Class 12 History Chapter 2 Notes in Hindi
राजा किसान और नगर
(Kings, Farmers and Towns)

यहाँ हम कक्षा 12 इतिहास के 2nd अध्याय “राजा किसान और नगर” के नोट्स उपलब्ध करा रहे हैं। इस अध्याय में राजा किसान और नगर का दौर से जुड़ी प्रमुख विशेषताओं का अध्ययन किया गया है।

ये नोट्स उन छात्रों के लिए उपयोगी सिद्ध होंगे जो इस वर्ष बोर्ड परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं। सरल और व्यवस्थित भाषा में तैयार की गई यह सामग्री अध्याय को तेजी से दोहराने और मुख्य बिंदुओं को याद रखने में मदद करेगी।

Class 12 History Chapter 2 Notes in Hindi, राजा किसान और नगर notes

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जनपद का अर्थ

जनपद का अर्थ एक ऐसा भूखंड है जहाँ कोई जन (लोग, कुल या जनजाति) अपना पाँव रखता है अथवा बस जाता है। इस शब्द का प्रयोग प्राकृत व संस्कृत दोनों में मिलता है।

जेम्स प्रिंसेप

  1. जेम्स प्रिंसेप ईस्ट इंडिया कंपनी के अधीन एक अधिकारी था ।
  2. उसने 1837 के दशक में ब्राह्मणी और खरोष्ठी लिपि को को पढ़ने में सफलता प्राप्त की जिसके परिणाम स्वरुप भारतीय इतिहास से संबंधित अनेक घटनाओं की जानकारी प्राप्त करना बड़ा आसान हो गया ।
  3. जेम्स प्रिंसेप को बहुत से अभिलेख ऐसे मिले जिनमें एक साथ दोनों ब्राह्मी और खरोष्ठी लिपि का प्रयोग किया गया था।
  4. इन लिपियों का उपयोग सबसे आरंभिक अभिलेखों और सिक्कों में किया गया है प्रिंसेप को यह जानकारी प्राप्त हुई थी अभिलेखों और सिक्कों पर पियदस्स(अशोक) अर्थात सुंदर मुखाकृति वाले राजा का नाम लिखा गया है।

ब्राह्मी लिपि

  1. आधुनिक भारतीय भाषाओं में प्रयुक्त लगभग सभी लिपियों का मूल ब्राह्मी लिपि है।
  2. ब्राह्मी लिपि का प्रयोग असोक के अभिलेखों में किया गया है
  3. जेम्स प्रिंसेप ने असोक कालीन ब्राह्मी लिपि का 1838 ई. में अर्थ निकाला।

मौर्य साम्राज्य

  1. मगध के विकास के साथ-साथ मौर्य साम्राज्य का उदय हुआ।
  2. मौर्य साम्राज्य के संस्थापक चंद्रगुप्त मौर्य (लगभग 321 ई.पू.) का शासन पश्चिमोत्तर में अफ़गानिस्तान और बलूचिस्तान तक फैला था।
  3. उनके पौत्र असोक ने जिन्हें आरंभिक भारत का सर्वप्रसिद्ध शासक माना जा. सकता है, कलिंग (आधुनिक उड़ीसा) पर विजय प्राप्त की।

मौर्य साम्राज्य की प्रशासन व्यवस्था

केंद्रीय प्रशासन

  1. केंद्रीय प्रशासन के मुख्य अंग राजा, मंत्री परिषद, तथा उच्च सरकारी अधिकारी आदि थे।
  2. राजा सर्वोपरि होता था।
  3. सभी नागरिक एवं सैनिक प्रशासन उसी की इच्छा अनुसार चलता थे।
  4. वह एक शानदार महल में बड़े ठाठ से रहते थे, परंतु वह प्रजा की भलाई को भी कभी नहीं भूलता थे।
  5. राजा को परामर्श देने के लिए अध्यक्ष, आमात्य, राजुक और प्रादेशिक जैसे अनेक अधिकारी होते थे।
  6. नियुक्ति के बाद भी धर्म महामत्त नाम के अधिकारी उनके कार्यों पर नजर रखते थे। ये सब अधिकारी बड़े चरित्रवान और ईमानदार होते थे।

प्रांतीय प्रशासन

इतने बड़े राज्य के कार्य को भली प्रकार से चलाने के लिए देश को निम्नलिखित चार प्रांतों में विभक्त किया गया था।

i.मध्य प्रांत – इसकी राजधानी पाटलिपुत्र थी। इस प्रांत का कार्य राजा स्वयं चलाता था।

ii.उत्तर पश्चिमी प्रांत- इसकी राजधानी तक्षशिला थी।

iii.पश्चिमी प्रांत – इसकी राजधानी उज्जैनी थी।

iv.दक्षिणी प्रांत – इसकी राजधानी स्वर्ण गिरी थी।

v.पूर्वी प्रांत – अशोक की कलिंग के युद्ध पश्चात यह प्रांत अस्तित्व में आए। इसकी राजधानी तोसाली थी।

मौर्य साम्राज्य का सैन्य शासन

  1. चंद्रगुप्त मौर्य के पास एक विशाल सेना थी।
  2. इसमें लगभग छह लाख पैदल; 30,000 घुड़सवार; 9000 हाथी और 8000 रथ थे।
  3. प्रत्येक हाथी पर प्राय चार व्यक्ति और रथ पर तीन व्यक्ति हुआ करते थे।
  4. इस प्रकार उसकी सेना में सैनिकों की संख्या 7 लाख के लगभग थी। इस समस्त सेना को नगद वेतन दिया जाता था ।
  5. मौर्य साम्राज्य के पाँच प्रमुख राजनीतिक केंद्र थे, राजधानी पाटलिपुत्र और चार प्रांतीय केंद्र-तक्षशिला, उज्जयिनी, तोसलि और सुवर्णगिरि।
  6. मेगस्थनीज़ ने सैनिक गतिविधियों के संचालन के लिए एक समिति और छः उपसमितियों का उल्लेख किया है।

पहली उपसमिति – इसका का काम नौसेना का संचालन करना था ।

दूसरी उपसमिति – यह यातायात और खान-पान का संचालन करती थी।

तीसरी उपसमिति – का काम पैदल सैनिकों का संचालन।

चौथी उपसमिति – का अश्वारोहियों का संचालन करना।

पाँचवीं उपसमिति – का रथारोहियों का संचालन करना।

छठी उपसमिति का काम हाथियों का संचालन करना था।

दूसरी समिति का दायित्व विभिन्न प्रकार का था:

  1. उपकरणों के ढोने के लिए बैलगाड़ियों की व्यवस्था करना।
  2. सैनिकों के लिए भोजन और जानवरों के लिए चारे की व्यवस्था करना।
  3. सैनिकों की देखभाल के लिए सेवकों और शिल्पकारों की नियुक्ति करना।

मौर्य साम्राज्य के जानकारी के स्रोत

(i) मेगास्थनीज की इंडिका : मेगास्थनीज यूनानी राजदूत था जो उस समय के लिए चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार में रहा। उसने चंद्रगुप्त मौर्य के विषय में अपनी पुस्तक इंडिका में बहुत कुछ लिखा है। इस पुस्तक से हमें मौर्य सम्राट, उसकी राजधानी, शासन प्रबंध, सैनिक संगठन तथा देश की सामाजिक दशा के विषय में महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है।

(ii) कौटिल्य का अर्थशास्त्र : कौटिल्य चंद्रगुप्त मौर्य का प्रधानमंत्री था जिसने अपने सुप्रसिद्ध ग्रंथ अर्थशास्त्र में चंद्रगुप्त, राजा के आदर्शों, राजा के मंत्रियों, प्रांतीय तथा नागरिक प्रशासन, गुप्तचरो, प्रजा की आर्थिक दशा, वित्तीय प्रबंध, दंड व्यवस्था एवं शासन प्रबंध के विषय में महत्वपूर्ण जानकारी दी है।

(iii) विशाखदत्त का मुद्राराक्षस: विशाखदत्त ने अपने सुप्रसिद्ध नाटक मुद्राराक्षस में चंद्रगुप्त मौर्य, कौटिल्य के साथ उसके संबंधों तथा नद वंश के नाश के विषय में बहुत कुछ लिखा है। इस नाटक से हमें तत्कालीन राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक अवस्था का भी जान प्राप्त होता है।

(iv) जैन और बौद्ध धर्म के ग्रंथ: जैन और बौद्ध ग्रंथों जैसे दीप वंश, महा वंश, कल्पसूत्र आदि से मौर्य काल के विषय में उपयोगी जान की प्राप्ति होती है।

(v) अभिलेख तथा कलाकृतियां:- शिलाओं, गुफाओं और स्तंभों पर खुदवाए गए अभिलेख मौर्य काल विशेषकर अशोक के राज्यकाल के विषय में जानकारी देते हैं।

(vi) सिक्के :- मौर्य राजाओं के सिक्कों से भी इतिहास के बारे में जानकारी मिलती है मौर्य काल के सिक्कों में अनेक राजाओं के चित्र मिलते हैं।

मौर्य प्रशासन की विशेषताएं

i.राजधानी और उसके आसपास के क्षेत्रों तथा प्रांतीय केंद्र में प्रशासनिक नियंत्रण सबसे मजबूत था

ii. साम्राज्य के अस्तित्व के लिए भूमि और नदी मार्ग दोनों के साथ संचार अच्छी तरह से विकसित किया गया था

iii. इन मार्गों के साथ यात्रियोंके खान-पान और सुरक्षा की व्यवस्था की गई थी।

iv. कुशल सैन्य प्रशासन ।

v. अशोक ने साम्राज्य को नियंत्रण में रखने के लिए धम्म का प्रचार किया।

vi. पूरे साम्राज्य को बेहतर नियंत्रण के लिए पांच प्रमुख राजनीतिक केंद्रों में विभाजित किया गया था

अशोक

  1. चंद्रगुप्त के बाद मौर्य साम्राज्य में सबसे प्रभावशाली राजा अशोक बनकर उभरे।
  2. इनके पिता का नाम बिंदुसार और माता का नाम सुभद्रागी था
  3. अशोक के शासनकाल के दौरान मगध साम्राज्य का विस्तार बढ़ा।
  4. वह सबसे पराक्रमी शासकों में से एक थे।
  5. उन्होंने मगध के शासन को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।
  6. कलिंग का युद्ध का अशोक का अंतिम युद्ध साबित हुआ क्योंकि इसके बाद उन्होंने युद्ध करना छोड़ दिया।

अशोक का धम्म

  1. अशोक के द्वारा बताए गए कुछ नैतिक सिद्धांतों और सामाजिक नियमों के संकलन को धम्म कहा जाता है।
  2. धम्म में सभी धर्मो के अच्छी बातों का सार था।
  3. अशोक के धम्म में बड़ों का आदर, संन्यासियों और ब्राह्मणों के प्रति उदारता, सेवक तथा दासों के प्रति उदार व्यवहार तथा दूसरे सम्प्रदायों के प्रति आदर की भावना सम्मिलित है।

कलिंग का युद्ध 261 ईसा पूर्व

  1. कलिंग वर्तमान के उड़ीसा राज्य में स्थित था।
  2. इस क्षेत्र को जीतकर अशोक अपने राज्य को पूरे भारत में फैलाना चाहते थे।
  3. इसकी वजह से उन्हें दक्षिण भारत और दक्षिण पूर्व भारत में जाने का मार्ग मिलता।
  4. इसी वजह से अशोक ने इस क्षेत्र पर आक्रमण किया
  5. इस युद्ध में अशोक को विजय प्राप्त हुई पर इतने सारे लोगों की मृत्यु होता देख अशोक का मन परिवर्तित हो गया।
  6. उन्हें ऐसा लगा कि इतने सारे लोगों की मृत्यु केवल उनके कारण हुई है।
  7. उस युद्ध के बाद से अशोक ने युद्ध करना छोड़ दिया और इसे अपने जीवन की आखरी विजय बताया।
  8. इस युद्ध के बाद अशोक समाज कल्याण के कार्यों में लग गए और उन्होंने धम्म की रचना की।

मगध एक शक्तिशाली साम्राज्य

छठी से चौथी शताब्दी ई० पूर्व में मगध सबसे शक्तिशाली महाजनपद बन गया।
इस के निम्न कारण है-

(ⅰ) मगध के क्षेत्रों में खेती की उपज खासतौर अच्छी होती थी।

(ii) लोहे की खदाने भी आसानी से उपलब्ध थी जिसके कारण उपकरण और हथियार बनाना सरल होता था।

(ii) जंगली क्षेत्रों में हाथी उपलब्ध थे जो सेना महत्वपूर्ण अंग थे। जो एक महत्वपूर्ण अंग थे।

(iv) साथ ही गंगा और इसकी उपनदियों से आवागमन सस्ता व सुलभ होता था।

(v)मगध की की महत्वता का कारण विभिन्न शासकों की नीतियों को भी बताया गया गया है। बिंदुसार, अजातशत्रु और महापद्‌मानंद जैसे प्रसि‌द्ध राजा अत्यंत महत्वाकांक्षी शासक थे।

राजगाह

  1. प्रारंभ में, राजगाह (आधुनिक बिहार के राजगीर का प्राकृत नाम) मगध की राजधानी थी।
  2. इस शब्द का अर्थ है ‘राजाओं का घर’।
  3. पहाड़ियों के बीच बसा राजगाह एक किलेबंद शहर था।
  4. बाद में चौथी शताब्दी ई.पू. में पाटलिपुत्र को राजधानी बनाया गया, जिसे अब पटना कहा जाता है जिसकी गंगा के रास्ते आवागमन के मार्ग पर महत्वपूर्ण अवस्थिति थी।

छठी शताब्दी से आरंभिक शताब्दी तक उपज बढ़ाने के तरीके

  1. उपज बढ़ाने का एक तरीका हल का प्रचलन था। जो की छठी शताब्दी ईसा पूर्व से ही गंगा और कावेरी की घाटियों के उर्वर क्षेत्र में फैल गया ।
  2. भारी वर्षा वाले क्षेत्रों में लोहे के फॉल वाले हेलो के माध्यम से उर्वर भूमि की जुताई की जाने लगी ।
  3. गंगा की घाटी में धान की रोपाई की वजह से उपज में भारी वृ‌द्धि होने लगी ।
  4. जो किसान उपमहा‌द्वीप के पूर्वोत्तर और मध्य व पर्वतीय क्षेत्रों में रहते थे, उन्होंने खेती के लिए कुदाल का उपयोग कि आप जो ऐसे ही लाकर के लिए कहीं अधिक उपयोगी था ।
  5. उपज बढ़ाने का एक और तरीका को तालाबों और कहीं-कहीं नहरों के माध्यम से सिंचाई करना था।
  6. व्यक्तिगत लोगों और कृषक समुदाय ने मिलकर सिंचाई के साधन निर्मित किए ।

अभिलेख

  1. अभिलेख उन्हें कहते हैं जो पत्थर, धातु या मिट्टी के बर्तन जैसी कठोर सतह पर खुदे होते हैं।
  2. अभिलेखों में उन लोगों की उपलब्धियाँ, क्रियाकलाप या विचार लिखे जाते हैं जो उन्हें बनवाते हैं।
  3. इनमें राजाओं के क्रियाकलाप तथा महिलाओं और पुरुषों द्वारा धार्मिक संस्थाओं को दिए गए दान का ब्योरा होता है।
  4. यानी अभिलेख एक प्रकार से स्थायी प्रमाण होते हैं।
  5. कई अभिलेखों में इनके निर्माण की तिथि भी खुदी होती है जिन पर तिथि नहीं मिलती है, उनका काल निर्धारण आमतौर पर पुरालिपि अथवा लेखन शैली के आधार पर काफ़ी सुस्पष्टता से किया जा सकता है।

अभिलेख साक्ष्यों की सीमाएँ

  1. अक्षरों का हल्के ढंग से उत्कीर्ण होना
  2. अभिलेखों के टूट जाने से कुछ अक्षरों का लुप्त हो जाना
  3. वास्तविक अर्थ न निकाल पाना
  4. भाषा समझ न आना
  5. दैनिक प्रक्रियाओं व रोजमर्रा की जिंदगी के सुख-दुख का उल्लेख अभिलेखों में न मिलना।

संगम साहित्य का महत्त्व

(i) यह साहित्य प्राचीन तमिल समाज की सांस्कृतिक, साहित्यिक, धार्मिक, राजनीतिक और ऐतिहासिक अध्ययन के लिए बेहद उपयोगी हैं।

(ii) इसने बाद के साहित्यिक रूढ़ियों को बहुत प्रभावित किया है। दक्षिण भारत के प्राचीन इतिहास के लिये संगम साहित्य की उपयोगिता अनन्य है। इस साहित्य में उस समय के तीन राजवंशों का उल्लेख मिलता है चोल, चेर और पाण्ड्य।

(iii) संगम साहित्य प्रेम, युद्ध, शासन, व्यापार और शोक जैसे भावनात्मक और भौतिक विषयों से संबंधित है।

(iv) संगम साहित्य प्राचीन तमिल देश के प्रारंभिक इतिहास के दस्तावेजीकरण के लिए उपयोग किए जाने वाले मुख्य स्रोतों में से एक है। प्राचीन संगम की कविताओं में कई राजाओं और राजकुमारों का उल्लेख है, जिनमें से कुछ के अस्तित्व की पुष्टि पुरातात्विक साक्ष्य के माध्यम से की गई है।

छठी शताब्दी ईसा पूर्व से छठी शताब्दी ई. तक के सिक्कों की विशेषताएं

1. सिक्के विनिमय के साधन के रूप में प्रचलित हुए।

2. छठी शताब्दी ईसा पूर्व से चाँदी और तांबे के आहत सिक्के ढाले और प्रयोग में लाए गए ।

3. सिक्के हमें व्यापारिक तंत्र के बारे में बताते हैं।

4. आहत सिक्कों पर बने प्रतीकों से राजवंशों की पहचान होती है।

5. व्यापारियों, धनपतियों द्वारा भी सिक्के जारी किए गए थे।

6. राजाओं के नाम और उनकी प्रतिमा के साथ सबसे पहले सिक्के हिन्द-यूनानी शासको द्वारा जारी किए गए।

7. पहले सोने के सिक्के कुषाणों द्वारा जारी किए गए थे। वे रोमन सिक्कों के समान थे।

8. रोमन सिक्के दक्षिण भारत के उन स्थानों पर पाए गए हैं जिनके साथ उनके व्यापारिक संबंध थे।

9. यौधेयों शासकों ने तांबे के सिक्के जारी किए जो व्यापार में उनकी रुचि की ओर इशारा करते हैं।

10. गुप्त शासको ने शुद्धता के साथ सोने के सिक्के जारी किए और इससे लंबी दूरी के व्यापार में आसानी हुई।

कुषाण शासकों की उच्च स्थिति का विवरण

i. शिलालेख, सिक्के और मूर्तियों का उपयोग करके ।

ii. कुषाण शासकों की विशाल प्रतिमाएं स्थापित की गई हैं-उत्तर प्रदेश में मथुरा और अफगानिस्तान के एक देवस्थान | पर मूर्तियां मिली है।

iii. इन मूर्तियों के जरिए कुषाण अपने को देवपुत्र प्रस्तुत करते थे ।

iv. अपने नाम के आगे देवपुत्र की उपाधि भी लगाई थी ।

v. सिक्को और मूर्तियों से कुषान शासको के राजधर्म का पता चलता है।

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