भौगोलिक परिपेक्ष्य में चयनित कुछ मुद्दे एवं समस्याएँ Notes
Class 12 Geography Chapter 9 Notes in Hindi
यहाँ हम कक्षा 12 भूगोल Book 2 के 9th अध्याय “भौगोलिक परिपेक्ष्य में चयनित कुछ मुद्दे एवं समस्याएँ” के नोट्स उपलब्ध करा रहे हैं। इस अध्याय में भौगोलिक परिपेक्ष्य में चयनित कुछ मुद्दे एवं समस्याएँ से जुड़ी प्रमुख विशेषताओं का अध्ययन किया गया है।
ये नोट्स उन छात्रों के लिए उपयोगी सिद्ध होंगे जो इस वर्ष बोर्ड परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं। सरल और व्यवस्थित भाषा में तैयार की गई यह सामग्री अध्याय को तेजी से दोहराने और मुख्य बिंदुओं को याद रखने में मदद करेगी।
भौगोलिक परिपेक्ष्य में चयनित कुछ मुद्दे एवं समस्याएँ Notes, Class 12 Geography Chapter 9 Notes in Hindi

Class 12 Geography Chapter 9 Notes in Hindi
पर्यावरण प्रदूषण
पर्यावरण प्रदूषण मानव गतिविधियों के अपशिष्ट उत्पादों से पदार्थों और ऊर्जा की रिहाई है। यह विभिन्न प्रकार का होता है। इस प्रकार, उन्हें मध्यम के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है जिसके माध्यम से प्रदूषकों को परिवहन और विसरित किया जाता है।
प्रदूषण के प्रकार :-
- जल प्रदूषण
- वायु प्रदुषण
- ध्वनि प्रदूषण
- भूमि प्रदुषण
जल प्रदूषण
जल प्रदूषण का अर्थ है पानी में अवांछित तथा घातक तत्वों की उपस्तिथि से पानी का दूषित हो जाना, जिससे कि वह पीने योग्य नहीं रहता।
जल प्रदूषण के स्रोत
जल प्रदूषण के मुख्य रूप से दो स्त्रोत है :-
प्राकृतिक
प्राकृतिक रूप से भूस्खलन, पौधों एवं जानवरों का क्षय और अपघटन आदि जल को प्रदूषित करते हैं।
मानव निर्मित
मानव की अनेकों गतिविधियां उदाहरण के लिए औद्योगिक गतिविधि, व सांस्कृतिक गतिविधियां जल प्रदूषण के लिए उत्तरदाई है।
गंगा और यमुना नदियों में प्रदूषण के स्रोत
- गंगा और यमुना नदी भारत की कुछ मुख्य एवं सबसे प्रदूषित नदियों में से एक है
- नदियों में प्रदूषण का मुख्य कारण औद्योगिक अपशिष्ट, घरेलू अपशिष्ट एवं सीवेज बहाव है।
गंगा नदी
- गंगा नदी उत्तर प्रदेश, बिहार वर्तमान दौर में कानपुर एवं वाराणसी के आसपास के एवं पश्चिम बंगाल आदि राज्यों से होकर बहती है
- क्षेत्रों में गंगा नदी सबसे अधिक प्रदूषित है।
यमुना नदी
- यमुना नदी मुख्य रूप से दिल्ली एवं उत्तर प्रदेश से होकर बहती है।
- यह नदी मुख्य रूप से दिल्ली, मथुरा एवं आगरा आदि क्षेत्रों में सबसे अधिक प्रदूषित हैं।
गंगा एवं यमुना नदी के प्रदूषित होने के मुख्य कारण
- इन नदियों में बड़ी मात्रा में औद्योगिक अपशिष्टों जैसे कि अपशिष्ट जल, जहरीली गैसे, रासायनिक अवशेष, धूल, धुआं आदि बहाया जाता है जिस वजह से इन नदियों के प्रदूषण में वृद्धि दर्ज की गई है।
- कृषि के अंदर उपयोग किए जाने वाले विभिन्न प्रकार के रसायनों जैसे कि उर्वरक, कीटनाशक आदि के अधिक प्रयोग के कारण भूजल प्रदूषित होता है साथ ही साथ सतही जल में नाइट्रेट की मात्रा बढ़ती है।
- इसके अलावा सांस्कृतिक गतिविधियां जैसे की तीर्थ यात्रा, पर्यटन, धार्मिक मेले आदि भी नदियों के प्रदूषण में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
जल प्रदूषण के कारण:
- मानव मल का नदियों, नहरों आदि में विसर्जन ।
- सफाई तथा सीवर का उचित प्रबंध न होना।
- विभिन्न औद्योगिक इकाइयों द्वारा अपने कचरे तथा गंदे पानी का नदियों, नहरों में विसर्जन।
- कृषि कार्यों में उपयोग होने वाले जहरीले रसायनों तथा खादों का पानी में घुलना।
- नदियों में कूड़े-कचरे, मानव-शवों और पारम्परिक प्रथाओं का पालन करते हुए उपयोग में आने वाले प्रत्येक घरेलू सामग्री का समीप के जल स्रोत में विसर्जन।
- गंदे नालों, सीवरों के पानी का नदियों में छोड़ा जाना।
- कच्चा पेट्रोल, कुँओं से निकालते समय समुद्र में मिल जाता है जिससे जल प्रदूषित होता है।
- कुछ कीटनाशक पदार्थ जैसे डीडीटी, बीएचसी आदि के छिड़काव से जल प्रदूषित हो जाता है तथा समुद्री जानवरों एवं मछलियों आदि को हानि पहुँचाता है। अंततः खाद्य श्रृंखला को प्रभावित करते हैं।
वायु प्रदूषण
- गेसों, धूल के कणों आत वायु प्रदूषण अर्थात हवा में ऐसे अवांछित की उपस्थिति, जो लोगों तथा प्रकृति दोनों के लिए खतरे का कारण बन जाए।
- दूसरे शब्दों में कहें तो प्रदूषण अर्थात दूषित होना या गन्दा होना। वायु का अवांछित रूप से गन्दा होना अर्थात वायु प्रदूषण है। वायु में ऐसे बाह्य तत्वों की उपस्थिति जो मनुष्य के स्वास्थ्य अथवा कल्याण हेतु हानिकारक हो, ऐसी स्थिति को वायु प्रदूषण कहते हैं
वायु प्रदूषण के कारण :-
- वाहनों से निकलने वाला धुआँ।
- औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाला धुँआ तथा रसायन।
- आणविक संयत्रों से निकलने वाली गैसें तथा धूल-कण।
- जंगलों में पेड़ पौधे के जलने से, कोयले के जलने से तथा तेल शोधन कारखानों आदि से निकलने वाला धुआँ।
- ज्वाला मुखी विस्फोट (जलवाष्प, SO2)
भूमि प्रदूषण
भूमि प्रदूषण से अभिप्राय जमीन पर जहरीले, अवांछित और अनुपयोगी पदार्थों के भूमि में विसर्जित करने से है, क्योंकि इससे भूमि का निम्नीकरण होता है तथा मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित होती है। लोगों की भूमि के प्रति बढ़ती लापरवाही के कारण भूमि प्रदूषण तेजी से बढ़ रहा है
भूमि प्रदूषण के कारण :-
- कृषि में उर्वरकों, रसायनों तथा कीटनाशकों का अधिक प्रयोग
- औद्योगिक इकाईयों, खानों तथा खादानों द्वारा निकले ठोस कचरे का विसर्जन ।
- भवनों, सड़कों आदि के निर्माण में ठोस कचरे का विसर्जन ।
- कागज तथा चीनी मिलों से निकलने वाले पदार्थों का निपटान, जो मिट्टी द्वारा अवशोषित नहीं हो पाते ।
- प्लास्टिक की थैलियों का अधिक उपयोग, जो जमीन में दबकर नहीं गलती ।
- घरों, होटलों और औद्योगिक इकाईयों द्वारा निकलने वाले अवशिष्ट पदार्थों का निपटान, जिसमें प्लास्टिक, कपड़े, लकड़ी, धातु, काँच, सेरामिक, सीमेंट आदि सम्मिलित हैं।
ध्वनि प्रदूषण
अनियंत्रित, अत्यधिक तीव्र एवं असहनीय ध्वनि को ध्वनि प्रदूषण कहते हैं। ध्वनि प्रदूषण की तीव्रता को ‘डेसिबल इकाई’ में मापा जाता है।
ध्वनि प्रदूषण का कारण :-
- शहरों एवं गाँवों में किसी भी त्योहार व उत्सव में, राजनैतिक दलों के चुनाव प्रचार व रैली में लाउडस्पीकरों का अनियंत्रित इस्तेमाल/प्रयोग।
- अनियंत्रित वाहनों के विस्तार के कारण उनके इंजन एवं हार्न के कारण।
- औद्योगिक क्षेत्रों में उच्च ध्वनि क्षमता के पावर सायरन, हॉर्न तथा मशीनों के द्वारा होने वाले शोर।
- जनरेटरों एवं डीजल पम्पों आदि से ध्वनि प्रदूषण।
अम्लीय वर्षा
वायु प्रदूषण के कारण वातावरण में मौजूद अवांछित तत्व वर्षा के जल में मिलकर नीचे आते हैं। इससे अम्लीय पदार्थ अधिक होते हैं. इसे अम्लीय वर्षा कहते हैं।
धूम्र कोहरा
वातावरण में मौजूद धुआँ एवं धूल के कण जब सामान्य रूप में बनने वाले कोहरे में मिल जाते हैं तो इसे धूम्र कोहरा कहते हैं यह स्वास्थ्य के लिए बहुत नुकसान देह होता है
भारत में' नगरीय अपशिष्ट निपटान एक गम्भीर समस्या
- तेजी से बढ़ती जनसंख्या तथा उसके लिए अपर्यापत सुविधाएँ तथा विभिन्न स्त्रोतों द्वार अपशिष्ट की मात्रा में वृद्धि ।
- कारखानों, विद्युत गृहों तथा भवन निर्माण तथा विध्वंस से भारी मात्रा में निकली राख या मलबा ।
- अपशिष्ट / कचरे का पूर्णतः निपटान न होना। बिना एकत्र किये छोड़ना आदि।
- पर्याप्त स्थान की कमी।
- पर्याप्त जागरूकता के अभाव में पुनर्चक्रण नहीं हो पाता।
नगरों में अवशिष्ट निपटान संबंधी प्रमुख समस्याएँ
अपशिष्ट के पृथककरण की समस्या :-
नगरों में अभी भी सभी प्रकार के ठोस अपशिष्ट एक साथ इकट्ठे किये जाते हैं जैसे कि धातु शीशा सब्जियों के छिलके कागज आदि। जिससे इनको उचित तरीके से निपटाने में बाधा आती है।
भराव स्थल की समस्या :-
महानगरों में कूड़ा डालने के लिये स्थान की कमी महसूस की जाने लगी है है। पर्याप्त स्थान उपलब्ध नहीं है। सड़कों पर कूड़ा डाला जाता है।
पुनर्चक्रण की समस्या :-
- पृथक्करण न होने एवं पर्याप्त जागरूकता के अभाव में अपशिष्ट का पुनर्चक्रण नहीं हो पाता।
- कूड़े से उत्पन्न लीच, बदबू एवं बीमारी की समस्या विकराल होती जा रही है।
विकासशील देशो में शहरों की प्रमुख समस्याएँ :-
- अवशिष्ट निपटान की समस्या
- जनसंख्या विस्फोट की समस्या
- स्लम बस्तियों की समस्या
भारत में गंदी बस्तियों की समस्याएँ :-
- इन बस्तियों में रहने वाले लोग ग्रामीण पिछड़े इलाकों से प्रवासित होकर रोजगार इन बस्तियो । की तलाश में आते हैं।
- यहाँ अच्छे मकानों का मिलना कठिन है।
- ये बस्तियाँ रेलवे लाइन, सडक के साथ पार्क या अन्य खाली पड़ी सरकारी भूमि पर अवैध कब्जा करके बसायी जाती है।
- खुली हवा, स्वच्छ पेयजल, शौच सुविधाओं, प्रकाश का सर्वथा अभाव होता है।
- कम वेतन / मजदूरी प्राप्त करने के कारण जीवन स्तर अति निम्न होता है।
- कुपोषण के कारण बीमारियों की संभावना बनी रहती है।
- नशा व अपराध के कार्यों में लिप्त हो जाते हैं।
- चिकित्सा सुविधाओं का अभाव।
भूमि
भूमि का क्षरण सीमित उपलब्धता और भूमि की गुणवत्ता में गिरावट, दोनों ही कृषि भूमि पर दबाव डालने के लिए जिम्मेदार हैं। मिट्टी का कटाव, जल जमाव, लवणीकरण और भूमि का क्षारीयकरण भूमि क्षरण का कारण बनता है जिससे भूमि की उत्पादकता में गिरावट आती है। सरल शब्दों में, भूमि की उत्पादक क्षमता में अस्थायी या स्थायी गिरावट को भूमि क्षरण के रूप में जाना जाता है। सभी निम्नीकृत भूमि को बंजर भूमि नहीं माना जा सकता है। लेकिन यदि निम्नीकरण की प्रक्रिया को नियंत्रित नहीं किया गया तो निम्नीकृत भूमि को बंजर भूमि में परिवर्तित किया जा सकता है। प्राकृतिक और मानव निर्मित प्रक्रियाएं, दोनों ही भूमि की गुणवत्ता को कम करती हैं।
भू- निम्रीकरण
भू – निम्नीकरण से तात्पर्य भूमि की उत्पादकता में अल्प समय के लिये या स्थायी रूप से कमी आ जाना है।
भूमि निम्नीकरण की समस्या के कारण :-
अति सिंचाई :-
इसके कारण देश में उत्तरी मैदानों में लवणीय व क्षारीय क्षेत्रों में वृद्धि हुई है। सिंचाई मृदा की संरचना को बदल देती है। इनके अतिरिक्ति उर्वरक, कीटनाशी भी मृदा के प्राकृतिक, भौतिक रासायनिक व जैविक गुणों को नष्ट करके मृदा को बेकार कर देते हैं।
औद्योगिक अपशिष्ट :-
उद्योगों द्वारा निकला अपशिष्ट जल को दूषित कर देता है और फिर दूषित जल से की गई सिंचाई मृदा के गुणों को नष्ट कर देती है।
नगरीय अपशिष्ट :-
नगरों से निकला कूड़ा करकट भूमि का निम्नीकरण करता है और नगरों से निकला जलमल व अपशिष्ट के विषैले रासायनिक पदार्थ आस- पास के क्षेत्रों की मृदा में मिलकर उसे प्रदूषित कर देते हैं।
चिमनियों का धुआं :-
कारखानों व अन्य स्रोतों की चिमनियों से निकलने वाली गैसीय व कणिकीय प्रदूषकों को हवा दूर तक उड़ा ले जाती है है और ये प्रदूषक मृदा में मिलकर उसे प्रदूषित करते हैं।
अम्ल वर्षा :-
कारखानों से निकलने वाली गंधक अम्लीय वर्षा का कारण है। इससे मृदा में अम्लता बढ़ती है। कोयले की खानो, मोटर वाहनो, ताप बिजली घरों से भारी मात्रा में निकले प्रदूषण मृदा व वायु को प्रदूषित करते हैं।
भू निम्नीकरण को रोकने के उपाय :-
- किसान रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग उचित मात्रा में करें।
- नगरीय / औद्योगिक गंदे पानी को उपचारित करके पुनः उपयोग में लाया जाये।
- सड़ी – गली सब्जी व फल, पशु मलमूत्र को उचित प्रौद्योगिकी द्वारा बहुमूल्य खाद में परिवर्तित किया जाये।
- बस्तियों के आस – पास खुले में शौच पर प्रतिबन्ध लगे।
- प्लास्टिक से बनी वस्तुओं पर प्रतिबन्ध लगे।
- कूड़ा – कचरा निश्चित स्थान पर ही डाला जाये ताकि उसका यथासम्भव निपटान हो सके।
- वृक्षारोपण को बढ़ावा दिया जाये।
बंजर भूमि का वर्गीकरण
भू – निम्नीकरण से तात्पर्य भूमि की उत्पादकता में अल्प समय के लिये या स्थायी रूप से कमी आ जाना है।
राष्ट्रीय सुदूर संवेदन एजेंसी (NRSA) :-
यह भारत में बंजर भूमि के वर्गीकरण के लिए जिम्मेदार एक संगठन है। यह उन प्रक्रियाओं के आधार पर रिमोट सेंसिंग तकनीकों का उपयोग करके बंजर भूमि को वर्गीकृत करता है जिन्होंने उन्हें बनाया है।
प्राकृतिक एजेंटों के कारण बंजर :-
भूमि, गलीड / उबड़-खाबड़ भूमि, रेगिस्तानी या तटीय रेत, बंजर चट्टानी क्षेत्र, खड़ी ढलान वाली भूमि हिमनद क्षेत्र, आदि प्राकृतिक एजेंटों के कारण होने वाली बंजर भूमि हैं। इन्हें प्राकृतिक एजेंटों के कारण बंजर भूमि माना जाता है।
प्राकृतिक और साथ ही मानव :-
कारकों के कारण बंजर भूमि जलभराव और दलदली क्षेत्र, लवणता और क्षारीयता से प्रभावित भूमि और बिना स्क्रब वाली भूमि जो प्राकृतिक और साथ ही मानवीय कारकों से अपमानित होती हैं, इस श्रेणी में शामिल हैं।
मानव निर्मित प्रक्रियाओं के कारण होने वाली बंजर भूमि:-
खेती के क्षेत्र को स्थानांतरित करना, वृक्षारोपण फसलों के तहत अपमानित भूमि, अपमानित वन, अपमानित चरागाह और खनन और औद्योगिक बंजर भूमि कुछ प्रकार की बंजर भूमि हैं जो मानव क्रिया के कारण खराब हो जाती हैं।
भूमि प्रदूषण
- मानवीय गतिविधियों के कारण बड़े स्तर पर कचरे का उत्सर्जन होता है जो भूमि प्रदूषण का मुख्य कारण है
- कचरे के अलावा कृषि कार्यों में प्रयोग किए जाने वाले रसायनों की वजह से भी भूमि प्रदूषण में वृद्धि होती है।
- रसायनों एवं कचरे के कारण मिट्टी की उपजाऊता भी कम हो जाता है।
शहरी कचरे का निपटान
- बड़े-बड़े शहरों में प्रतिदिन बड़ी मात्रा में कचरे का उत्सर्जन होता है परंतु उसका पूर्ण रूप से निपटान नहीं किया जाता जिस वजह से पर्यावरण प्रदूषण में वृद्धि होती है।
- इस कचरे के अंदर मुख्य रूप से ठोस अपशिष्ट जैसे की धातु के छोटे टुकड़े, प्लास्टिक के कंटेनर, पॉलिथीन बैग, फ्लॉपी, सीडी, टूटे कांच के सामान आदि शामिल होते हैं।
- महानगरों की तुलना में छोटे शहरों एवं कस्बों में कचरे का निपटान एक अधिक बड़ी समस्या है
- बड़े महानगरों जैसे कि मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, बैंग्लोर आदि का 90% से अधिक कचरा सफलतापूर्वक एकत्र करके निपटा दिया जाता है परंतु छोटे कस्बों का 30 से 40% कचरा एकत्र करके ठीक से निपटाया नहीं जाता
- समय के साथ-साथ यह कचरा सड़कों, सार्वजनिक मैदानों, पार्कों एवं गलियों में जमा हो जाता है और अनेको स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बनता है।
ठोस कचरे के अनुचित प्रबंधन के प्रभाव
- मानवीय स्वास्थ्य के लिए हानिकारक
- दुर्गंध की समस्या
- कई बीमारियों जैसे कि टाइफाइड, डिप्थीरिया, दस्त, मलेरिया, हैजा आदि का मुख्य कारण
- असुविधा
- कई अन्य प्रकार के प्रदूषण का कारण
- अपघटन के कारण मीथेन गैस का उत्सर्जनकता है।
ग्रामीण-शहरी प्रवास
- एक व्यक्ति का एक क्षेत्र से किसी अन्य क्षेत्र में जाना प्रवास कहलाता है।
- प्रवास मुख्य रूप से गंतव्य क्षेत्र की विशेषताओं एवं उद्गम क्षेत्र की कमियों के कारण किया जाता है
- ग्रामीण क्षेत्र से लोगों का शहरी क्षेत्र की ओर जाना ग्रामीण शहरी प्रवास कहलाता है ऐसा मुख्य रूप से ग्रामीण क्षेत्रों की कमियों एवं शहरी क्षेत्रों की विशेषताओं के कारण होता है।
- प्रवास की इस धारा में मुख्य रूप से दैनिक वेतन प्राप्त करने वाले कर्मचारी शामिल होते हैं उदाहरण के लिए सब्जी बेचने वाला, बढ़ई, मजदूर आदि
- गांव में रह रहे अपने परिवार का भरण पोषण करने के लिए इन्हें दिन रात मेहनत करनी पड़ती है एवं कई अन्य समस्याओं का सामना करना पड़ता है
- नए क्षेत्रों में वहां के लोगों एवं संस्कृति के साथ मेलजोल स्थापित करने में समस्या का सामना करना पड़ता है
- इस धारा में मुख्य रूप से पुरुषों द्वारा रोज़गार की तलाश में प्रवास किया जाता है जिस वजह से गांव में महिलाएं बच्चे एवं बुजुर्ग अकेले रह जाते हैं और महिलाओं को मुख्य रूप से पूरे परिवार की देखभाल करनी पड़ती है जिस वजह से उन पर दबाव बढ़ता है।
ग्रामीण शहरी प्रवास के कारण
- रोजगार की तलाश
- जीवन की बेहतर दशाएं
- उच्च स्तरीय सुविधाएं
- बेहतर अवसर
- ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार की अस्थिरता
विश्व में शहरीकरण
- 2011 के आंकड़ों के अनुसार विश्व की आबादी लगभग 7 अरब के आसपास है और इस आबादी का लगभग 54% हिस्सा शहरी क्षेत्रों में रहता है शहरी आबादी के पास मूलभूत सुविधाएं एवं बुनियादी ढांचा उपलब्ध होता है जो उन्हें जीवन में बेहतर अवसर प्राप्त करने में मदद करता हैं।
- एक अनुमान के अनुसार 2050 तक विश्व की लगभग दो-तिहाई जनसंख्या शहरी क्षेत्रों में निवास करेगी।
नगरीय जनसंख्या
वह जनसंख्या जो नगरों में निवास करती है नगरीय जनसंख्या कहलाती है। बेहतर सुविधाएं, अवसर एवं ग्रामीण क्षेत्रों से शहरी क्षेत्रों में होने वाले प्रवास के कारण शहरों की जनसंख्या बहुत तेजी से से बढ़ रही है।
शहरों की जनसंख्या में वृद्धि के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:-
- उच्च जन्म दर
- प्रवास
- ग्रामीण बस्तियों को शामिल करने के लिए शहरी क्षेत्रों का पुनर्वर्गीकरण।
- बेहतर सुविधाएं एवं अवसर
- जीवन की बेहतर दशाएं आदि
मलिन बस्तियाँ
ग्रामीण क्षेत्रों से बड़ी संख्या में शहरी क्षेत्रों की ओर होने वाले जनसँख्या के प्रवास के कारण शहरों में कई ऐसी बस्तियाँ विकसित हुई है जहां पर बुनियादी ढांचा, मूलभूत सुविधाएँ एवं रहने की दशा अत्यंत निम्न है ऐसी बस्तियों को मलिन बस्तियाँ कहा जाता है।
मलिन बस्तियों की विशेषताएं
- मलिन बस्तियाँ मुख्य रूप से वे इलाके हैं जहां पर बुनियादी ढांचा, मूलभूत सुविधाएं एवं रहने की दशा अत्यंत निम्न है।
- में लोग र इन बस्तियों में बड़ी संख्या में लोग रहते हैं जिस वजह से बहुत छोटे-छोटे एवं पास पास मकान बने होते हैं
- सड़के बहुत पतली होती हैं एवं छोटे से क्षेत्र में बहुत बड़ी संख्या में लोग निवास करते हैं। इन बस्तियों में रहने वाले लोग मुख्य रूप से शहरी क्षेत्रों में काम करने वाले मजदूर एवं अन्य दैनिक वेतन कमाने वाले लोग हैं
- इन बस्तियों में कई बीमारियों का प्रभाव भी बड़े रूप में देखा जा सकता है इसका मुख्य कारण बस्तियों में स्वच्छता का अभाव एवं जीवन की निम्न दशाएं हैं
- गरीबी के कारण इन बस्तियों में नशीली दवाओं का उपयोग शराब का सेवन एवं अपराध आदि एक सामान्य बात है।
भारत के जलाशयों को उद्योग किस प्रकार प्रदूषित करते हैं ?
- उद्योग अनेक अवांछित उत्पाद पैदा करते हैं। जिनमें औद्योगिक कचरा, प्रदूषित अपशिष्ट जल, जहरीली गैसें, रासायनिक अवशेषः अनेक भारी धातुएँ, धुल धुआँ आदि शामिल है ।
- अधिकतर औद्योगिक कचरे को बहते जल में या झीलों आदि में विसर्जित कर दिया जाता है। परिणाम स्वरूप रासायनिक तत्व जलाशयों, नदियों आदि में पहुँच जाते हैं।
- सर्वाधिक जल प्रदूषण उद्योग चमड़ा लुगदी व कागज, वस्त्र वस्त्र तथा रसायन है
ncert Class 12 Geography Book 2 Chapter 9 Notes in Hindi
के notes आपको कैसे लगे अपनी राय जरूर दे