भूसंसाधन तथा कृषि Notes
Class 12 Geography Chapter 3 Notes in Hindi

यहाँ हम कक्षा 12 भूगोल के 3rd अध्याय “भूसंसाधन तथा कृषि” के नोट्स उपलब्ध करा रहे हैं। इस अध्याय में भूसंसाधन तथा कृषि से जुड़ी प्रमुख विशेषताओं का अध्ययन किया गया है।

ये नोट्स उन छात्रों के लिए उपयोगी सिद्ध होंगे जो इस वर्ष बोर्ड परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं। सरल और व्यवस्थित भाषा में तैयार की गई यह सामग्री अध्याय को तेजी से दोहराने और मुख्य बिंदुओं को याद रखने में मदद करेगी।

भूसंसाधन तथा कृषि Notes, Class 12 Geography Chapter 3 Notes in Hindi

भूसंसाधन तथा कृषि Notes, Class 12 Geography Chapter 3 Notes in Hindi

Class 12 Geography Chapter 3 Notes in Hindi

भू संसाधन तथा कृषि

  • एक देश की सीमा के अंदर आने वाला स्थलीय क्षेत्र उस देश का भू संसाधन कहलाता हैं।
  • सभी प्राकृतिक संसाधन में से सबसे महत्वपूर्ण संसाधन भू संसाधन को माना है क्योकि यह मानव जीवन का आधार है। जाता
  • में विभिन्न प्रकार की भी आकृतियाँ पाई जाती हैं। भारत में
  • भारत के कुल भू- संसाधनों को लगभग 43 हिस्सा मैदानी, 30% भाग पर्वतीय एवं बचा हुआ 27% भाग पठारी हैं।

नगरीय बस्तीभू - उपयोग वर्गीकरण :-

भूराजस्व विभाग भू – उपयोग संबंधी अभिलेख रखता है। भू उपयोग संवर्गों का योग कुल प्रतिवेदन (रिपोर्टिंग) क्षेत्र के बराबर होता है जो कि भौगोलिक क्षेत्र से भिन्न है। भारत की प्रशासकीय इकाइयों के भौगोलिक क्षेत्र की सही जानकारी देने का दायित्व भारतीय सर्वेक्षण विभाग पर है।

भूराजस्व अभिलेख द्वारा अपनाया गया भू-उपयोग वर्गीकरण निम्न प्रकार है

1. वनों के अधीन क्षेत्र :-

ये क्षेत्र वनों के अधीन होते हैं, सरकार द्वारा वन क्षेत्रों का सीमांकन इस प्रकार किया जाता है जहाँ वन विकसित हो सकते हैं।

2. गैर कृषि कार्यों में प्रयुक्त भूमि :-

इस वर्ग की भूमि में भूमि का उपयोग सड़कों, नहरों, उद्योगों, दुकानों आदि के लिए किया जाता है।

3. बंजर एवं व्यर्थ भूमि :-

वह भूमि जो भौतिक दृष्टि से कृषि के अयोग्य है जैसे वन, वन, ऊबड़-खाबड़ भूमि एवं पहाड़ी भूमि, रेगिस्तान एवं उपरदित खड्डू भूमि आदि ।

4. स्थायी चारागाह वाह क्षेत्र :-

पर ग्राम पंचायत या सरकार का स्वामित्व होता है। इस प्रकार की अधिकतर भूमि पर ग्र इस भूमि का केवल एक छोटा सा भाग निजी स्वामित्व में होता है।

5. कृषि योग्य व्यर्थ भूमि :-

यह वह भूमि है जो पिछले पाँच वर्षों या उससे अधिक समय तक व्यर्थ पड़ी है। इस भूमि को कृषि तकनीकी के जरिये कृषि क्षेत्र के योग्य बनाया जा सकता है।

6. वर्तमान परती भूमि :-

यह वह भूमि जिस पर एक वर्ष या उससे कम समय के लिये खेती नहीं की जाती । यह भूमि की उर्वरत बढ़ाने का प्राकृतिक तरीका होता है।

7. पुरातन परती भूमि :-

वह भूमि जिसे एक वर्ष से अधिक किन्तु पाँच वर्ष से कम के लिये खेती हेतु प्रयोग नहीं किया जाता ।

8. निबल बोया क्षेत्र :-

वह भूमि जिस पर फसलें उगाई एवं काटी जाती हैं, वह निवल बोया क्षेत्र कहलाता है।

9. विविध तरु फसलों एवं उपवनों के अंतर्गत क्षेत्र :-

इस वर्ग में वह भूमि शामिल है, जिस पर उद्यान एवं फलदार वृक्ष है, इस प्रकार की ज्यादतर भूमि निजी स्वामित्व में होती है।

10. शुद्ध बुआई क्षेत्र :-

किसी कृषि वर्ष में बोया गया कुल फसल क्षेत्र शुद्ध बुआई क्षेत्र कहलाता है।

भारत में भूमि उपयोग परिवर्तन

  • एक विशेष क्षेत्र में आर्थिक क्रियाओं से होने वाले परिवर्तन की वजह से भूमि के उपयोग में परिवर्तन आता है।
  • भूमि के उपयोग में होने वाला परिवर्तन निन्मलिखित तीन कारकों पर निर्भर करता है :-

1.अर्थव्यवस्था का आकार

अर्थव्यवस्था के बढ़ते आकार की वजह से भूमि के प्रयोग में वृद्धि होती है सीमांत भूमि (वह भूमि जिसे पहले प्रयोग नहीं किया जा रहा था।) को भी प्रयोग में लाया जाने लगता है।

2.अर्थव्यवस्था की संरचना

विकासशील देशों में विकास के दौर में अर्थव्यवस्था की संरचना में परिवर्तन आता है,जनसंख्या प्राथमिक क्षेत्र से द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्रों की ओर बढ़ने लगती है जिस वजह से गैर कृषि संबंधित कार्य में भूमि के उपयोग में वृद्धि आती है।

कृषि भूमि पर बढ़ता दबाव

अर्थव्यवस्था में तृतीय क्षेत्र का प्रभाव बढ़ने की वजह से प्राथमिक क्षेत्र का प्रभाव कम होता है, लेकिन जनसंख्या का आकार बड़ा होने की वजह से कृषि उत्पादों की मांग में निरंतर बढ़ोतरी होती है जिससे कृषि भूमि पर अत्यधिक दबाव पड़ता हैं।

सकल बोया गया क्षेत्र

जोते एवं बोये गये क्षेत्र में शुद्ध बुआई क्षेत्र तथा शुद्ध क्षेत्र का वह भाग शामिल किया जाता है जिसका उपयोग एक से अधिक बार किया गया हो।

स्वामित्व के आधार पर भूमि को दो दो भागों में वर्गीकरण किया गया है :-

1.निजी भू संपत्ति

वह भूमि जिस पर एक व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह का स्वामित्व होता है, निजी भू संपत्ति कहलाते हैं।

2.साझा संपत्ति संसाधन :-

साझा संपत्ति संसाधन पर राज्यों का स त्यों का का स्वामित्व होता है। यह संसाधन पशुओं के लिये चारा, घरेलू उपयोग हेतु ईंधन, लकड़ी तथा वन उत्पाद उपलब्ध कराते है।

साझा संपत्ति संसाधन का विशेष महत्व

  • ग्रामीण क्षेत्रों में भूमिहीन छोटे कृषकों तथा अन्य आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के व्यक्तियों के जीवन यापन में इनका महत्व है क्योंकि भूमिहीन होने के कारण पशुपालन से प्राप्त आजीविका पर निर्भर है।
  • ग्रामीण इलाकों में महिलाओं की जिम्मेदारी चारा व ईंधन एकत्रित करने की होती है।
  • साझा संपत्ति संसाधन वन उत्पाद जैसे फल, रेशे, गिरी, औषधीय पौधे आदि उपलब्ध कराती है।

साझा संपत्ति संसाधन की प्रमुख विशेषताएं :-

  • पशुओं के लिए चारा, घरेलू उपयोग हेतु ईंधन, लकड़ी तथा साथ ही अन्य वन उत्पाद जैसे फल, रेशे, गिरी, औषधीय पौधे आदि साझा संपति संसाधन में आते हैं।
  • आर्थिक रूप में कमजोर वर्ग के व्यक्तियों के जीवन यापन में इन भूमियों का विशेष महत्व है क्योंकि इनमें से अधिकतर भूमिहीन होने के कारण पशुपालन से प्राप्त अजीविका पर निर्भर हैं।
  • महिलाओं के लिए भी इनका विशेष महत्व है क्योंकि ग्रामीण इलाकों में चारा व ईंधन लकड़ी के एकत्रीकरण की जिम्मदारी उन्हीं की होती है।
  • सामुदायिक वन, चारागाह, ग्रामीण जंलीय क्षेत्र तथा स्थान साझा संपत्ति संसाधन के उदाहरण है।

भारत में कृषि ऋतु

खरीफ ऋतु:-

यह ऋतु जून माह में प्रारम्भ होकर सितम्बर माह तक रहती है। । इस ऋतु में चावल, कपास, जूट, ज्वार बाजरा व अरहर आदि की कृषि की जाती है। खरीफ की फसल दक्षिण पश्चिम मानसून के साथ सम्बद्ध है। दक्षिण पश्चिम मानसून के साथ चावल की फसल शुरू होती है।

रवी ऋतु :-

रबी की ऋतु अक्टूबर – नवम्बर में शरद ऋतु से प्रारम्भ होती है। गेहूँ, चना, तोराई, सरसों, जौ आदि फसलों की कृषि इसके अन्तर्गत की जाती है।

जायद ऋतु :-

जायद एक अल्पकालिक ग्रीष्मकालीन फसल ऋतु हैं जो रबी की कटाई के बाद प्रारम्भ होती है। इस ऋतु में तरबूज, खीरा, सब्जियां व चारे की फसलों की कृषि होती है।

भारत में कृषि के प्रकार

सिंचित कृषि :-

  • वर्षा के अतिरिक्त जल की कमी को सिंचाई द्वारा पूरा किया जाता है। इसका उद्देश्य अधिकतम क्षेत्र को पर्याप्त आर्द्रता उपलब्ध कराना है
  • फसलों को पर्याप्त मात्रा में पानी उपलब्ध कराकर अधिकतम उत्पादकता प्राप्त कराना तथा उत्पादन योग्य उत्पादन योग्य क्षेत्र को बढ़ाना ।

सिंचाई के उद्देश्यों के आधार पर इस दो भागों में बांटा जाता हैं:-

रक्षित सिंचाई

इस प्रकार की सिंचाई का मुख्य उद्देश्य पानी की कमी के कारण फसलों को नष्ट होने से बचाना होता है। साधारण शब्दों में समझें, वर्षों के अतिरिक्त जल की कमी को पूरा करने के लिए इस प्रकार की सिंचाई का प्रयोग किया जाता हैं।

उत्पादक सिंचाई
  • इस व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य फसलों को सिंचाई द्वारा पर्याप्त पानी उपलब्ध करवाकर अधिकतम उत्पादन प्राप्त करना होता हैं।
  • रक्षित सिंचाई की तुलना में उत्पादक सिंचाई में अधिक मात्रा में जल की आवश्यकता होता हैं।

वर्षा निर्भर कृषि :-

इस वर्ग में कृषि के उस प्रकार को शामिल किया जाता हैं, जो जलापूर्ति के लिए पूर्ण रूप वर्षा पर निर्भर होता हैं।

कृषि की ऋतू में उपलब्ध आद्रता की मात्रा के आधार पर वर्षा पर निर्भर कृषि को भागों में बांटा जाता हैं :-

शुष्क भूमि कृषि

  • वह प्रदेश जहाँ वार्षिक वर्षा 75cm से कम होता है, शुष्क भूमि कृषि क्षेत्र कहलाते हैं।
  • इन क्षेत्रों में मुख्य रूप से ऐसी फसलें उगाई जाती है, जो सहने में सक्षम होते हैं।
  • उदहारण के रागी, बाजार, मूंग, चना, ज्वार और चारा फसलें आदि ।
  • इसमें वर्षा जल के उपयोग के लिए अनेक विधियों का प्रयोग किया जाता हैं।

आर्द्रभूमि कृषि

  • ऐसे क्षेत्र जहां पर वर्षा ऋतू में वर्षा के पौधों की जरुरत से अधिक होती है आद्र भूमि कृषि क्षेत्र कहलाते हैं।
  • इन क्षेत्रों में मुख्य रूप से वह फसलें उगाई जाती है जिन्हें पानी की अधिक मात्रा में आवश्यकता होती हैं।
  • उदाहरण के लिए चावल, जुट, गन्ना आदि।

भारतीय कृषि की प्रमुख समस्याएं :-

आर्द्रभूमि कृषि

बढ़ती जनसंख्या के कारण भूमि जोतों का आकार लगातार सिकुड़ रहा है। लगभग 60 प्रतिशत किसानों की जोतो का आकार तो एक हेक्टेयर से भी कम है और अगली पीढी के लिए इसके और भी हिस्से हो जाते हैं जो कि आर्थिक दृष्टि से लाभकारी नहीं है। ऐसी कृषि जोतो पर केवल निर्वाह कृषि की जा सकती है।

कृषि योग्य भूमि का निम्नीकरण :-

कृषि योग्य भूमि की निम्म्रीकरण कृषि की एक अन्य गंभीर समस्या है इससे लगातार भूमि का उपजाऊपन कम हो जाता है। यह समस्या उन क्षेत्रों में ज्यादा गंभीर है जहां अधिक सिंचाई की जाती है। कृषि भूमि का एक बहुत बड़ा भाग लवणता, क्षारता व जलाक्रांतता के कारण बंजर हो चुका है। कीटनाशक रसायनों के कारण भी उर्वरता शक्ति कम हो जाती है।

अल्प बेरोजगारी :-

भारतीय कृषि में विशेषकर असिंचित क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर अल्प बेरोजगारी पाई जाती है। फसल ऋतु में वर्ष भर रोजगार उपलब्ध नहीं होता क्योंकि कृषि कार्य लगातार गहन श्रम वाले नहीं है। इसी को अल्प बेरोजगारी कहते हैं।

भारत में उगाई जाने वाली मुख्य फसलें

  • भारत में मुख्य रूप से खाद्यान्न, तिलहन, रेशेदार फसलें और कई अन्य फसलें उगाई जाती हैं।
  • इन सब में से प्रमुख रूप से खाद्यान्न का उत्पादन किया जाता है।

खाद्यान फसले

  • भारतीय कृषि में खाद्यान्नों का एक विशेष स्थान है।
  • संपूर्ण भारत के बोये क्षेत्र के लगभग दो तिहाई भाग पर खाद्यान्न फसलें उगाई जाती है।
  • अनाज की संरचना के आधार पर खाद्यान्नों को अनाज एवं दलों में विभाजित किया जाता है।

अनाज

  • भारत में कुल बोए गए क्षेत्र के लगभग 54% भाग पर अनाज बोए जाते हैं।
  • भारत विश्व का लगभग 11% अनाज उत्पन्न करके अमेरिका व चीन के बाद तीसरे स्थान पर आता है।
  • भारत में विभिन्न प्रकार के अनाजों का उत्पादन किया जाता है एवं इन्हें मुख्य रूप से दो भागों में बांटा जाता है.
  • उत्तम अनाज (चावल एवं गेहूं)
  • मोटे अनाज (ज्वार, बाजरा, मक्का , रागी आदि

चावल

  • भारत विश्व के लगभग 21.2% चावल का उत्पादन करता है और चीन के बाद इसका विश्व में दूसरा सबसे बड़ा स्थान है।
  • देश के कुल बोये गए क्षेत्र के एक चौथाई भाग पर चावल बोया जाता है।
  • भारत में मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, और पंजाब में चावल बोया जाता
  • पंजाब, तमिलनाडु, हरियाणा, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे क्षेत्रों में चावल की प्रति हेक्टेयर पैदावार सबसे अधिक है।

गेहूं

  • भारत का दूसरा प्रमुख अनाज गेहूँ है।
  • भारत विश्व का लगभग 11.7% गेहूं उत्पादन करता है।
  • देश के कुल क्षेत्र के लगभग 14% भाग पर गेहूं की कृषि की जाती है।
  • भारत में मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश मध्य प्रदेश पंजाब हरियाणा तथा राजस्थान में गेंहू उगाया जाता है।
  • पंजाब और हरियाणा में गेहूं की उत्पादकता सबसे अधिक है।

ज्वार

  • कुल क्षेत्र के लगभग 5.3% भाग पर ज्वार बोया जाता है।
  • भारत में मुख्य रूप से कर्नाटक, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना आर महाराष्ट्र जैसे राज्यों में ज्वार की खेती की जाती है।
  • पूरे भारत का लगभग आधे से ज्यादा ज्वार उत्पादन अकेला महाराष्ट्र करता है।

बाजरा

  • भारत के कुल बोये गए क्षेत्र के लगभग 5.2% हिस्से पर बाजरा उगाया जाता है।
  • इसे मुख्य रूप से महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तर प्रदेश, राजस्थान व हरियाणा जैसे राज्यों में बोया जाता है।

मक्का

  • भारत के कुल बोये गए क्षेत्र के लगभग 3.6%
  • भाग पर मक्का बोया जाता है।
  • भारत में मुख्य रूप से कर्नाटक, मध्य प्रदेश, बिहार, आंध्र प्रदेश तेलंगाना, राजस्थान व उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में मक्का उगाया जाता है।
  • मक्के की पैदावार दक्षिण भारत के राज्यों में अधिक है, जो मध्य भारत तक आते आते कम होती जाती है।

दाल

  • भारत विश्व में में दाल उत्पादन के प्रमुख देशों में से एक है।
  • देश के कुल बोये गए क्षेत्र में से लगभग 11% क्षेत्र पर दालें बोयी जाती है।
  • चना तथा अरहर भारत की प्रमुख दालें हैं।

चना

  • देश के कुल बोये क्षेत्र के लगभग 28% भाग पर चने की खेती की जाती है।
  • इस फसल के प्रमुख उत्पादक राज्य मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और राजस्थान है।

अटहट (तुर)

  • अरहर देश की दूसरी प्रमुख दाल फसल है, इसे लाल . चना या पिजन पी. के नाम से भी जाना जाता है।
  • भारत के कुल बोय क्षेत्र के लगभग 2% भाग पर अरहर की खेती की जाती है।
  • इसके प्रमुख उत्पादक राज्य है: उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, गुजरात और मध्य प्रदेश

तिलहन

  • खाद्य तेल के उत्पादन के लिए तिलहन की खेती की जाती।
  • मालवा पठार, मराठवाड़ा, गुजरात, राजस्थान, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश भारत के प्रमुख तेल उत्पादक क्षेत्र है।
  • देश की कुल बोये क्षेत्र के लगभग 14% भाग पर तिलक फसलें बोयी जाती है।
  • तिलहन फसलों में भारत में मुख्य रूप से मूंगफली, सरसों, सोयाबीन और सूरजमुखी उगाए जाते हैं।

मूंगफली

  • भारत विश्व में लगभग 15% मूंगफली का उत्पादन करता है।
  • यह भारत रत के कुल बोये क्षेत्र के लगभग 3.6% क्षेत्र पर बोयी जाती है।
  • गुजरात, राजस्थान, तमिलनाड और आंध्र प्रदेश मूंगफली के प्रमुख उत्पादक राज्य हैं।

अन्य तिलहन

  • सोयाबीन तथा सूरजमुखी भारत के अन्य महत्वपूर्ण तिलहन है।
  • सोयाबीन मुख्य रूप से मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में बोया जाता है।
  • यह दोनों राज्य मिलकर पूरे देश की लगभग 90% सोयाबीन का उत्पादन करते हैं।
  • सूरजमुखी की फसल मुख्य रूप से राजस्थान, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और इससे जुड़े महाराष्ट्र के कुछ भागों में बोयी जाती है।

रेशेदार फसलें

  • भारत में कपड़ा, थैला, बोटा व अन्य प्रकार का सामान बनाने के लिए रेशेदार फसलों को उगाया जाता है।
  • कपास तथा जूट भारत की दो प्रमुख रेशेदार फसलें हैं।

कपास

  • कपास के उत्पादन में चीन के बाद भारत का विश्व में दूसरा स्थान है।
  • देश के समस्त बोये गए क्षेत्र के लगभग 4.7% क्षेत्र पर कपास बोया जाता है।
  • गुजरात, महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, पंजाब तथा हरियाणा भारत के प्रमुख कपास उत्पादक क्षेत्र है।

जूट

  • भारत में विश्व का लगभग 60% जूट उत्पादन किया जाता है।
  • यह भारत के कुल बोये क्षेत्र के लगभग 0.5% क्षेत्र पर बोया जाता है।
  • पश्चिम बंगाल भारत के कुल उत्पाद का लगभग 60% उत्पादन करता है।
  • बिहार एवं असम भारत के अन्य प्रमुख जूट उत्पादक क्षेत्र है।

गन्ना

  • ब्राजील के बाद भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा गन्ना उत्पादक देश है।
  • भारत में लगभग विश्व के 19% गन्ने का उत्पादन किया जाता है।
  • भारत के कुल बोये क्षेत्र के लगभग 2.4% हिस्से पर गन्ने की कृषि की जाती है।
  • अकेला उत्तर प्रदेश पूरे देश के लगभग 40% गन्ने का उत्पादन करता है।
  • उत्तर प्रदेश के अलावा महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु और आंध्रप्रदेश गन्ने के प्रमुख उत्पादक राज्य है।

चाय

  • चाय एक रोपण कृषि है, जिसका प्रयोग पेय पदार्थ के रूप में किया जाता है।
  • विश्व में भारत चाय का सबसे बड़ा उत्पादक देश है और विश्व की लगभग 21.8% चाय का उत्पादन करता है।
  • असम के लगभग 53.2% भाग पर चाय का उत्पादन किया जाता है।
  • असम के अलावा पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु चाय के अन्य महत्वपूर्ण उत्पादक राज्य है।

कॉफी

  • भारत में विश्व का लगभग 3.7% कॉफी उत्पादन होता है।
  • कॉफी उत्पादन के आधार पर भारत का विश्व में सातवां स्थान है।
  • भारत में कर्नाटक, केरल एवं तमिलनाडु में मुख्य रूप से कॉफी की कृषि की जाती है।
  • अकेला कर्नाटक समस्त देश के उत्पादन का 2 तिहाई से अधिक कॉफी उत्पादन करता है।

भारत में कृषि का विकास

  • स्वतंत्रता से पहले भारत में कृषि मुख्य रूप से जीवन निर्वाह के लिए की जाती थी।
  • आजादी के बाद भारतीय सरकार ने बड़े स्तर पर कृषि सुधारों की शुरुआत की जिस वजह से कृषि की उत्पादकता में तेजी से वृद्धि कृषि उत्पादन में हुई इस वृद्धि को हरित क्रांति के नाम से जाना जाता है।

भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का महत्व :

  • देश की कुल श्रमिक शक्ति का 80 प्रतिशत भाग कृषि का है
  • देश के कुल राष्ट्रीय उत्पाद में 26 प्रतिशत योगदान कृषि का है।
  • कृषि से कई कृषि प्रधान उद्योगों को कच्चा माल मिलता है जैसे कपड़ा उद्योग, जूट उद्योग, चीनी उद्योग ।
  • कृषि से ही पशुओं को चारा प्राप्त होता है।
  • कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था की आधारशिला ही नहीं बल्कि जीवन यापन की एक विधि है।

हरित क्रान्ति

1960-70 के दशक में खाद्यान्नों विशेषरूप से गेहूँ के उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि की गयी। इसे ही हरित क्रान्ति कहा जाता है। खाद्यान्नों के उत्पादन में वृद्धि के लिये निम्न उपायों को अपनाया गया।

हरित क्रांति कैसे आई ?

  • देश में खाद्यान की बढ़ती समस्या को देखते हुए सरकार ने खाद्यान उत्पादन की वृद्धि पर ध्यान दिया। इसके लिए सरकार ने अच्छी किस्म के बीज उपलब्ध करवाए
  • सरकार द्वारा किसानों को अच्छी गुणवत्ता के बीज उपलब्ध कराए गए ताकि किसानों की पैदावार में वृद्धि हो सके।

भूमि अनुसार उत्पादन

किसानों को भूमि के अनुसार फसल उगाने की सलाह दी गई ताकि भूमि के पोषक तत्व का भरपूर प्रयोग हो सके।

अधिक सहायता उपलब्ध करवाई

सरकार द्वारा किसानों को और अधिक मदद उपलब्ध करवाई गई और उत्पादन बढ़ाने में किसानों की सहायता की गई।

हरित क्रांति के सकारात्मक प्रभाव (परिणाम)

खाद्यान उत्पादन में वृद्धि :-

सरकार के प्रयासों ओर किसानों की मेहनत के कारण देश में खाद्यान्न उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि हुई।

खाद्यान उत्पादन में आत्मनिर्भरता :-

  • खाद्यान्न उत्पादन में भारत आत्मनिर्भर बना।
  • इतनी अधिक मात्रा में उत्पादन हुआ कि वह भारत जो पहले तक खाद्यान्न का आयात कर रहा था अब निर्यात करने लगा।

नयी तकनीक :-

सरकार के प्रोत्साहन के कारण कृषि में नई तकनीक का प्रयोग होना शुरू हुआ जिससे कृषि की उत्पादकता में वृद्धि हुई।

मध्यम कृषक वर्ग का उदय हुआ:-

देश में एक मध्यम कृषक वर्ग का उदय हुआ जिसे हरित क्रांति से लाभ हुआ था।

कृषि में व्यापारीकरण:-

पहले सभी किसान अपनी जरूरतों के लिए फसल उगाया करते थे लेकिन सरकार के प्रोत्साहन और मदद के बाद कृषि में व्यापारीकरण की शुरुआत हुई यानी अब किसान ऐसी फसलों का उत्पादन करने लगे जिन्हें वह बाजार में जाकर बेच सकते थे।

हरित क्रांति के नकारात्मक प्रभाव

  • केवल कुछ किस्म की फसलों जैसे की चावल, गेहूं आदि के उत्पादन में वृद्धि हुई।
  • हरित क्रांति का फायदा सम्पूर्ण भारत को नहीं हुआ।
  • हरित क्रांति का प्रभाव कुछ क्षेत्रों जैसे की उत्तरप्रदेश, पंजाब आदि तक सीमित रहा।
  • अमीर और गरीब किसानों के बीच का अंतर ओर बढ़ गया।

हरित क्रान्ति की सफलता के प्रमुख कारण

  • उच्च उत्पादकता वाले बीज ।
  • रासायनिक उर्वरकों का उपयोग ।
  • सिंचाई की सुविधा ।
  • पंजाब, हरियाणा एवं प. उत्तर प्रदेश में हरित क्रान्ति के में रिकार्ड वृद्धि हुई। कारण गेहूँ के उत्प

हरित क्रान्ति की विशेषताएं

  • उन्नत किस्म के बीज
  • सिंचाई की सुविधा
  • रासायनिक उर्वरक
  • कीटनाशक दवाईयां
  • कृषि मशीनें कृषि

भारतीय कृषि के विकास में हरित क्रांति की भूमिका :-

भारत में 1960 के दशक में खाद्यान फसलों के उत्पादन में वृद्धि करने के लिए अधिक उत्पादन देने वाली नई किस्मों के बीज किसानों को उपलब्ध कराये गये। किसानों को अन्य कृषि निवेश भी उपलब्ध कराये गए जिसे पैकेज प्रौद्योगिकी के नाम से जाना जाता है। जिसके फलस्वरूप पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, गुजरात, राज्यों में खाद्यान्नों में अभूतपूर्व वृद्धि हुई। इसे हरित क्रान्ति के नाम से जाना जाता है।

भूमि संसाधनों के निम्नीकरण के कारण :-

  • नहर द्वारा अत्यधिक सिंचाई जिसके कारण लवणता एवं क्षारीयता में वृद्धि होती है।
  • कीटनाशकों का अत्याधिक प्रयोग ।
  • जलाक्रांतता (पानी का भराव होना)।
  • फसलों को हेर – फेर करके न बोना, दलहन फसलों को कम बोना
  • सिंचाई पर अत्याधिक निर्भर फसलों को उगाना।

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