लिखे गए पत्र, गोपनीय रिपोर्ट सम्मिलित है जो अब अभिलेखगार में उपलब्ध है। सरकारी ब्योरे अपने कर्तव्य का पालन करते हुए एक विशेष उद्देश्य कार्यवाई कर सके।
- साधारणतया इस प्रकार के सरकारी ब्योरों अर्थात पुलिसकर्मियों तथा अन्य अधिकारीयों की रिपोर्ट गोपनीय होती है।
4. अखबारों से
- अखबारों में गाँधी जी की गतिविधियों का पूरा विवरण दिया जाता था उससे पता चलता है की जनसाधारण भारतीय गाँधी के विषय में क्या सोचते थे।
- उदाहरण:- असहयोग आन्दोलन के दौरान गाँधी जी को गाँधी बाबा, गाँधी महाराज के नामों से पुकारा गया। परन्तु यह बात ध्यान में रखनी चाहिए हर जगह के समाचार पत्र अलग अलग दृष्टि कोण के द्वारा लिखा जाता है। इसलिए किसी भी परिणाम पर पहुंचने के लिए विशेष अहमियत भी बरतनी चाहिए।
ncert Class 12 History Chapter 11 Notes in Hindi
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